[दीवान]संजय तिवारी की बात पर भावुक होना जरुरी है ?
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Fri May 15 13:26:45 IST 2009
विस्फोट.कॉम <http://www.visfot.com/> के मामले में संजय तिवारी के
इकरारनामा<http://www.visfot.com/index.php/voice_for_justice/913.html>
की
शुरुआती पंक्तियों को पढ़कर मेरी तरह कोई भी पाठक भावुक हो जाएगा। उसका भी मन
करेगा कि वो उनके पक्ष में संवेदना जाहिर करे,सहानुभूति के कुछ ऐसे शब्द सामने
रखे जिससे उन्हें लगे कि वो संजयजी के साथ है। ये शब्द गहरे तौर पर साबित करे
कि फिलहाल विस्फोट.कॉम <http://www.visfot.com/> के काम को रोक देने के फैसले
से न सिर्फ संजयजी का नुकसान हुआ है बल्कि एक पाठक की हैसियत से उनका भी भारी
नुकसान हुआ है,पूरी पत्रकारिता को एक गहरा झटका लगा है। इसलिए नीचे मिली
टिप्पणियों में आप ऐसे शब्दों के प्रयोग को देख रहे हैं तो इसमें कहीं कोई अचरच
ही बात नहीं है। वैसे भी हिन्दी समाज इस स्तर पर अभी तक संवेदनशील बना हुआ है
कि जब कोई इंसान यहां आकर अपना कलेजा निकालकर सामने रख दे तो सामनेवाले की
आंखों के कोर अपने आप भींग जाते हैं। ऐसी स्थिति में दोस्त-दुश्मन से उपर उठकर
भावना के स्तर पर एक हो जाना बुहत ही कॉमन बात है। यह बहुत ही स्वाभाविक स्थिति
है। संजयजी के प्रति लोगों के संवेदना के स्वर इसी भावना के स्तर पर एक हो जाने
का नतीजा है।
लेकिन इस संवेदना के शब्द से भला उनका क्या होना है। स्वयं संजय तिवारी के
शब्दों में बात करें तो- विस्फोट के कारण बहुत सारे ऐसे लोगों से मिलना हुआ जो
मानते हैं कि यह अच्छा और निष्पक्ष प्रयोग है और किसी भी कीमत पर यह बंद नहीं
होना चाहिए. उनकी इच्छा और सद्भावना भी सिर आखों पर. लेकिन केवल सद्भावना से
अच्छे काम चल जाते तो आज देश समाज की हालत ऐसी नहीं होती.
यह सहानुभूति बटोरने के लिए नहीं बल्कि अपने समर्पित पाठकों के सामने अपनी
वास्तविक स्थिित बयान कर रहा हूं. मैं थक चुका हूं. इसलिए इस काम को फिलहाल
अस्थाई तौर पर रोक रहा हूं.। जाहिर है खुद संजय तिवारी भी ये नहीं पसंद करते कि
कोई खालिस संवेदना जाहिर करे। ये उन्हें मानसिक स्तर पर लगातार काम करने के लिए
उर्जा तो दे सकता है लेकिन साधन के स्तर पर इससे कोई इजाफा नहीं होनेवाला
है।......अच्छे कामों को चलने के लिए भी धन की जरूरत होती है. साधन की जरूरत
होती है. आज विस्फोट जितना काम कर रहा है यह हमारे पास मौजूद साधन का अधिकतम
उपयोग है. लेकिन अब मैं भी छीज गया हूं. कुछ बचा नहीं है. महीने दर महीने का
संघर्ष अब रोज-ब-रोज के संघर्ष में बदल गया है. हालांकि चतुर खिलाड़ी की तरह
इतना खोलकर हमें बात नहीं करनी चाहिए लेकिन आप हकीकत को कब तक छिपा सकते हैं?
किसी न किसी दिन सच्चाई को स्वीकार करना ही होता है. और हमारी सच्चाई यह है कि
अब हम इस काम को स्तरीय और सम्मानजनक तरीके से चलाये रखने में असमर्थ हैं.
लेकिन इंटरनेट और डॉट कॉम के जरिए पत्रकारिता में एक बड़ी संभावना देख रहे
लोगों के लिए संजय तिवारी का ये इकरारनामा भावुक होने से ज्यादा चिंता पैदा
करनेवाला है। पूरी पोस्ट को पढ़ने के बाद गश खाकर गिर जानेवाला है।
जुम्मा-जुम्मा अभी दो-तीन साल ही हुए है जब हिन्दी डॉट कॉम चलानेवाले लोग
मैंदान में उतरे हैं और अगर इंटरनेट हिन्दी पत्रकारिता की बात करें तो ये
दुधमंहा बच्चा ही है। ऐसे में अभी ये पांव पसारने की गुंजाइश पैदा कर ही पाता
कि ये खबर मिल रही है कि विस्फोट.कॉम जैसी चर्चित साइट को फिलहाल के लिए रोका
जा रहा है लोगों के बीच क्या संदेश पैदा करता है,इस बात पर विचार किया जाना
जरुरी है। इस सवाल पर विचार करने के क्रम में जाहिर है कि न तोसंजय तिवारी की
समझ को और न ही भड़ास4मीडिया <http://bhadas4media.com/> के यशवंत सिंह के
समर्थन को कि-आज के दौर में 100 फीसदी इमानदारी से जीना बहुत मुश्किल है, वो भी
दिल्ली में खासकर को एक मानक स्थिति मानकर सोचा जा सकता है। इन लोगों के
अनुभव,तर्क और नजरिए पर जरुर विचार किए जाने चाहिए लेकिन बार-बार ईमानदारी का
झंड़ा लहराने से पहले इस बात पर जरुर समझ विकसित करनी होगी कि क्या अगर कोई डॉट
कॉम,साइट या पत्रकारिता का कोई भी रुप व्यावसायिक और प्रसार के स्तर पर सफल
होता है तो उस पर बेइमान हो जाने का लेबल चस्पा देने चाहिए। क्या ऐसा करना जायज
होगा? सफल होने का उदाहरण पेश करनेवाले यशवंत भी मेरी इस बात के पक्ष में
होगें। हिन्दी की ये वही मानसिकता है जहां पर आकर हम हर सफल पुरुष को बेइमान,दो
नंबर का आदमी और हर स्त्री को किसी न किसी के साथ समझौता करनेवाली मान लेते
हैं। संभव है कि एक हद तक इसमें सच्चाई भी हो लेकिन इसे पर्याय या मानक के तौर
पर स्थापित तो नहीं ही किया जा सकता है कि हर सफलता का मतलब है बेइमान हो जाना,
झूठा और मक्कार हो जाना। इसका तो यही मतलब होगा कि जो असफल है वो सबसे बड़ा
इमानदार है और जब तक उसने जो भी कुछ किया, सौ फीसदी ईमानदारी के स्तर पर किया।
क्या पत्रकारिता करते हुए या फिर जीवन जीते हुए इस तरह की फिलटरेशन हो पाता और
ऐसा होना संभव भी है?
चुनाव शुरु होने के पहले विस्फोट.कॉम की तरफ से ये घोषणा की गयी कि उन्हें इसकी
कवरेज के लिए पत्रकारों की जरुरत है। खबर लाने,खोजने,लिखने और विश्लेषण करने के
स्तर पर इस काम के लिए उन्हें मानदेय दिए जाएंगे। कुछ उत्सुक और जरुरतमंद लोगों
ने एप्रोच भी किया। विस्फोट.कॉम ने इस बीच विज्ञापन जुटाने की भी कोशिशें की।
जाहिर है ये सब कुछ व्यावसायिक शर्तों के आधार पर ही होता रहा। बाद में पैसे के
अभाव में मानदेय देने की बात टाल दी गयी। विज्ञापन को लेकर भी विस्फोट.कॉम को
कोई खास सफलता नहीं मिल पायी,ये तो इकरारनामा से ही साफ हो जाता है। आज विस्फोट
व्यावसायिक तौर पर असफल हो गया लेकिन संजयजी इस असफलता को सिर्फ अच्छा काम के
बंद हो जाने का मलाल के रुप में जाहिर कर रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि
हिन्दी पत्रकारिता में ऐसा करते हुए व्यवसाय और पत्रकारिता को एक-दूसरे से
घालमेल करते हुए ऐसी स्थिति पैदा कर दी जाती है कि अंत आते-आते एक महान कार्य
के अंत होने की घोषणा करने में सुविधा हो। क्या ये सही तरीका है कि कोई इंसान
भगवान की मूर्तियों की दूकान खोले और जब मूर्तियां नहीं बिके तो हर सामने
गुजरनेवाले बंदे से इस बात की उम्मीद करे कि वो भगवान के दर्शन के नाम पर कुछ
चढ़ावा चढ़ाता चला जाए ? विस्फोट पत्रकारिता के स्तर पर एक बेहतर काम करता आया
है, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता लेकिन इसकी व्यावसायिक असफलता को अच्छी
पत्रकारिता के असफल हो जाने का करार देना ज्यादती होगी। हम ये मानकर क्यों नहीं
चल पाते कि हम पत्रकारिता के नाम पर जो भी कुछ कर रहे हैं वो बाजार की बाकी
गतिविधियों की तरह ही एक हिस्सा भर है और हमें उसे व्यावसायिक शर्तों के आधार
पर ही चलाए रखना होगा। ये बातें सभी क्षेत्रों में समान रुप से लागू होती हैं।
साधना,संस्कार और दूसरे धार्मिक, आध्यात्मिक कंटेट को लेकर चलनेवाले चैनल भी
बाजर की शर्तों को फॉलो करते हैं न कि आध्यात्म और प्रवचन के शब्दों को।
पत्रकारिता करते हुए ये साफ करना देना होगा कि ये न्यूज प्रोडक्शन और
डिस्ट्रीव्यूशन से जुड़ा व्यवसाय है। एक पत्रकार के तौर पर महान होने और बदलाव
की आवाज बुलंद करनेवाले मसीहा के रुप में अपने को प्रोजेक्ट करने का मोह हर हाल
में छोड़ना ही होगा।
सच्चाई ये है कि बेबसाइट की संभावना और पत्रकारिता के लंबे अनुभव को साथ लेकर
जिस उत्साह से कुछ नया और बेहतर करने की उम्मीद से हमारे पत्रकार मैंदान में
उतरते हैं,बाजार,विज्ञापन,मार्केटिंग और रीडर रिस्पांस को लेकर उतना होमवर्क
नहीं करते। यही वजह है कि अच्छा काम करते हुए भी मार खा जाते हैं। अचनाक से या
तो कर्मचारियों की छंटनी या फिर उस काम को बंद करने की ही नौबत आ जाती है। हम
इस उम्मीद में क्यों रहें कि किसी को सपना आएगा कि फलां पत्रकार बहुत बेहतर काम
कर रहा है तो चलो उसकी मदद की जाए. ऐसा सोचनेवाले लोग तो अपने हिसाब से कमेंट
और सामग्री के स्तर पर सहयोग तो करते ही हैं लेकिन जिनके पास साधन है उन्हें ये
सपने न के बराबर आते हैं। उन्हें सपने आते भी हैं तो कुछ इस तरह से कि अगर हमने
फलां डॉट कॉम की मदद की तो उसकी सीधा लाभ हमें क्या मिलनेवाला है? पत्रकारिता
करते हुए हमें ऐसे लोगों को साधने की जरुरत है।
आज संजय तिवारी ने विस्फोट.कॉम का काम कुछ दिनों के लिए रोक देने की बात की. ये
उनका व्यक्तिगत फैसला है। लेकिन फर्ज कीजिए कि उनके इस काम से दस-बारह नौजवान
पत्रकार जुड़े होते तो उनके भरोसे का क्या होता? वो अभी कहां जाते, उनके पास तो
कोई खास अनुभव भी नहीं होता कि यहां छूटते ही कहीं और लग जाते। एक बेहतर
पत्रकार होने के नाते हममें से किसी की भी जिम्मेवारी सिर्फ खबर जुटाने, बेहतर
लिखने और बोलने भर तक नहीं है। हमारी जिम्मेवारी इस बात की भी है कि इस
प्रोफेशन में आनेवाले उन तमाम लोगों के बीच ये भरोसा कायम रखने की भी है कि
पत्रकारिता से अच्छा कोई दूसरा प्रोफेशन नहीं है और तुम्हें इसे औऱ आगे ले जाने
के लिए जी-जान से जुटे रहना होगा। अब इस लिहाज से आप वेब पत्रकारिता की संभावना
पर बात करते हुए सिर्फ भावुक होना चाहेंगे या फिर इसे पत्रकारिता की असफलता
मानने के बजाय मार्केटिंग के स्तर पर दुरुस्त होना चाहेगें।..
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