[दीवान]'पीपली लाइव' देखने के बाद ....

avinash das avinashonly at gmail.com
Sat Aug 21 04:57:17 IST 2010


कमाल है!!! शशिकांत ने जो जो बातें कही हैं, उन सबको एक बार फिर इस तरह
देखें...


   - आत्महत्या करने वाले भले खामोशी से अलविदा कह जाते हों - लेकिन पीपली का
   नत्‍था और बुधिया दुख की कातर कथा में छिपी खामोश शख्‍सीयत नहीं है।
   आत्‍महत्‍या का आइडिया उसके अंदर के आवेग से आया - वह ज़माने के तंज से आया और
   उसी आइडिया के साथ नत्‍थ और बुधिया ने ज़माने पर तंज किया।


   - इसी हिंदुस्‍तान में पति के रहते बीवियां मोहब्‍बत करती हैं और आशिक के
   साथ भाग जाती हैं। अखबार में छपता है : चार बच्‍चों की मां प्रेमी के साथ भागी।
   इसी हिंदुस्‍तान में बीवियां उलाहने देती हैं : आज भी कुछ नहीं लाये - इससे तो
   बेहतर था कहीं मर-खप जाते। और कोष्‍ठक में जिस अपवाद का जिक्र कर रहे हैं - ये
   पीपली के संदर्भ में क्‍यों नहीं मानते।


   - हमने मुआवज़े तब पढ़ा था, जब ये मध्‍यप्रदेश साहित्‍य परिषद की पत्रिका
   साक्षात्‍कार में छपा था। बाद में इसका मंचन पटना के तनवीर अख्‍तर के निर्देशन
   में हुआ, जिसे देखा भी। परसाई का व्‍यंग्‍य भोलाराम का जीव भी पढ़ा है और हम
   बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं भी। शरद जोशी और चार्ली चैप्लिन भी नहीं छूटे हैं।
   इसलिए कह रहा हूं कि पीपली लाइव एक अविस्‍मरणीय व्‍यंग्‍य कथा है।


   - मीडिया के इतिहास में कई बार ऐसी खबरें बनी हैं। आपको उस एक कैरेक्‍टर को
   याद करना चाहिए - जिसने कहा था कि फलां तारीख को मेरे जीवन का अंत है और सारे
   टीवी चैनल का कैमरा उसको कैद करने उसके गांव पहुंच गया। बाद में वो नहीं मरा और
   फिर टीवी वाले नैतिकता का पाठ पढ़ाने लगे थे।
   - राज्‍य में चुनावी आचार संहिता के बीच राज्‍य सरकार कोई फैसला नहीं ले
   सकती, लेकिन केंद्र सरकार तो ले ही सकती है। नत्‍था कार्ड केंद्र सरकार की
   योजना थी और वह भी सिर्फ पीपली या मुख्‍यप्रदेश के लिए नहीं - पूरे देश के
   लिए।


   - आफ्टर पार्टीशन ही अयोध्‍या का राम मंदिर आंदोलन हुआ - जो अयोध्‍या से
   निकल कर पूरे देश में फैला और एक राजनीतिक मुद्दा बना।


   - अव्‍वल तो ये मानना नहीं चाहिए कि कुमार दीपक दीपक चौरसिया का कैरीकेचर
   है। अगर मानते भी हैं - तो दीपक चौरसिया और प्रभु चावला को छोटे पर्दे पर किसी
   गेस्‍ट से बात करते हुए देखें - आपको पता चलता है कि ये कितनी बेमजेदार लोग हैं
   और इनकी समझ कितनी सतही है। लगता है कि एक चांटा मारें। आपका भावुक प्रलाप कि
   "दीपक चौरसिया जैसा सीनियर एंकर" - घंटा सीनियर एंकर। सीनियर एंकर ऐसे होते हैं
   - तो जूनियर एंकरों से काम चलाना चाहिए। और ये भी आपत्तिजनक लाइन है कि टीवी
   रिपोर्टर कामचोर होते हैं खासकर महिला टीवी रिपोर्टर। वे प्रिंट के रिपोर्टर से
   ज्‍यादा मेहनत करते हैं खासकर महिलाएं किसी भी मर्द रिपोर्टर से ज्‍यादा सजग
   रहती है। न हो तो आप कभी किसी रिपोर्टर के साथ स्‍पॉट पर चले जाइए।



2010/8/21 shashi kant <shashikanthindi at gmail.com>

> पीपली लाइव इसलिए अच्छी नहीं लगी.....
>
>
>    - आत्महत्या करने वाले बिना किसी को बताए चुपके से आत्महत्या कर लेते हैं,
>    किसी को बताते नहीं, जो बताते हैं वे शोले के वीरू की तरह तमाशा करते हैं.
>    नत्था और उसका भाई ऐसे शातिर और चालाक किसान हैं जो आत्महत्या का नाटक रच कर
>    सबको पगला दिए हैं.
>
>
>    - हिन्दुस्तान ही नहीं, पाकिस्तान की या किसी अन्य मुल्क़ की शायद (अपवाद
>    में गिनी-चुनी) ही कोई पत्नी मुआवजे कि ख़ातिर अपने पति के मरने के फ़ैसले को
>    आसानी से स्वीकार कर लेगी- मरना चाह रहे हो, पता नहीं, उसे बाद भी मुआवज़ा
>    मिलेगा कि नहीं.
>
>
>    - जो साथी इसे व्यंग्य कि उत्कृष्ट फिल्म बता रहे हैं वे पता नहीं भीष्म
>    साहनी का बहुचर्चित नाटक 'मुआवज़े' (एन.एस.डी. के कई शो देखे हैं मैंने, गज़ब
>    का नाटक है) देखे हैं या नहीं, मैंने परसाई का व्यंग्य भोलाराम का जीव पढ़ा है,
>    शरद जोशी को भी थोड़ा-बहुत, और चार्ली चैप्लिन इज माय फेवरेट.  हाँ ये संभव है
>    कि मुझे व्यंग्य की समझ नहीं.
>
>
>    - मीडिया के इतिहास में कोई घटना तब तक खबर नहीं बनती जब तक वो घट नहीं
>    जाती, ख़ासकर इलक्ट्रोनिक मीडिया के लिए. अव्वल ये कि हिन्दुस्तान में रोज़
>    हज़ारों ऐसी घटनाएं मीडिया रिपोर्टिंग से महरूम रह जाती हैं. हमारे मुल्क़ की
>    मीडिया महानगर और शहर केन्द्रित है, गाँव और क़स्बे से उसका नहीं के बराबर
>    सरोकार है. पीपली लाइव में मीडिया के इस बुनियादी सच को उलट दिखाया गया है.
>    - चुनावी संहिता के रहते किसी एक व्यक्ति ही नहीं सामूहिक हित का भी कोई
>    सरकारी डिसीजन नहीं लिया जा सकता, रूटीन कामकाज को छोड़कर.
>
>
>    - आफ्टर पार्टीशन हिन्दुस्तान के ६२ साल के इतिहास में कोई भी कस्बाई स्तर
>    पर बिना घटे कोई घटना तो दूर घटने के बाद भी चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दा नहीं
>    नहीं बना, पीपली लाइव फिल्म को छोड़ कर.
>
>
>    - टीवी रिपोर्टर कामचोर होते हैं, ख़ासकर महिला टीवी रिपोर्टर. वे घटना कि
>    जगह पर आईने लेकर सजती-संवारती हैं, फीड में दीन-रात भूखे-प्यासे ख़ाक छानने
>    वाले दीपक चौरसिया जैसे सीनियर रिपोर्टर को ख़बर के इम्पोर्टेंस की समझ नहीं,
>    ज़मीनी सच से दूर दफ्तर में बैठा बॉस उसे हड़काता है कि उसे प्राइम टाइम में ये
>    ख़बर चाहिए, चुनाव का नेशनल इश्यू नहीं, बकवास दि ग्रेट. काश, ऐसा
>    होता!
>    शेष अगली डाक में)
>
>
>
>
> 2010/8/20 avinash das <avinashonly at gmail.com>
>
>> Dear All, plz see the link :
>> http://mohallalive.com/2010/08/20/debate-on-peepli-live/
>> <http://mohallalive.com/2010/08/20/debate-on-peepli-live/>regards, *
>> avinash*
>>
>>
>> 2010/8/20 avinash das <avinashonly at gmail.com>
>>
>>> एक बात और - हमारी दिल्‍ली में भी रूरल है। मैं दिल्‍ली और गाजियाबाद के
>>> बोर्डर पर रहता हूं। शालीमार गार्डेन में। सीमापुरी से शालीमार गार्डेन पैदल
>>> आते हुए गेणशपुरी नाम की एक बस्‍ती है, जहां ठेले वालों, रिक्‍शेवालों, मजदूरी
>>> करने वालों ने थोड़ा थोड़ा पैसा जुटा कर अपना आशियाना बना लिया है। वहां से
>>> शाम-रात नौ-दस बजे आप गुजरें, तो ढोलक-मंजीरा और हार‍मोनियम के साथ गांव-जवार
>>> से आयातित कीर्तन-होरी-चैता आपको सुनाई पड़ेगा।
>>>
>>> अब इसको आप ये तो कहेंगे नहीं कि इतने भर से दिल्‍ली से सटी यूपी की
>>> गणेशपुरी गांव तो हो नहीं जाएगी?
>>>
>>> 2010/8/20 avinash das <avinashonly at gmail.com>
>>>
>>> आशुतोष जी, औपचारिकता और सिंबॉलिज्‍म में फर्क है। इस फिल्‍म का मकसद रूरल
>>>> को स्‍टैब्लिश करना नहीं है। यह फिल्‍म नेहरू की तरह भारत की खोज नहीं करती,
>>>> आरके लक्ष्‍मण की तरह करती है - इसे हमें समझना चाहिए। आखिर में पलायन के जिस
>>>> संदर्भ को आप औपचारिकता की चाशनी में छान रहे हैं - वह भी एक प्रतीक है और उस
>>>> प्रतीक के अर्थ आप रोज श्रमजीवी रेलों से दिल्‍ली आती भीड़ में पा सकते हैं।
>>>>
>>>> शुक्रिया।
>>>>
>>>> 2010/8/20 mahmood farooqui <mahmood.farooqui at gmail.com>
>>>>
>>>> avinash aapki baat bhi sahi hai. Par sahi ya ghalat aap kahte jaiye,
>>>>> aapki baaten hamen achhi lagti hai
>>>>>
>>>>> 2010/8/19 Ashutosh Shyam Potdar <dnyan21 at yahoo.com>
>>>>>
>>>>> Is film ka form alag hai. satire ka mamala aisehi hota hai. aur
>>>>>> nirdeshak ne bekhubi se dikhaya hai. usake liye unaka abhinandan karana
>>>>>> jaruri hai.
>>>>>>
>>>>>> mujhe lagata hai ki nirdeshak bahut andarse janate hai media walonka
>>>>>> hungama. insider ka role ada karate huye wo outside rahake bhi dekh sakate
>>>>>> hai. ye isaki mahatwapurna khubi hai. usako sarahana chahiye.
>>>>>>
>>>>>> aaajkal jo urban aur rural mein badhati hui duriya hai wo complexity
>>>>>> se dikhane kaa prayant karati hai ye film. but ye sirf prayant kahunga. is
>>>>>> point ko lekar mujhe reservation hai film ke bare mein. rural khada nahi kar
>>>>>> paati hai. sirf harmonium par gana gane se ya rural geography se rural nahi
>>>>>> aayega. usaka context nahi aata hai. ye is film ki kami hai. bahut baar
>>>>>> mujhe lagata hai ki landscape dikhane ke liye aur wo bhasha sunane ke liye
>>>>>> rural le liya hai. rural culture nahi aata hai bulki sirf setting ata hai.
>>>>>>
>>>>>> is background pe, kisano ki aatmahattya ke baare mein bolana sirf
>>>>>> aupcharikata hoti hai. akhiri statement jo farmers ke migration ke bare me
>>>>>> bolati hai wo bhi ek aupcharikata banati hai. kyonki, usako support karane
>>>>>> wala kuch piche aata naahi.
>>>>>>
>>>>>> film dikhati hai ki wo character jo kisi construction mein jaa kar
>>>>>> kaam karane lagata hai wo media ki behuda harkato ki vajah se. wo nahi
>>>>>> dikhata hai ki farming mei kya issues hai jinaki wajah se farmers farming
>>>>>> chod dete hai.
>>>>>>
>>>>>> ik kua(well) khodane wala character farmer nahi hai wo laborer hai.
>>>>>> usaki jamin hai kya nahi hai iska bhashya nahi hai.(??) wo sirf background
>>>>>> pe hai. ye samajhana mahatwa purna hai ki rural mein- kisan, laborer vaigere
>>>>>> log hote hai. usaka study karana jaroori tha character dikhane ke pahale.
>>>>>>
>>>>>>  is mudhe ko leke film ke team ne kuch kaam karana jaruri tha.
>>>>>>
>>>>>> ab to film ho chuki hai, jaise M. Faroquee bolate hai. mujhe pura
>>>>>> vishas hai ki ye film nirdeshak ke liye ek learning tha. iske saath wo agale
>>>>>> film par kaam karenge.
>>>>>>
>>>>>> main suzav dunga ki sequel kare is film ka. bahut acha creative
>>>>>> tension dikhane ki kshamata nirdeshak mein hai. wo agale film mein ayega.
>>>>>> she can start with where the character has reached- construction site. she
>>>>>> can get back and start looking at rural reality again....
>>>>>>
>>>>>> but, congratulations for this film. is film ki vajaha se multiplex
>>>>>> mein baithkar is desh ki kuch 'unseen' pahalu to 'enjoy' kar sakate hai!!
>>>>>>
>>>>>> amen,
>>>>>>
>>>>>>  Ashutosh
>>>>>> ------------------------------
>>>>>> *From:* avinash das <avinashonly at gmail.com>
>>>>>> *To:* shashi kant <shashikanthindi at gmail.com>
>>>>>> *Cc:* deewan <Deewan at mail.sarai.net>
>>>>>> *Sent:* Thu, August 19, 2010 1:18:54 PM
>>>>>> *Subject:* Re: [दीवान]'पीपली लाइव' देखने के बाद ....
>>>>>>
>>>>>> शशिकांत जी, दरअसल आपने फिल्‍म को समझा ही नहीं। ये न तो किसानों की
>>>>>> समस्‍या पर एक डॉकुमेंट्री फिल्‍म है, न ही भारतीय मीडिया का कोई
>>>>>> समाजशास्‍त्रीय विश्‍लेषण। ये फिल्‍म इस देश की उलझी हुई बुनावट के भीतर छिपी
>>>>>> ढेर सारी विडंबनाओं पर एक फीकी हंसी हंसने की कोशिश है।
>>>>>>
>>>>>> शुरू से अंत तक ये एक इंटरटेनमेंट फिल्‍म है। किसान की समस्‍या, लोन और
>>>>>> खुदकुशी तो एक प्रतीक है - उसके बहाने मीडिया और राजनीति के खेल पर एक कार्टून
>>>>>> बनाने की कोशिश है ये फिल्‍म।
>>>>>>
>>>>>> आप अजीत अंजुम की भाषा में बात मत कीजिए। विदर्भ में हुआ फिल्‍म का विरोध
>>>>>> एक स्‍टंट है। मुझे पूरी उम्‍मीद है कि विदर्भ के किसानों ने पीपली लाइव नहीं
>>>>>> देखी होगी। क्‍या आपको याद है, मीडिया का वो तमाशा - जिसमें किरदार राहुल गांधी
>>>>>> है और विदर्भ की एक विधवा है। आपको पता है, उस विधवा का क्‍या हुआ?
>>>>>>
>>>>>> 2010/8/19 shashi kant <shashikanthindi at gmail.com>
>>>>>>
>>>>>>>  'पीपली लाइव' देखने के बाद ....<http://shashikanthindi.blogspot.com/2010/08/blog-post_6777.html>
>>>>>>>
>>>>>>> *वीरू : “कूद जाऊँगा...फाँद जाऊँगा... मर जाऊँगा…हट जाओ...”*
>>>>>>> * गाँव वाला -१ : “अरे-अरे ये क्या कर रहे हो?”
>>>>>>> वीरू : “वही कर रहा हूँ जो मजनूं ने लैला के लिए किया था, रांझा ने हीर
>>>>>>> के लिए किया था रोमियो ने जूलियट के लिया था, सुसाइड, सुसाइड…
>>>>>>> गाँव वाला-२ : “अरे भाई ये 'सुसाइड' क्या होता है?”
>>>>>>> गाँव वाला-३ :"अँग्रेज़ लोग जब मरते हैं तो उसे 'सुसाइड' कहते हैं.”**गाँव
>>>>>>> वाला-२ : **“लेकिन ये अँग्रेज़ लोग मरते क्यों हैं?”
>>>>>>> **गाँव वाला-३ : **“वो….”**गाँव वाला -१ : **“अरे भाई बात क्या है? तुम
>>>>>>> सुसाइड क्यों करना चाहते हो?”
>>>>>>> वीरू : “ये मत पू्छो चाचा, तुम्हारे आँसू निकल आएँगे. ये बड़ी दुख भरी
>>>>>>> कहानी है. इस स्टोरी में इमोशन है, ड्रामा है, ट्रेजडी है!!!"*
>>>>>>> *#शोले *
>>>>>>>
>>>>>>> *“हम किसानों पर फिल्म बनाने चले थे लेकिन बन गई मीडिया पर…!” *
>>>>>>> *# महमूद फारूकी (सह-निर्देशक, ‘पीपली लाइव’)*
>>>>>>>
>>>>>>> मित्रो,
>>>>>>> आमिर ख़ान प्रोडक्शन के बैनर तले अनूषा रिज़वी और महमूद फारूकी के
>>>>>>> निर्देशन में अभी हाल में रीलीज़ हुई फिल्म ‘पीपली लाइव’ की कहानी किसानों की
>>>>>>> आत्महत्या के इर्द-गिर्द घूमती है.
>>>>>>>
>>>>>>> मैने जो पढ़ा है, पिछले सालों में किसानों की 'सुसाइड' करने की जो भी
>>>>>>> घटनाएँ घटी हैं और घट रही हैं वे महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में
>>>>>>> ज़्यादातर.
>>>>>>>
>>>>>>> मेरा मानना है कि ये सुसाइड उन किसानों ने की है और कर रहे हैं जो
>>>>>>> व्यावसायिक खेती कर रहे थे/हैं, और जो बॅंक लोन के जाल में फँस गये थे/हैं.
>>>>>>>
>>>>>>> बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे ग़रीब राज्यों के
>>>>>>> किसान चाहे जितने भी बदहाल, फटेहाल और लाचार हों और भारी से भारी तकलीफ़ में जी
>>>>>>> रहे हों लेकिन वे आत्महत्या जैसा कदम नहीं उठाते.
>>>>>>>
>>>>>>> आख़िर क्यों?
>>>>>>>
>>>>>>> मुझे खेद है कि ’पीपली लाइव’ फिल्म में किसानों की आत्महत्या की समस्या
>>>>>>> को ग़लत पृष्ठभूमि में पेश किया गया है, 'शोले' के वीरू (धर्मेंद्र) की तरह
>>>>>>> सुसाइड का ख़ूब ड्रामा करते हैं दोनों भाई, और भी बहुत से झोल हैं फिल्म
>>>>>>> में...वो सब अगली डाक में...!
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