[दीवान]Fwd: 'पीपली लाइव' देखने के बाद ....
avinash das
avinashonly at gmail.com
Thu Aug 19 13:30:50 IST 2010
---------- Forwarded message ----------
From: avinash das <avinashonly at gmail.com>
Date: 2010/8/19
Subject: Re: [दीवान]'पीपली लाइव' देखने के बाद ....
To: khadeeja arif <arif.khadeeja at gmail.com>
Cc: shashikanthindi at gmail.com
खदीजा, आप मुझे भी तो बात करने दीजिए। अगर शशिकांत ने अपनी तरह से फिल्म समझा
है - तो उनसे बात न करें? मुंह फेर लें? एक फिल्म को दो लोगों ने देखी और उनका
नजरिया अलग-अलग है - तो क्या वे बात न करें और अपनी अपनी समझदारी को छुपाये
रखें? हम अपनी बात लिख रहे हैं - शशिकांत अपनी - बेहतर हो, आप भी अपनी लिखें।
2010/8/19 khadeeja arif <arif.khadeeja at gmail.com>
Avinash
> Her ek ko haq hai film apni tarah se samjhne ka... Shashkinat ko jo laga
> woh likh rahe hain! yeh bhi film ki saflta hi hai ki us per baat tau ho rahi
> hai.. phir chahe woh kisi bhi nazarye se ho!
> Best
> K
>
> 2010/8/19 avinash das <avinashonly at gmail.com>
>
> शशिकांत जी, दरअसल आपने फिल्म को समझा ही नहीं। ये न तो किसानों की समस्या
>> पर एक डॉकुमेंट्री फिल्म है, न ही भारतीय मीडिया का कोई समाजशास्त्रीय
>> विश्लेषण। ये फिल्म इस देश की उलझी हुई बुनावट के भीतर छिपी ढेर सारी
>> विडंबनाओं पर एक फीकी हंसी हंसने की कोशिश है।
>>
>> शुरू से अंत तक ये एक इंटरटेनमेंट फिल्म है। किसान की समस्या, लोन और
>> खुदकुशी तो एक प्रतीक है - उसके बहाने मीडिया और राजनीति के खेल पर एक कार्टून
>> बनाने की कोशिश है ये फिल्म।
>>
>> आप अजीत अंजुम की भाषा में बात मत कीजिए। विदर्भ में हुआ फिल्म का विरोध एक
>> स्टंट है। मुझे पूरी उम्मीद है कि विदर्भ के किसानों ने पीपली लाइव नहीं देखी
>> होगी। क्या आपको याद है, मीडिया का वो तमाशा - जिसमें किरदार राहुल गांधी है
>> और विदर्भ की एक विधवा है। आपको पता है, उस विधवा का क्या हुआ?
>>
>> 2010/8/19 shashi kant <shashikanthindi at gmail.com>
>>
>>> 'पीपली लाइव' देखने के बाद ....<http://shashikanthindi.blogspot.com/2010/08/blog-post_6777.html>
>>>
>>> *वीरू : “कूद जाऊँगा...फाँद जाऊँगा... मर जाऊँगा…हट जाओ...”*
>>> *गाँव वाला -१ : “अरे-अरे ये क्या कर रहे हो?”
>>> वीरू : “वही कर रहा हूँ जो मजनूं ने लैला के लिए किया था, रांझा ने हीर के
>>> लिए किया था रोमियो ने जूलियट के लिया था, सुसाइड, सुसाइड…
>>> गाँव वाला-२ : “अरे भाई ये 'सुसाइड' क्या होता है?”
>>> गाँव वाला-३ :"अँग्रेज़ लोग जब मरते हैं तो उसे 'सुसाइड' कहते हैं.”**गाँव
>>> वाला-२ : **“लेकिन ये अँग्रेज़ लोग मरते क्यों हैं?”
>>> **गाँव वाला-३ : **“वो….”**गाँव वाला -१ : **“अरे भाई बात क्या है? तुम
>>> सुसाइड क्यों करना चाहते हो?”
>>> वीरू : “ये मत पू्छो चाचा, तुम्हारे आँसू निकल आएँगे. ये बड़ी दुख भरी कहानी
>>> है. इस स्टोरी में इमोशन है, ड्रामा है, ट्रेजडी है!!!"*
>>> *#शोले *
>>>
>>> *“हम किसानों पर फिल्म बनाने चले थे लेकिन बन गई मीडिया पर…!” *
>>> *# महमूद फारूकी (सह-निर्देशक, ‘पीपली लाइव’)*
>>>
>>> मित्रो,
>>> आमिर ख़ान प्रोडक्शन के बैनर तले अनूषा रिज़वी और महमूद फारूकी के निर्देशन
>>> में अभी हाल में रीलीज़ हुई फिल्म ‘पीपली लाइव’ की कहानी किसानों की आत्महत्या
>>> के इर्द-गिर्द घूमती है.
>>>
>>> मैने जो पढ़ा है, पिछले सालों में किसानों की 'सुसाइड' करने की जो भी घटनाएँ
>>> घटी हैं और घट रही हैं वे महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में ज़्यादातर.
>>>
>>> मेरा मानना है कि ये सुसाइड उन किसानों ने की है और कर रहे हैं जो
>>> व्यावसायिक खेती कर रहे थे/हैं, और जो बॅंक लोन के जाल में फँस गये थे/हैं.
>>>
>>> बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे ग़रीब राज्यों के किसान
>>> चाहे जितने भी बदहाल, फटेहाल और लाचार हों और भारी से भारी तकलीफ़ में जी रहे
>>> हों लेकिन वे आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाते.
>>>
>>> आख़िर क्यों?
>>>
>>> मुझे खेद है कि ’पीपली लाइव’ फिल्म में किसानों की आत्महत्या की समस्या
>>> को ग़लत पृष्ठभूमि में पेश किया गया है, 'शोले' के वीरू (धर्मेंद्र) की तरह
>>> सुसाइड का ख़ूब ड्रामा करते हैं दोनों भाई, और भी बहुत से झोल हैं फिल्म
>>> में...वो सब अगली डाक में...!
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