[दीवान]उदयप्रकाश
shashi kant
shashikanthindi at gmail.com
Tue Apr 6 17:27:04 IST 2010
उर्दू के बहुचर्चित शायर और हमारे मित्र फ़ारूक आफ़रीदी साहब ने अपने गुलाबी
शहर जयपुर से अभी-अभी फेसबुक पर एक तोहफ़ा भेजा है- आज के दौर के हम सबके बेहद
प्रिय कथाकार उदयप्रकाश के साथ बातचीत के अंश. उदय जी के साथ यह बातचीत
उन्होंने दिसंबर के आख़िरी हफ़्ते में जयपुर में आयोजित लेखक-पाठक संवाद के
दौरान की थी, हम भी उदय जी के साथ थे. वक्त निकालकर पढ़ सकते हैं. शुक्रिया. -
शशिकांत
*हिंदी का भविष्य उज्वल है*
[image: Left]
[image: Uday Prakash]
[image: Left]
*उदयप्रकाश हिन्दी साहित्य संसार के प्रतिष्ठित और चर्चित कथाकार हैं। इनकी
रचनाएं न केवल भारतीय भाषाओं, बल्कि कई विदेशी भाषाओं में अनुदित होकर लोकप्रिय
हुई। उदय प्रकाश की कहानियों में जहां कविताओं जैसी रवानगी और सरसता है, वहीं
वे समय की विसंगतियों को बहुत शिद्दत से कुरेदती और सवाल खडा करती हैं।
प्रस्तुत है कथाकार उदयप्रकाश से फारूक आफरीदी की हाल ही हुई बातचीत के प्रमुख
अंश-
*
*मूलत: आप कवि हैं और आपके गद्य में भी कविता की सी अनुभूति होती है। फिर क्या
कारण है कि आपकी विशेष पहचान एक कथाकार-उपन्यासकार के रूप में अधिक है*
यह सही है कि मैं मूलत: कवि हूं। मैंने बहुत सारी कविताएं लिखीं और चित्र भी
बनाए हैं। मैंने कॉलेज समय में एक कहानी लिखी थी जो बहुत लोकप्रिय हुई। मैं
समझता हूं कि कहानी के पाठक अधिक होते हैं और वह ज्यादा लोगों तक पहुंचती है।
उसे लोकप्रियता अधिक मिलती है। मैं लगभग इसी तरह का एक कुम्हार हूं जिसने कमीज
सिल दी, तो लोग उसे दर्जी समझने लगे। लोग फिर सुराही लेने उसके पास नहीं
जाएंगे, जबकि कुम्हार जानता है कि मिट्टी का काम वह ज्यादा अच्छे तरीके से कर
सकता है और उसमें ही ज्यादा आनंद मिलता है। मेरे साथ यही है कि कवि होते हुए भी
कहानी लिखकर समाज की सेवा कर रहा हूं। वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने एक बार कहा
भी है कि मेरी कहानियां दरअसल मेरी कविताओं का ही विस्तार हैं। कहानियां लिखते
हुए मुझे भी नहीं लगता कि मैं कहानियां लिख रहा हूं, बल्कि जो काव्यात्मक
संवेदना कविता में नहीं आ रही वह कहानियों में आ रही है। निर्मल वर्मा और ऎसे
कई कहानीकारों के साथ भी लगभग यही रहा। उनकी कहानियां पढते हुए ऎसा लगता है
जैसे कविताएं पढ रहे हैं। मैं कहानी लिखते हुए भी कवि हूं और कवि सदा कवि ही
रहता है।
*आप पहले भारतीय हिन्दी लेखक हैं जिन्हें जर्मनी के 23 शहरों में व्याख्यान के
लिए आमंत्रित किया गया। व्याख्यानों के विषय क्या रहे *
जर्मन लोगों की भारत में गहरी रूचि है। मेरे व्याख्यान विभिन्न विषयों पर थे,
लेकिन इंडोलोजी मुख्य विषय रहा। वहां भारत के नगरीकरण को लेकर बडी जिज्ञासाएं
हैं। अपने प्रवास के दौरान मुझे कई छोटे-बडे 23 शहर-कस्बों और गांवों में
व्याख्यान देने का मौका मिला। मैंने यहां अपनी कहानी 'और अंत में प्रार्थना' को
अपनी तरह से पढा तो लोगों ने ऎसा अनुभव किया जैसे यह उनके अतीत की कहानी हो,
क्योंकि वहां के लोग भी 1943-45 में ऎसी ही बर्बरता से गुजरे हैं। कुछ संकेत
वैश्विक होते हैं। मेरे कहानी संग्रह 'और अंत में प्रार्थना' को अवार्ड मिला
है। इसका जर्मनी में अनुवाद वहीं के 29-30 साल के युवा लेखक आन्द्रे पेई ने
किया है।
*आपकी कहानियों की संरचना विशिष्ट और कुछ अलग प्रकार की होती है। आप इन कथाओं
के सूत्र कहां से तलाशते हैं *
जीवन में आप जितना डूबेंगे उतना ही अच्छा लिख पाएंगे और ज्यादा लोगों तक
पहुंचेंगे। कोई चीज लिखना बिना जीवन जिए संभव नहीं है, क्योंकि इससे ही
अनुभव-संसार बढता है। अगर आप अपने समय के मनुष्य के संकट और उसके यथार्थ को
व्यक्त करेंगे जिसमें हर कोई जी रहा है, तो वह साहित्य अवश्य ही लोकप्रिय होगा।
अगर साहित्य किसी बाजार या एक सीमित वर्ग को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है, तो
बात अलग है। अगर कोई बडा उद्देश्य सामने रखकर साहित्य लिखा जाएगा तो उसका
सम्मान होगा।
*आप अपने समय के सबसे बडे और चर्चित कथाकार हैं। अपने समय के बडे यथार्थ को आप
उद्घाटित करते हैं। अपनी चर्चित कृतियों में 'मोहनदास' मेंगोसिल, नीली छतरी
वाली लडकी या ऎसी ही अन्य कथाओं को रचते हुए आपकी दृष्टि में क्या बातें रहीं*
'मोहनदास' अपने समय के प्रश्नों को कुरेदता है। मोहनदास एक सचमुच का पात्र है।
वह आज भी है एक दलित व्यक्ति पूरी मेहनत के साथ पढ-लिखकर मेरिट से आगे बढता है,
लेकिन हमारी लोकतांत्रिक स्थितियों में आज भी ऎसे व्यक्तियों के लिए कोई ठिकाना
नहीं है। एक नकली मोहनदास नौकरी पा लेता है और असली मोहनदास दर-दर भटकने को
मजबूर है। ऎसे ही मैंने हर कृति में समय के सच और विडंबनाओं के बीच जीवन जीने
की मजबूरियों को उद्घाटित किया है।
भारतीय और विदेशी भाषाओं में आपकी पुस्तकों के अनुवाद हुए हैं। अमरीकी पाठकों
का रेस्पोंस कैसा रहा
मेरे उपन्यास 'पीली छतरी वाली लडकी' का अनुवाद 29-30 वर्ष के एक युवा अमरीकन
लेखक जीसोन ग्रूनबाम ने किया। इस अनुवाद के लिए उन्हें वर्ष 2005 का पेन
यू.एस.ए. अनुवाद कोश सम्मान मिला। शिकागो मेे इस उपन्यास का लोकार्पण हुआ और
इसे काफी लोकप्रियता मिली। छात्र तो हर जगह इसे पसन्द करते हैं, क्योंकि प्रेम
तो वैश्विक है। जीसोन हाल ही भारत आए तो उन्होंने बताया कि वे मेरे कहानी
संग्रह 'मेंगोसिल' का अनुवाद कर रहे हैं।
*हिन्दी लेखकों को अंग्रेजी लेखकों के मुकाबले कम तरजीह क्यों मिलती है*
भारतीय लेखकों का भी सम्मान तो होता है, लेकिन भारत के या एशियाई साहित्य का
स्वीकार और बडा होना चाहिए। अंग्रेजी में हम देखते हैं कि जो कुछ भी नहीं है
उसी भाषा में सब अवार्ड मिलते चले जाते हैं। इस बार एक अच्छी बात यह हुई कि
साहित्य का तीसरा अवार्ड मेरी कृति 'और अंत में प्रार्थना' को मिला, जबकि इसमें
अरविन्द अडिगा का अंग्रेजी उपन्यास भी था जिसे छठवां स्थान मिला। इससे हम कह
सकते हैं कि चीनियों से तो हम काफी पीछे रहे लेकिन हिन्दी साहित्य ने अंग्रेजी
को काफी पीछे छोड दिया है।
*भारतीय समाज और लेखक के बीच क्या कोई अन्तरंग रिश्ता है*
हमारे यहां सामाजिक स्थितियां बडी भयावह हैं, क्योंकि 28 करोड भारतीयों का भारत
अलग है और उसके अलावा एक दूसरा भारत है, जबकि वृहत्तर भारत की चिंता केन्द्र
में होनी चाहिए। एक लेखक ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, लेकिन वह केवल लिख सकता है।
रूसो की अवधारणा पर लोकतंत्र पैदा हुआ। उनकी एक प्रसिद्ध सूक्ति है कि परिवर्तन
के पहले समाज रूढि अवस्थाओं में रहता है। हमारा समाज परिवर्तन के पहले का समाज
है। मेरा मानना है कि परिवर्तन तो होकर रहेगा। जिस दिन यह परिवर्तन हो जाएगा उस
दिन लेखक का दायित्व बदल जाएगा।
आप हिन्दी साहित्य का भविष्य कैसा देखते हैं
हिन्दी साहित्य का भविष्य बहुत उज्वल है। कहने वाले कह रहे हैं कि आने वाला समय
हिन्दी भाषा को नष्ट और भ्रष्ट कर रहा है, तो ऎसा कुछ नहीं है। हिन्दी भारत की
ताकत रही है। हर परिवर्तन को आत्मसात करना उसे आता है और जो रखने योग्य नहीं है
उसे बाहर करना भी आता है। हिन्दी लगातार समृद्ध हो रही है। हिन्दी भारतीय
भाषाओं, बोलियों और विश्व की भाषाओं से तमाम तरह के शब्द, व्यंजनाएं, मुहावरे
और बहुत सारी चीजें ले रही है।
*आपका बचपन कैसे बीता *
मैं मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के एक छोटे से गांव सीतापुर में पैदा हुआ। आज
भी वहां मिट्टी के 18 घर हैं। हमारा घर पक्का और पुराना है। गांव के पीछे एक
बहुत बडी सोन नदी बहती है। जहां से सोन का उद्गम है उसी से कुछ दूर नर्मदा का
उद्गम है। अमरकंटक मेरे गांव से पैदल जाएं, तो 23 किलोमीटर दूर है। मेरा जन्म
1952 में हुआ तब वहां बिजली नहीं थी। हम लोग लालटेन और ढिबरी की रोशनी में पढते
थे। पुल नहीं था, इसलिए गांव के सभी लोग तैरना जानते हैं। पांचवीं कक्षा के बाद
नदी को तैर कर स्कूल जाना होता था। कलम, फाउण्टेन पेन यह सब बाद में आया। हम
शुरू में लकडी की पाटी पर लिखते थे छठे दर्जे से अंगे्रजी पढाई जाती थी। मैं
जहां पर था, वहां छत्तीसगढ था और मध्य प्रदेश का सीमान्त है। मेरा गांव
छत्तीसगढ सीमा में है। मेरी मां भोजपुर की और पिताजी बघेल के थे।
*आपने 'मेंगोसिल' कहानी की संवेदना, शिल्प और कथ्य की दृष्टि से अद्भुत संरचना
की है। यह सब कैसे कर पाते हैं *
'मेंगोसिल' मेरे इर्द-गिर्द घटी एक सच्ची घटना पर आधारित है। एक सफाई कर्मचारी
के परिवार में 45 साल की उम्र में पहली संतान पैदा हुई तो बहुत खुशी हुई, लेकिन
कुछ समय बाद एक वज्रपात सा हुआ कि बच्चे का सिर असंतुलित रूप से बडा हो रहा है।
बताया गया कि वह जीवित नहीं रहेगा। ज्यों-ज्यों बच्चा बडा होता गया तो घर की
चिंताएं बढती गई, लेकिन उसका दिमाग बहुत तेज था। वह जगत की सब चीजों को समझता
था। घर के लोगों की उपेक्षा के बावजूद उसकी मां जीवन के सारे सुख उसके लिए
जुटाने में लगी थी। इस बीच घर में ध्यान हटाने के लिए नए बच्चे के जन्म लेने की
घटना होती है। यह कथा विसंगतियों पर बुनी गई है जिसमें संवेदना को विशेष रूप से
उभारा गया है।
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: http://mail.sarai.net/pipermail/deewan/attachments/20100406/36b09fc3/attachment-0001.html
More information about the Deewan
mailing list