[दीवान]हम बदनसीबों की जमात बिस्मिल्ला खान को भूल गए

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Mar 22 16:58:03 IST 2010


<http://3.bp.blogspot.com/_uS1XY77Y4b8/S6dSMitTM7I/AAAAAAAABp0/EaB5C95vhZU/s1600-h/1947.jpg>
21 मार्च बीत गया। बिस्मिल्ला खान के जन्मदिन को मीडिया ने याद नहीं किया। मन
कचोटता रहा.समय का दवाब और अलग से न लिखने की काहिली में मैं बज और फेसबुक पर
सिर्फ इतना ही लिख सका-

हमें बिस्मिल्ला खां को इतनी जल्दी नहीं भूलना चाहिए था।..कहीं कोई मीडिया
कवरेज नहीं। IPL तेजी से खबरों को ध्वस्त करता जा रहा है।..ऐसे होती है खबरों
पर बादशाहत और ऐसे ही धीरे-धीरे होती है सरोकारी पत्रकारिता की हत्या। इस लिखे
की प्रतिक्रिया में बनारस से अफलातून ने लिखा-अरविंद चतुर्वेदी ने उन पर एक
अच्छी पोस्ट लिखी है।देखी? भन्नाया हुआ था और लग रहा था कि हर उस शख्स को कोड़े
और चाबुक मारुं जो बात-बात में सांस्कृतिक धरोहर की बात करता है। पढ़ने से
ज्यादा खोजने का मन कर रहा था कि किसने लिखा है और किसने नहीं। लपेटे में आ गया
गिरीन्द्र <http://www.facebook.com/people/Girindranath-Jha/1664097689>जिसे
कि हम गिरि कहा करते हैं।

हमने चैट बॉक्स पर लगभग लताड़ते हुए अंदाज में लिखा- तुम्हें बिस्मिल्ला खान के
बारे में लिखना चाहिए था गिरि। गिरि को हमने ऐसा इसलिए कहा कि ब्लॉग की दुनिया
में वो उन गिने-चुने शख्स में से है जो कि विरासत,धरोहर,संस्कृति और यादों की
पूंजी के प्रति सचेत है। उसकी कीबोर्ड में छूटने का दर्द छिपा है और शब्दों में
लगातार खोते जाने की तड़प। हमें क्या पता कि उसके मन में भी यही बात पहले से
कचोटती रही कि उसने क्यों नहीं लिखा? लेकिन न लिखने की जो वजह बतायी वो कम
मार्मिक नहीं है। बहरहाल अंत में उससे रहा नहीं गया और एक पोस्ट लिख दी-शहनाई
खामोश नहीं हुई है दोस्त
(सपने में बिस्मिल्ला खान से
बातचीत)<http://anubhaw.blogspot.com/2010/03/blog-post_22.html>

गिरि की पोस्ट पढ़ने के बाद मुझसे भी नहीं रहा गया लेकिन अपनी स्थिति भी यही कि
पोस्ट लिखूं कि जल्दी से जल्दी अपनी रिसर्च की रिपोर्ट लिखूं। जमाने से खाली
रहनेवाला शख्स इन दिनों इतना बदनसीब है कि कायदे से बिस्मिल्लाह साहब को याद
नहीं कर सकता। मैंने बस इतना किया कि कभी यतीन्द्र मिश्र की कही गयी बात को जो
कि उन्होंने बिस्मिल्ला खान पर लिखी अपनी किताब के लोकार्पण के मौके पर कही
थी,कमेंट बॉक्स में डाल आया। माफ करेंगे,यहां भी यही कर रहा हूं। संभव हो तो आप
अपनी तरफ से कुछ बेहतर लिखें-
अपनी ही पोस्ट का लिखा एक हिस्सा यहां उठाकर चेंप दे रहा हूं खां साहब की याद
में- शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां की जिंदगी पर "सुर की बारादरी"नाम से
यतीन्द्र मिश्र ने किताब लिखी है। ये दरअसल उस्ताद से यतीन्द्र की हुई बातचीतों
और मुलाकातों की किताबी शक्ल है जिसे आप संस्मरण और जीवनी लेखन के आसपास की
विधा मान सकते हैं। किताबों पर विस्तार में बात न करते हुए यहां हम फिर उस्ताद
बिस्मिल्ला खां के उस प्रसंग को उठा रहे हैं जो कि हमारे ख़्वाबों को
पुनर्परिभाषित करने के काम आ सके। बकौल यतीन्द्र मिश्र-

तब उस्तादजी को 'भारत रत्न'भी मिल चुका था। पूरी तरह स्थापित और दुनिया में
उनका नाम था। एक बार एक उनकी शिष्या ने कहा कि- उस्तादजी,अब आपको तो भारतरत्न
भी मिल चुका है और दुनियाभर के लोग आते रहते हैं आपसे मिलने के लिए। फिर भी आप
फटी तहमद पहना करते हैं,अच्छा नहीं लगता। उस्तादजी ने बड़े ही लाड़ से जबाब
दिया- अरे,बेटी भारतरत्न इ लुंगिया को थोड़े ही न मिला है। लुंगिया का क्या
है,आज फटी है,कल सिल जाएगा। दुआ करो कि ये सुर न फटी मिले।
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