[दीवान]बदहाल अस्पताल, बेहाल मनोरोगी

ravikant ravikant at sarai.net
Wed Nov 18 12:14:31 IST 2009


shukriya Vijay ji. aaj ke jagaran se sabhar.

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2009-11-18&pageno=9

विजय कुमार पांडे

साल  2001 के अगस्त महीने की 11 तारीख। सुबह तकरीबन 5 बजे। तमिलनाडु के इरावडी के 
एक मनोरोगी अस्पताल में आग लग गई। आग की भयंकर लपटों में 25 मनोरोगी जिंदा जलकर खाक 
हो गए। इनकी जान बच सकती थी, लेकिन इन्हें जंजीरों से बांधकर रखा गया था। इस खौफनाक 
घटना से संवैधानिक और सरकारी संस्थाएं भी दहल गई। 25 लोगों की दर्दनाक मौत ने मनोरोग 
अस्पतालों में मनोरोगियों की दयनीय दुर्दशा से देश-दुनिया का बावस्ता कराया। इस घटना के 
बाद माननीय उच्चतम न्यायालय ने मनोरोगियों की चिकित्सा, चिकित्सालयों और मरीजों की 
दशा सुधारने के लिए कई आदेश दिए। देश की सर्वोच्च अदालत ने मानवाधिकार आयोग को इसकी 
निगरानी का काम सौंपा। मानवाधिकार आयोग के सशक्त हस्तक्षेप के बाद पहली बार 
मनोरोगियों की बात की जाने लगी है। इस दौरान मानवाधिकार आयोग ने मनोरोगियों की 
दशा सुधारने के लिए कई सिफारिशें कीं और कई अहम कदम भी उठाए। इरावडी की खौफनाक 
घटना के 8 साल बाद अब मानवाधिकार आयोग ने देश को पांच जोन में बांटकर बड़े पैमाने पर 
इन सिफारिशों की समीक्षा शुरू की है। फिलहाल शुरुआती समीक्षा में हालात उम्मीद से कम ही 
दिख रहे हैं। इन समीक्षा बैठकों के दौरान खुद मानवाधिकार आयोग के सदस्य पीसी शर्मा ने 
सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों और दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन पर 
असंतोष जताया। अगर बयानों पर न जाकर आंकड़ों पर गौर करें तो आंकड़े इस नाउम्मीदी की 
दास्तां खुद-ब-खुद बयां करते हैं। देश में तकरीबन दो करोड़ गंभीर मनोरोगी हैं। उनके इलाज के 
लिए हैं फकत 40 सरकारी अस्पताल। ये हालात भारत में मनोरोगियों को लेकर बरती जाने 
वाली सरकारी संवेदनशीलता की कड़वी हकीकत बयां करते हैं। यह हकीकत दुनिया की चौथी 
सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत के सरकारी मशीनरी की है। यह हकीकत मनोरोगियों को लेकर 
सरकारी और गैर-सरकारी जागरुकता की खुली कहानी बयां करती है। सवा अरब की आबादी 
वाले भारत में हर साल तकरीबन ढाई लाख नए मरीज मनोरोग की चपेट में आ जाते हैं। यह तो 
हुई गंभीर मनोरोगियों की बात। देश भर में पांच करोड़ लोग मनोरोग की सामान्य बीमारियों 
की चपेट में हैं। देश में मनोरोगियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इनके लिए मुहैया 
सुविधाओं की हालत बहुत ही दयनीय है। मनोरोगियों को जरूरत होती है बेहतर देखभाल और 
उम्दा इलाज की, लेकिन हालात इससे जुदा हैं। मानवाधिकार आयोग और मनोरोगियों के लिए 
काम कर रही कई दूसरी संस्थाओं के अध्ययनों के मुताबिक अस्पताल में भर्ती 10 मनोरोगियों के 
लिए एक साइकाट्रिस्ट और 1.5 क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट की जरूरत होती है। जबकि अस्पताल 
में भर्ती 25 रोगियों पर एक साइकोलॉजिस्ट की जरूरत होती हैं। तीन से पांच रोगियों की 
देखभाल के लिए एक नर्स की जरूरत होती है, लेकिन हकीकत इसके उलट और बहुत ही भयावह है। 
एक आंकड़े के मुताबिक सवा अरब की आबादी वाले देश में मनोरोगियों के इलाज के लिए सिर्फ 
3300 मनोचिकित्सक हैं। इनमें से भी करीब तीन हजार देश के पांच बड़े महानगरों में हैं। देश की 
बाकी आबादी के लिए महज 300 मनोचिकित्सक हैं, जबकि कुल गंभीर मनोरोगियों में से 80 
फीसदी इन्हीं ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। मौजूदा हालात में कम से कम 10 हजार 
मनोचिकित्सकों की जरूरत है। जबकि हर साल देशभर के मेडिकल कॉलेजों से महज 400 
मनोचिकित्सक ही निकल रहे हैं। इसमें से तकरीबन 7 से 10 फीसदी अच्छे करियर और बेहतर वेतन 
की आस में परदेस की राह पकड़ लेते हैं। यह तो हुई मनोचिकित्सकों की बात। सहायक 
कर्मचारियों की हालत और भी खराब है। टोटा सिर्फ मनोचिकित्सकों और सहायक कर्मचारियों 
का ही नहीं है। मनोरोग के 40 सरकारी अस्पतालों की हालात भी कुछ ठीक नहीं है। इस वक्त 
भारत के 40 सरकारी अस्पतालों में करीब 20 हजार बिस्तर हैं यानी लगभग 33 हजार की 
आबादी पर एक बिस्तर। ये आंकड़े मनोरोगियों को मुंह चिढ़ाते हैं। हालांकि मानवाधिकार आयोग 
के दखल के बाद इन अस्पतालों की दशा में काफी बदलाव आया है। खासकर बेंगलूर के निमहांस 
अस्पताल में मनोरोगियों की दशा सुधारने और उन्हें बेहतर इलाज देने के लिए बहुत सारा काम 
हुआ है, लेकिन अब भी इनकी दशा में सुधार की गुंजाइश है। मानवाधिकार आयोग ने साफ 
चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में मनोरोगियों को लेकर हालात और गंभीर होने वाले हैं। 
ऐसे में जरूरत सुविधाओं के बेहतर विस्तार और प्रबंधन की है। लेकिन मानसिक रोगियों को लेकर 
सरकारी उदासीनता की तल्ख सच्चाई नौवीं योजना में उनके लिए आवंटित 100 करोड़ रुपये बयां 
करते हैं। उच्चतम न्यायालय और मानवाधिकार आयोग के दखल के बाद मानसिक रोगियों की दशा 
को लेकर सरकार भी कुछ जगी। 11वीं पंचवर्षीय योजना में इनके लिए 1000 करोड़ रुपये का 
प्रावधान किया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मनोरोगियों को 
बेहतर इलाज और जीवन दशा देने की कोशिशें होती रही हैं। संयुक्त राष्ट्र ने 1948 
मानवाधिकार घोषणापत्र और उसके बाद 1975 में अलग से डिसेबल्ड लोगों के अधिकारों की 
घोषणा करते समय मनोरोगियों के अधिकारों का साफ जिक्त्र किया। 1987 में मनोरोगियों के 
लिए मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 1987 पारित किया किया था। इसका मकसद मनोरोगियों के 
मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए प्रावधान बनाना है। इस अधिनियम में मनोरोगियों को 
रिसर्च के लिए ऑब्जेक्ट बनाने से रोकने का भी स्पष्ट प्रावधान किया गया था, फिर भी 
कानून से रोगियों के अधिकारों में कोई खास बदलाव नहीं देखा गया। मनोरोगियों के अधिकारों 
को लेकर समाज और खुद परिवार का रवैया ज्यादातर मामलों में बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना 
होता है। आम लोग आम बोलचाल की भाषा में मनोरोगियों को सीधे तौर पर पागल मानते हैं। 
मनोरोगियों की दुर्दशा उनके अपनों से ही शुरू होती है। आम लोगों की आम मान्यता यही है 
कि मनोरोगी कभी भी ठीक नहीं हो सकते है। इसके चलते ज्यादातर मामलों में अपने ही बेगानों 
से बदतर व्यवहार करते हैं। अब भी ग्रामीण इलाकों में इलाज की बजाए झाड़-फूंक पर ज्यादा 
जोर दिया जाता है। ऐसे रोगियों को समाज की निगाहों में भी तिरस्कार ही मिलता है। 
इनके इलाज के लिए बने अस्पताल भी इन्हें ज्यादातर जख्म ही देते हैं। फंतासी की दुनिया की 
सैर कराने वाले बॉलीवुड ने भी मनोरोगियों पर कई फिल्में बनाई हैं, लेकिन बॉलीवुड की रंगीन 
दुनिया भी मनोरोगियों की अंधेरी दुनिया की तस्वीर समाज के सामने खींच पाने में नाकाम 
रही हैं। तेजी से बढ़ती मनोरोगियों की संख्या के चलते जरूरत जहां भारी संख्या में नए मनोरोग 
चिकित्सकों की है, वहीं बड़ी संख्या में नए अस्पतालों की स्थापना की भी जरूरत है। लेकिन 
जहां करोड़ों नागरिकों को कायदे से दो जून की रोटी मुहैया नहीं है, वहां इससे ज्यादा की 
उम्मीद करना कई बार बेमानी लगता है।


More information about the Deewan mailing list