[दीवान]Fwd: क्या 'कादम्बिनी' का अवसान करीब है? (kya yeh band honi chahiye?)

Ravikant ravikant at sarai.net
Tue Sep 22 18:05:21 IST 2009


किसी भी पत्रिका का बंद होना वैसे तो अफ़सोसनाक होना ही चाहिए. पर यहाँ उद्धृत ख़यालात से 
लगता है कि कादंबिनी कुछ सही नहीं जा रही थी, और उसका चले जाना ही बेहतर है. मैंने भी काफ़ी 
समय से उसको पढ़ने की ज़रूरत नहीं समझी. एकाध बार ललक कर उठाया भी तो एकाध चीज़ पढ़ कर 
पटक देने के लिए ही.  मेरा अपना बचपन धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादंबिनी और नवनीत की 
संगति में बीता है. एक समय था जब राजेन्द्र अवस्थी बहुत बड़े काल-चिंतक लगते थे, क्योंकि वो चौंका 
देने वाली बातों की पूरी क़तार खड़ी कर देते थे. पर बाद में तो हमें लगने लगा कि कोरा बकवास कर 
रहे हैं. ख़ास तौर पर जब भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र के विशेषांक अबाध रूप से छपने लगे तो निराशा होने 
लगी थी. बहरहाल कोई भी पत्रिका अगर लाखों की तादाद में बिकती थी तो ज़रूर कोई न कोई 
तबक़ा उसे काम की चीज़ मानता होगा. मत भूलिए कि कई शहरों में कादंबिनी क्लब थे, लोग उसके 
मँड़वे तले नाना प्रकार के साहित्यिक आयोजन करते थे, और कादंबिनी का स्तर बनाए रखने की 
अपनी तरफ़ से काफ़ी कोशिश करते थे. और कई नए कवियों ने तो अपने हस्ताक्षर
 पहले-पहल वहीं किए होंगे. 

अगर आप इसे नॉस्टैल्जिया मानकर ख़ारिज न कर दें तो मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि डॉ. सरोजनी
 प्रीतम की हँसिकाएँ मैं बड़े चाव से पढ़ता था. यह एक बिल्कुल नई विधा थी, हास्य-व्यंग्य से लबरेज़ 
चुटीली और बाक़ायदा गेय. बुद्धि विलास नामक स्तंभ कभी-कभी अच्छा होता था, पारिभाषिक शब्दा
वली वाला स्तंभ तो वाक़ई उपयोगी होता था. पर सबसे मज़ा मुझे उसके सबसे बड़े
 स्तंभ - सार-संक्षेप - को पढ़ने में आता था. दुनिया भर की कई शास्त्रीय साहित्यिक कृतियों से मेरी 
पहली मुलाक़ात इसी स्तंभ के ज़रिए हुई. उनको मूल से तो मिलाने का कभी मौक़ा नहीं मिला पर
 लगता था कि उस स्तंभ पर काफ़ी मेहनत किया जाता था, वह हिन्दी पाठकों के लिए शेष 
विश्व साहित्य का झरोखा सा था. और उसमें प्रवाह भी अद्भुत होता था, यानी उल्था करने वाले की 
प्रतिभा की आपको तारीफ़ करनी पड़ेगी. 

पर घर से हाॉस्टल आने पर कादंबिनी का साथ जैसे छूट गया. कोई ढंग का संपादक उठाकर चला ले तो 
शायद अच्छा होगा. या वक़्त बदल गया है, और कादंबिनी टाइप के पाठक क्या अहा ज़िन्दगी पढ़ने 
लगे हैं, जैसे कि मैं? 

रविकान्त






----------  आगे भेजे गए संदेश  ----------

Subject: क्या 'कादम्बिनी' का अवसान करीब है? (kya yeh band honi chahiye?)
Date: मंगलवार 22 सितम्बर 2009 00:34
From: Hind Yugm <hindyugm at gmail.com>
To: undisclosed-recipients:;

एक समय की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रिका 'कादम्बिनी' अपने बुरे
दिनों से गुजर रही है। हिन्द-युग्म ने राजेन्द्र यादव, पंकज बिष्ट, मदन कश्यप,
भारत भारद्वाज, रामजी यादव, प्रमोद कुमार तिवारी, विमल चंद्र पाण्डेय और गौरव
सोलंकी जैसे बुद्धिजीवियों से इस विषय पर राय ली कि कादम्बिनी का भविष्य क्या
है? और इसकी यह हालत आखिर हुई कैसे?

आप भी पढ़ें और अपनी महत्वपूर्ण राय दें-
http://baithak.hindyugm.com/2009/09/kadambini-ke-sarokar-samkalinata-sawal.ht
ml

आपकी राय महत्वपूर्ण हैं।

धन्यवाद।

निवेदक-
www.hindyugm.com

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