[दीवान]यूथ, फैमिली और लाइफ

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Mon Dec 27 18:31:04 IST 2010


यूथ, फैमिली और लाइफ<http://vinitutpal.blogspot.com/2010/12/blog-post_27.html>
राजश्री प्रोडक्शन की पहचान जिस तरह की फिल्मों के लिए है, काफी हद तक ’इसी
लाइफ में‘ उसी लीक पर है। विधि कासलीवाल ने स्वच्छ मनोरंजक पारिवारिक फिल्म की
परंपरा को आगे बढ़ाया है। अंतर यह है कि पारंपरिक और संस्कार के ईद-गिर्द
आधुनिकता भी है। ’इसी लाइफ में‘ के जरिए कई बातें सामने आती हैं, मसलन छोटे और
बड़े शहर के लोग एक-दूसरे के बारे में क्या सोचते हैं, थियेटर को लेकर लोगों की
सोच क्या है। सबसे अहम यह कि शहरी युवाओं में संस्कार होते हैं या नहीं।
हालांकि बखूबी यह दिखाने की कोशिश की गई है कि युवा पीढ़ी बिना बगावत किए भी घर
के बुजुर्गो से अपनी बात मनवाने का माद्दा रखती है। साथ ही, संदेश देने की
कोशिश भी की है कि विवाह जिंदगी नहीं, उसका एक हिस्सा है।
कहानी अजमेर में रहने वाले रवि प्रकाश (मोहनीश बहल) के इर्द-गिर्द घूमती है। वे
आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपने संस्कार को दूषित होने से बचाना चाहते हैं।
उनकी रूढिवादी सोच अखबारी और टेलीविजन की खबरों से प्रखर होती है। उनकी बेटी
राजनंदिनी (संदीपा धर) राज्य की टॉपर बनती है। वह आगे की पढ़ाई करना चाहती है,
लेकिन रविप्रकाश इसके खिलाफ हैं। विदेशी खाना बनाना सीखने के बहाने राजनंदिनी
की मां उसे आगे की पढ़ाई के लिए मौसी के पास मुंबई भेज देती है। मुंबई के कॉलेज
में दाखिला लेने के बाद राजनंदिनी यानी आरजे कॉलेज की ड्रैमेटिक सोसायटी में
शामिल हो जाती है। वहीं उसकी दोस्ती विवान (अक्षय ओबेरॉय) से होती है, जो
ड्रैमेटिक सोसायटी का चेयर पर्सन और प्ले डायरेक्टर है। नेशनल प्ले काम्पिटिशन
के लिए विवान और उसकी टीम शेक्सिपयर के नाटक को प्ले करने की तैयारी करते हैं।
नाटक का लीड रोल आरजे को मिलता है और वह अपना लुक भी बदल लेती है। आखिर तक
दोनों अपने मन की बात एक-दूसरे से कह नहीं पाते। हालांकि नये और पुराने के बीच
की यह कहानी दर्शकों पर कुछ खास असर नहीं छोड़ती।
’इसी लाइफ में‘ की स्क्रीन प्ले ’हम आपके हैं कौन‘ की तरह है। पहले एक घंटे तक
कहानी उसी तर्ज पर है पर इंटरवल के बाद फिल्म रोचक बनी है। कहानी का प्लॉट नया
कतई नहीं है। हां, थियेटरकर्मियों को परिवार से न मिलने वाले सपोर्ट का दर्द
पूरी फिल्म में है। नई अभिनेत्री संदीपा धर ने बखूबी राजनंदिनी का किरदार
निभाया है, जिसकी मुस्कान के साथ आंखें काफी कुछ कह जाती हैं। विवान के किरदार
में अभिनय और डांस का बेहतर प्रदर्शन अक्षय ओबेरॉय ने किया है। सलमान खान का बस
गेस्ट एपीयरेंस है। मोहनीश बहल ठीक-ठाक हैं। फिल्म का संगीत इतना आकषर्क नहीं
बन पाया है जो दर्शकों को गुनगुनाने के लिए मजबूर करे।

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