[दीवान]छोटे चैनलों का सच

Rakesh Singh rakeshjee at gmail.com
Thu Sep 24 17:27:57 IST 2009


क्‍यों भइया
इतना कमज़ारे हैं क्‍या लेखक महोदय. बहरहाल, ठीक रही बात.

शुक्रिया

2009/9/23 आशीष कुमार 'अंशु' <ashishkumaranshu at gmail.com>

> *यह लेख तो मीडिया स्कैन के लिए लिखा गया था, लेकिन लेखक नहीं चाहते थे कि
> लेख के साथ उनका नाम भी जाए, इसलिए इसे ब्लौग पर डाल रहा हूँ. चूकि बात आप
> लोगों तक पहुँचे*.------------
> --------------------------------------------------
> दिल्ली के खजुरीखास इलाके की स्कूल में हुए भगदड़ में सात छात्राओं की मौत की
> खबर क्या आई... इलेक्ट्रानिक मीडिया के कई दुकानों में जैसे खलबली सी मच गई...
> जिन चैनलों के पास अपने संसाधन है... उन ने तो जमकर खबर को बेचा... लेकिन कुछ
> छोटे दर्जे के चैनल को भी तो अपनी दुकान चलानी है.... अभी मैं चैनल पहुंचा ही
> था कि आउटपुट एडिटर की आवाज मेरे कानो में गुंजी... अरे यार काट लो काट लो...
> अब आप सोच में पड़ गए होंगे कि आखिर काटना क्या है... चलिए हम ही बता देते
> है... दरअसल ये सारी कवायद दूसरे चैनल पर आ रहे विजुअल को कैप्चर करने या
> बिंदास कहे तो उसे चुराने की चल रही थी...अरे भईया मैं ये क्या कह गया.... आखिर
> मैं भी तो इसी दुकान में काम करता हूं... तो फिर मालिक के खिलाफ ऐसी
> नाफरमानी... चलिए जब कुछ भड़ास निकलना ही है तो जमकर निकाला जाए... मुझे न तो
> अपने संस्थान से शिकायत है और न ही इस ग्लैमर की दुनिया से ही कोई गिला...
> शिकायत तो बस कुकरमुत्ते की तरह उपज रहे इन छोटे दर्जे की चैनलों से है... चैनल
> के नाम पर इन्हे लाइसेंस तो मिल जाता है लेकिन इनकी पहुंच बस चैनल के मालिकों
> तक ही सिमटी होती है... कुछ तो ऐसे चैनल भी है जिसका नाम कभी नहीं सुना पर कहने
> को नेशनल चैनल है...ऐसा नहीं कि इस चैनल में काम करने वालों को सैलरी नहीं
> मिलती... मिलती है पर कब मिलती और कब खत्म हो जाती इसका तो पता ही नहीं
> चलता...मतलब नहीं समझे तो लिजिए समझ लिजिए... दरअसल इन चैनलों में वैसे लोग ही
> आते है जिनकी सोच यहां आने से पहले तो क्लियर रहती है लेकिन जैसे जैसे मीडिया
> के वास्तवित रुप से रु-ब-रु होते है... एक अलग ही सोच विकसित हो जाती है... फिर
> भी नहीं समझे... अरे भाई ये लोग इन चैनलों को सफलता की पहली सीढ़ी समझकर इस पर
> चढ़ तो जाते है लेकिन अगली सीढ़ी के लिए बस तरसते रह जाते है....उसके बाद उम्र
> से पहले ही बुजुर्ग की तरह मीडिया में आए बस आए नए छात्रों को उपदेश ही देते रह
> जाते है... कि भईया अभी भी समय है सभंल जाओ... नहीं तो बस फंस गए तो फंस गए।
> *( लेखक परिचय- लेखक एम एच वन, एस वन, फोकस, आजाद, प्रज्ञा में से किसी एक
> चॅनल में कार्यरत हैं...)*
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