[दीवान]टेलीविजन और चुनावी सच को दिखाया एनडीटीवी ने
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Mon May 11 13:51:02 IST 2009
आर्थिक मंदी की मार से हांफ रहे न्यूज चैनलों को जिन राजनीतिक पार्टियों ने
अपने-अपने चुनावी विज्ञापन देकर उसे मीडिया इंडस्ट्री में दौड़ लगाते रहने लायक
बनाए रखा,आज वही न्यूज चैनल उनकी इस स्ट्रैटजी की धज्जियां उड़ाने में जुट गए
हैं। आप चाहें तो न्यूज चैनलों की इस अदा पर फिदा हो सकते हैं,इसे चैनल की
कलाबाजी कह सकते हैं या फिर तटस्थता का एक प्रायोजित नमूना जो कि विज्ञापन के
असर लगभग खत्म हो जाने की स्थिति में इन मुद्दों को सामने ला रहे है। हर
कॉमर्शियल ब्रेक पर बीजेपी के अभिमान और कांग्रेस के जय हो का डंका पिटनेवाले
चैनलों ने देश के आम दर्शकों को ये कभी नहीं बताया कि आपके प्रत्याशी और
राजनीतिक पार्टियां चुनावी विज्ञापन और मीडिया प्रचार की सवारी करके चुनाव
जितने के लिए परेशान है उसमें न केवल आपके विकास का पैसा पानी की तरह बहाया जा
रहा है बल्कि इससे किसी भी स्तर पर लोकतंत्र के मजबूत होने की कोई संभावना भी
नहीं है। आज जबकि चुनावी महौल लगभग खत्म होने को है, न्यूज चैनल देश के आम
दर्शकों को ये बता रहे हैं कि मीडिया ने चुनावी विज्ञापन के जरिए लोकतंत्र और
विकास की जो तस्वीर बनाए औऱ दिखाए वो सब झूठ है। अब तो आप-हम वोट दे चुके
हैं,राजनीतिक सक्रियता के स्तर पर फिलहाल कुछ खास नहीं कर सकते लेकिन राजनीतिक
पार्टियों की धज्जियां उड़ाने के क्रम में चैनल ने जो आंकड़े पेश किए हैं उससे
हम मीडिया,चुनाव और देश की वस्तुस्थिति को लेकर अपनी समझदारी दुरुस्त कर सकते
हैं।
सीधी बात<http://aajtak.intoday.in/index.php?option=com_magazine&opt=section§ionid=1&secid=84&Itemid=1>
में
आए लालकृष्ण आडवाणी से प्रभु चावला ने जब ये सवाल किया कि आपको नहीं लगता कि
बीजेपी का पूरा प्रचार पर्सनालिटी कल्ट रहा। इस सवाल के जबाब में आडवाणी का साफ
जबाब रहा कि अगर किसी व्यक्ति आधारित प्रचार होता है तो वो भी कहीं न कहीं
पार्टी की विचारधारा का ही प्रसार होता है। फिलहाल हम इस तरह की मान्यता के
समर्थन में न भी जाएं कि जो मैं हूं वही जगत है तो भी इतना तो समझ ही सकते हैं
कि चाहे वो प्रत्याशी हो या फिर पार्टी उसने लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में
अपनी पहुंच एक राजनीतिक व्यक्ति या विचारधारा के बजाए ब्रांड के रुप में बनाने
की पुरजोर कोशिश की है और इसलिए पूरी तरह मार्केटिंग की स्ट्रैटजी में कूद गए।
एनडीटीवी इंडिया ने अपने खास कार्यक्रम हमलोग में ये सवाल उठाया कि आखिर क्यों
राजनीतिक पार्टियों की विज्ञापनों और मीडिया पर निर्भरता दिनोंदिन बढ़ती जा रही
है? इसके साथ ही इस बहस को भी जारी रखा कि आखिर क्या वजह है कि चुनाव के बाद
अक्सर मीडिया की ओर से निकाले गए नतीजे झूठे साबित होते हैं और असली चुनावी
नतीजे को देखकर ऐसा लगता है कि चुनावी विज्ञापनों और मीडिया की ओर से किए गए
प्रसार का मतदाता के उपर कोई खास असर नहीं हुआ है? पिछले तीन-चार महीने से
एनडीटीवी इंडिया में खुद को कोड़े मारने की शैली का तेजी से विकास हुआ है जो
दरअसल उत्तर-आधुनिक मीडिया का एक लक्षण भर है,उसमें बतौर पंकज पचौरी ने इस शब्द
का इस्तेमाल किया कि- चैनलों पर घंटों-घंटो तक विश्लेषक बैठे रहते हैं, अपनी
बात करते हैं लेकिन दर्जनों एक्सपर्ट के एक्सपीरिएंस फेल हो जाते हैं। जाहिर है
इसमें खुद एनडीटीवी भी शामिल हैं। इन दोनों सवालों के जबाब में एक्सपर्ट और
आंकड़ों से जो बातें सामने निकलकर आयीं उस पर गौर करना जरुरी होगा।
राजनीतिक पार्टियों औऱ प्रत्याशियों की मीडिया और विज्ञापनों पर निर्भरता बढ़ते
जाने की सबसे बड़ी वजह है कि लोगों के बीच माध्यमों का प्रसार तेजी से बढ़ रहा
है। अगर हम इसके ठीक पहले के लोकसभा चुनाव की बात करें तो उस वक्त 2004 में
हिन्दी न्यूज चैनल देखनेवाले दर्शकों की संख्या 3.27 करोड़ थी जबकि 2009 तक
आते-आते ये संख्या 7.78 करोड़ तक हो गयी। इसी तरह अंग्रेजी चैनलों को लेकर बात
करें तो 2004 में 2.56 करोड़ लोग अंग्रेजी न्यूज चैनल देखा करते थे जबकि 2009
तक आते-आते ये 6.83 करोड़ हो गयी। अनुराग बत्रा( एडीटर इन चीज,एक्सचेंज फॉर
मीडिया) का साफ मानना है कि आप कुछ भी कह लीजिए लेकिन आनेवाले समय में चुनाव को
लेकर विज्ञापन और मीडिया का प्रसार औऱ असर बढ़ता जाएगा। इसकी एक बड़ी वजह ये भी
है कि आनेवाले समय में क्षेत्रीय स्तर की मीडिया औऱ चैनलों का तेजी से विकास
होगा,इंटरनेट जो कि अभी छोटे माध्यम हैं,वो भी तेजी से फैलेगा। इस मामले में
पी.एन.बासंती( डायरेक्टर,सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज) की बात पर गौर करें तो पहले
के मुकाबले चैनलों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। आप देखिए कि इसके
पहले केवल 20 के आसपास न्यूज चैनल थे जबकि अभी सौ से भी ज्यादा चैनल हैं। इसमें
पैसा बढ़ रहा है इसलिए जाहिर है कि इसका असर भी बढ़ेगा।इस हिसाब से बात करें तो
साफ है कि न्यूज चैनलों और मीडिया द्वारा चुनाव और राजनीतिक पार्टियों को लेकर
जो कुछ भी दिखाया जाता है, उसका लोगों पर असर होता है। शायद राजनीतिक पार्टियां
भी इस असर को बखूबी समझती है इसलिए हर चुनाव में विज्ञापन की राशि बढ़ती चली
जाती है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले साठ दिनों में राजनीतिक पार्टियों ने
600-800 करोड़ रुपये विज्ञापन के उपर खर्च किए। आंकड़े बताते हैं कि विज्ञापनों
पर सबसे ज्यादा खर्च बीजेपी(41 फीसदी) ने किए। उसके बाद
कांग्रेस(27%),बीएसपी(5%),शिरोमणि अकाली दल(4%),प्रजा राज्यं पार्टी(3%) और
अन्य(5%).2004 के लोकसभा चुनाव के विज्ञापन खर्चे से इसकी तुलना करें तो ये 15
गुना ज्यादा है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये बढ़ोतरी देश के विकास दर से
कितनी गुनी ज्यादा है।
लेकिन दूसरे सवाल के जबाब में कि ऐसा क्यों होता है कि चुनाव के बाद चैनलों के
सारे विश्लेषण झूठे साबित हो जाते हैं, ऐसा लगता है कि मतदाता के उपर न तो इन
विज्ञापनों का कोई असर हुआ है और न ही प्रचार-प्रसार का। इस सवाल के जबाब में शशि
शेखर( ग्रुप एडीटर,अमर उजाला)का स्पष्ट मानना है कि चुनाव को लेकर सारे
विश्लेषण शहरी लोगों के चंगुल में फंसकर रह जाते हैं। वो आंकड़ो को देखते हुए
विश्लेषण कर जाते हैं जबकि वास्तविक स्थिति कुछ और ही होती है। मैंने देखा है
कि उत्तराचंल में कोई एक आदमी अमर उजाला की दो-तीन प्रति लेकर ऐसे प्रांत में
जाता है जहां से कि बीस-बीस दिन तक लोग नीचे जमीन पर नहीं उतरते हैं। शशि शेखर
की बात को समझें तो मामला ये है कि जितनी रकम न्यूज चैनलों के विज्ञापन पर खर्च
किए जाते हैं उसके मुकाबले जनता तक उसकी पहुंच ही नहीं होती है। इस संदर्भ में
अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो-
देश के सिर्फ चौथाई घरों तक टेलीविजन की पहुंच है जिसमें भी कि केवल सात करोड़
घरों में केबल टेलीविजन हैं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि साठ दिन के भीतर लगभग
800 करोड़ रुपये उन दर्शकों पर खर्च किए जाते हैं जो कि कुल मतदाता संख्या के
बमुश्किल 14 से 15 फीसदी है। जाहिर है बाकी के लोगों के लिए इन विज्ञापनों का न
तो कोई मतलब है, न इन तक इसकी पहुंच है और न ही इससे इन्हें कोई लेना-देना है।
स्पष्ट तौर पर मतदाता कि संख्या दर्शकों की तुलना में कई गुना ज्यादा है और उन
मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है जो कि दर्शक के स्तर पर पिछड़े(टेलीविजन से न
प्रभावित होनेवाले)होने के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक रुप से पिछड़े हुए हैं।
आंकड़े बताते हैं कि देश में अभी भी 77 फीसदी लोग ऐसे हैं जिनकी रोज की आमदनी
20 रुपये के आसपास है। दर्शक और मतदाता के बीच का एक बड़ा विभाजन हमें साफ तौर
पर दिखाई देता है औऱ यही वजह है कि हमें विज्ञापनों और मीडिया प्रचार का कोई
खास असर नहीं दिखता।
इस बात को स्पष्ट करने के क्रम में पंकज पचौरी ने यूपीए सरकार की दो योजनाओं को
सामने रखा और तब विज्ञापन के बेअसर होने की बात की। यूपीए सरकार की दो योजनाएं
बड़ी महत्वपूरण रही। एक तो रोजगार गारंटी योजना जिसमें कि 52,2777 करोड़ रुपये
खर्च की योजना है और जिसका संबंध देश के 4.46 करोड़ परिवार से है और दूसरा
किसान की कर्ज माफी की योजना जिसमें कुल 65,000 करोड़ रुपये खर्च की योजना है
और इससे 3 करोड़ परिवार जुड़े हैं। दोनों परिवारों की संख्या जोड़ते हुए औसत
संख्या निकालें तो करीब 15 से 20 करोड़ की आबादी इस हालत में है जो कि टेलीविजन
नहीं देख सकती लेकिन पंकज पचौरी के हिसाब से यही आबादी सबसे ज्यादा वोट करती
है। यानी देश की वस्तुस्थिति स्टूडियों में बैठकर आंकड़ों के साथ गुणा-भाग
करनेवाले पंड़ितों की समझ से बिल्कुल अलग है। इन दोनों के बीच कोई संबंध ही
नहीं है। इसलिए अभिषेक मनु सिंघवी( कांग्रेस प्रवक्ता) ने साफ तौर पर कहा कि देशभर
में दो स्तर पर चुनाव लड़े जाते हैं, एक मीडिया के स्तर पर और दूसरा जमीनी स्तर
पर। ऐसा इसलिए किया जाता है कि इसमें मीडिया की दिलचस्पी होती है, इसमें पैसे
का खेल है। बतौर चंदन मित्रा (एडीटर,पायनियर)कवरेज को लेकर मीडिया के भीतर
साफ-साफ तौर पर सौदा होता है। पैसे के आधार मीडिया के लोग स्पेशल कवरेज,
कांफ्रेस और पक्ष में महौल बनाने की बात करते हैं। खबरों में पैसे लेकर लिखने
का चलन बढ़ा है।
इस पूरी स्थिति को देखते हुए आप चाहें तो कह सकते हैं कि लोकतंत्र के नाम पर
देशभर में एक बड़े स्तर पर धंधेबाजी चल रही है जिसमें कि खुद न्यूज चैनल शामिल
हैं,मीडिया शामिल है। आज अगर कोई चैनल इस पर स्टोरी करके इस समझ को हमारे सामने
रखता है तो हमें उसका शुक्रिया अदा करना चाहिए लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि
वो इस धंधे और खेल से बाहर है औऱ दूसरे चैनलों के मुकाबले उसे हमारे सीना तानकर
खड़े होने का कुछ ज्यादा ही हक है क्योंकि वहां भी इस सचेत कार्यक्रम के ठीक
तुरंत बाद जारी है- शिरोमणि अकाली दल को सहयोग कीजिए-भाजपा को वोट दीजिए।..
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: http://mail.sarai.net/pipermail/deewan/attachments/20090511/d0ee78d4/attachment-0001.html
More information about the Deewan
mailing list