[दीवान]'पीपली लाइव' देखने के बाद ....

shashi kant shashikanthindi at gmail.com
Thu Aug 19 13:08:43 IST 2010


 'पीपली लाइव' देखने के बाद
....<http://shashikanthindi.blogspot.com/2010/08/blog-post_6777.html>

*वीरू : “कूद जाऊँगा...फाँद जाऊँगा... मर जाऊँगा…हट जाओ...”*
* गाँव वाला -१ : “अरे-अरे ये क्या कर रहे हो?”
वीरू : “वही कर रहा हूँ जो मजनूं ने लैला के लिए किया था, रांझा ने हीर के लिए
किया था रोमियो ने जूलियट के लिया था, सुसाइड, सुसाइड…
गाँव वाला-२ : “अरे भाई ये 'सुसाइड' क्या होता है?”
गाँव वाला-३ :"अँग्रेज़ लोग जब मरते हैं तो उसे 'सुसाइड' कहते हैं.”**गाँव
वाला-२ : **“लेकिन ये अँग्रेज़ लोग मरते क्यों हैं?”
**गाँव वाला-३ : **“वो….”**गाँव वाला -१ : **“अरे भाई बात क्या है? तुम सुसाइड
क्यों करना चाहते हो?”
वीरू : “ये मत पू्छो चाचा, तुम्हारे आँसू निकल आएँगे. ये बड़ी दुख भरी कहानी
है. इस स्टोरी में इमोशन है, ड्रामा है, ट्रेजडी है!!!"*
*#शोले *

*“हम किसानों पर फिल्म बनाने चले थे लेकिन बन गई मीडिया पर…!” *
*# महमूद फारूकी (सह-निर्देशक, ‘पीपली लाइव’)*

मित्रो,
आमिर ख़ान प्रोडक्शन के बैनर तले अनूषा रिज़वी और महमूद फारूकी के निर्देशन में
अभी हाल में रीलीज़ हुई फिल्म ‘पीपली लाइव’ की कहानी किसानों की आत्महत्या के
इर्द-गिर्द घूमती है.

मैने जो पढ़ा है, पिछले सालों में किसानों की 'सुसाइड' करने की जो भी घटनाएँ
घटी हैं और घट रही हैं वे महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में ज़्यादातर.

मेरा मानना है कि ये सुसाइड उन किसानों ने की है और कर रहे हैं जो व्यावसायिक
खेती कर रहे थे/हैं, और जो बॅंक लोन के जाल में फँस गये थे/हैं.

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे ग़रीब राज्यों के किसान चाहे
जितने भी बदहाल, फटेहाल और लाचार हों और भारी से भारी तकलीफ़ में जी रहे हों
लेकिन वे आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाते.

आख़िर क्यों?

मुझे खेद है कि ’पीपली लाइव’ फिल्म में किसानों की आत्महत्या की समस्या को ग़लत
पृष्ठभूमि में पेश किया गया है, 'शोले' के वीरू (धर्मेंद्र) की तरह सुसाइड का
ख़ूब ड्रामा करते हैं दोनों भाई, और भी बहुत से झोल हैं फिल्म में...वो सब अगली
डाक में...!
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