[दीवान]श्रीनगर, ढलान से उतरते हुए

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Wed May 27 02:14:58 IST 2009


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*श्रीनगर, ढलान से उतरते हुए*

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मौसम के लिहाज से यह समय श्रीनगर जाने और ठाठ से बीसेक दिन रहने का है। पर भारी
मन से ही सही, मुझे वहां से लौटे कुछ दिन बीत गए। दौरा चुनावी था और उसके अपने
कायदे थे। खैर! कश्मीर वादी से लौटने के बाद अब कुछ रीता सा अनुभव हो रहा है।
सोचता हूं- घूमना भी कायदे से पड़े, तो फिर घूमना क्या ?



वहां से लाई गई चीजें अब भी एक दूरी का भास कराती हैं। वे चेहरे अब भी खूब याद
आते हैं जो तफरीह के दौरान वादी में मिले थे। वैसे तो पांच-छह दिनों की मुहलत
किसी स्थान के बारे में पक्की राय कामय करने के लिए काफी नहीं है। लेकिन, इन
चार-पांच दिनों में वहां की फिजा आपको स्थानीय गाढ़े रंग से हल्का परिचय जरूर
करा देगी। इससे पहले कश्मीर जाने को लेकर एक ना-मालूम सा भय उत्पन्न होता था।
अजीब सी झिझक पैदा होती थी। इस यात्रा ने इन दोनों चीजों को अब खत्म कर दिया
है।



श्रीनगर से बडगाम करीब 35 से 40 किलोमीटर आगे है। इस दूरी को तय करते समय जो
कुछ दिखा उससे साफ हो गया कि कश्मीर में हालात बदलें हैं। वादी की जनता अमन और
सुकून के साथ अपना पूरा जीवन जीना चाहती है। यहां सुबह-सबेरे स्कूल जाती
छात्राओं को देखकर बड़ा ताज्जुब हुआ। इक-बारगी यह सपना सा मालूम पड़ता है।
लेकिन, बडगाम जिले के बीरु तहसील में स्कूल जा रही आठवीं कक्षा की एक छात्रा ने
पूछने पर ढलान से उतरते हुए बताया, “मैं रोजाना अपनी सहेलियों के साथ स्कूल
जाती हूं।” बच्ची के इस जवाब पर गाड़ी चला रहे व्यक्ति ने कहा, *“इंसा-अल्लाह
हम चाहते हैं कि दुनिया जाने की वादी में हालात अब बदले हैं।”*



खैर, जम्मू से रवाना हुई हमारी गाड़ी जब श्रीनगर पहुंची तो रात काफी हो चुकी
थी। अप्रैल की यह एक बेहद शांत, सूनी रात थी। ठंडी हवा शरीर में अजीब सिहरन
पैदा कर रही थी। दरअसल, जवाहर टनल पार करने के बाद जब गाड़ी ढलान से उतर रही
थी, तभी से ठंड का आभास हो चला था। ऐसी ठंड दिल्ली में रहते हुए हमलोग नवंबर के
आखिरी दिनों में महसूस करते हैं। अंततः हाउस बोट का एक कमरा किराए पर लिया।
लेकिन, पूरी रात बारामुला, पुलवामा, श्रीनगर आदि में हुई आतंकवादी घटनाओं से
जुड़ी वे खबरें याद आती रहीं, जिसे मैंने कभी अखबारों में पढ़ा था।



खैर, दूसरे दिन शहर घूमते समय मुझे तनिक भी महसूस नहीं हुआ कि मैं वहां एक
आउटसाइडर हूं। इस शहर में दो शाम गुजारने के बाद ऐसा लगा कि आप कितने भी
गैर-रोमैण्टिक हों, वादी की फिजा आपको जरूर रोमैण्टिक बना देगी। हालांकि, वादी
में टूरिस्ट युगल का तांता आना अभी शुरू नहीं हुआ है। पर ऐसा लगता है कि उन
दिनों यह शहर सचमुच अभी की अपेक्षा और भी नया व जवान दिखता होगा।



यह पहला अवसर था जब इस यात्रा के दौरान मुझे सूबे की राजनीति के भीतर झांकने का
मौका मिला। लेकिन, मुझे लगात है कि इस सफर के दौरान जुटाई गई बहुत-सी यादें व
सामान पीछे छोड़ने होंगे। हालांकि, मन इसकी गवाही नहीं देता। ऐसे में हरिवंश
राय बच्चन की एक कविता खूब याद आती है- *अंगड़-खंगड़ सब अपना ही, क्या जोडूं
क्या छोडूं रे।।*
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