[दीवान]दो अप्रैल को एक साल का होगा किन्नरों का ब्यूटी पार्लर
आशीष कुमार 'अंशु'
ashishkumaranshu at gmail.com
Thu Mar 25 10:20:02 IST 2010
हमारे पास कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है कि इस देश में कितने किन्नर हैं।
क्योंकि वे जनगणना में या तो पुरुष होते हैं या अधिक मामलों में स्त्री। किन्नर
शब्द हमारे समाज में गाली की तरह ही इस्तेमाल होता रहा है। यदि किसी ‘मर्द’ को
किन्नर कह दो तो वह मरने-मारने पर उतारू हो जाएगा। बहरहाल हम स्थापित अर्थ में
न जाएं तो इन किन्नरों की मर्दानगी का कायल हुआ जा सकता है। जो लोग खुद को मर्द
कहते हैं, उनके बीच जाकर यह लोग दिन दहाड़े वसूली करते हैं। पुलिस और शासन के
सामने। कमाल की बात यह कि यदि पुलिस वाले के घर भी बच्चे का जन्म हो तो देश भर
में वसूली के लिए कुख्यात इस जमात से यही किन्नर पैसे वसूल लाते हैं। नीलम गुरु
को कैसे आप भूल सकते हैं, जिन पर अपने बयान को बदलने के लिए लगातार अपराधी
तत्वों का दबाव था, लेकिन उन्होंने अपना बयान नहीं बदला। उनकी हत्या तीस हजारी
कोर्ट में कर दी गयी। जबकि जान के डर से अदालत में अपने बयान बदलने वाले
तथाकथित मर्दों की कमी नहीं। फिर ‘मर्द’ कौन, और किन्नर कौन?
सच तो यह है कि किन्नरों को इस समाज में दलितों से अधिक अपमान सहना पड़ा है,
लेकिन यह जमात हमेशा से उपेक्षित है। हम दलित और अल्पसंख्यकों के हित की बात को
लेकर खूब उछल-कूद मचाते हैं लेकिन क्या कभी हमें इस बात का ख्याल आया कि जरा इन
किन्नरों के हित की बात भी करें, जिनके लिए बैंक में अकाउंट खोलना तो दूर की
बात, पहचान पत्र से लेकर राशन कार्ड बनवाना तक बेहद चुनौतीपूर्ण है। इन तमाम
चुनौतियों के बावजूद समलैंगिकों और किन्नरों के एक समूह ‘पहल’ ने जब फरीदाबाद
में किन्नर के लिए एक विशेष पार्लर की शुरुआत की तो आशा की एक किरण नजर आयी।
भड़ास वाले रूपेश भाई (जिन्हें पनवेल वाले रूपेश पनवेलकर और पनवेल से बाहर वाले
रूपेश श्रीवास्तव के नाम से जानते हैं) की चिंता यही है कि कभी किन्नरों से
जुड़े मसलों को गंभीरता से नहीं उठाया गया। खैर आइए, फरीदाबाद में खुले
किन्नरों द्वारा, किन्नरों के लिए चलाये जा रहे इस पार्लर का स्वागत करें।
फरीदाबाद के सेक्टर 35 के मेन मार्केट में स्थित उन दो कमरों को आप सैलून कह
सकते हैं या फिर ब्यूटी पार्लर कह सकते हैं। लेकिन ‘पहल’ फाउंडेशन द्वारा चलाये
जा रहे उस पार्लर की खासियत उसके पार्लर होने में नहीं बल्कि भारत में किन्नरों
के लिए चल रहे अपनी तरह के पहले पार्लर के रूप में है। इनके ग्राहकों की संख्या
अधिक नहीं है। प्रतिदिन लगभग 8-10 ग्राहक ही इन्हें मिल पाते हैं। यदि किसी
पर्व त्योहार का मौसम रहा है तो बात दूसरी है। पार्लर की एक ब्यूटिशियन कहती
हैं – ‘यदि मौका किसी त्योहार का हो तो सांस लेने की भी फुर्सत नहीं होती है।’
पार्लर की योजना ‘पहल’ के निदेशक यशविंदर सिंह की है। यशविंदर बताते हैं- ‘यह
पार्लर मुख्य रूप से किन्नरों के लिए ही है। वैसे उनके दोस्त या कोई और भी यहां
आना चाहें तो हमारे दरवाजे उनके लिए भी खुले हैं।’
इस वक्त पार्लर में मुख्य ब्यूटिशियन सिमी के साथ लगभग एक दर्जन ब्यूटिशियन काम
कर रहे हैं। पिछले साल दो अप्रैल से शुरू हुआ यह पार्लर एक साल के अंदर दिल्ली
और फरीदाबाद के किन्नरों के डेरों (जहां किन्नर समुदाय के लोग समूह में रहते
हैं) में चर्चा का विषय बना है। अच्छी संख्या में वे न सिर्फ पार्लर तक आ रहे
हैं बल्कि विशेष अवसरों पर यहां से ब्यूटिशियनों को अपने साथ भी ले जा रहे हैं।
पार्लर की मुख्य ब्यूटिशियन सिमी एक किन्नर हैं। उन्होंने 11वीं तक की पढ़ाई
दिल्ली से की है और इन दिनों वह फरीदाबाद में अपने परिवार के साथ रहते हैं।
सिमी ने बताया, पार्लर में अपने काम को वह खूब इन्जॉय कर रहे हैं।
मामला सिर्फ किन्नरों की खूबसूरती से जुड़ा नहीं है बल्कि यहां किन्नरों को
अच्छी-खासी वैचारिक खुराक भी दी जाती है। किन्नरों में स्वास्थ और स्वच्छता को
लेकर जागरूकता की बेहद कमी है। इन दोनों विषयों पर ‘पहल’ के कार्यकर्ता
ब्यूटिशियन अपने किन्नर ग्राहकों के साथ चर्चा करते हैं। उनकी राय जानते हैं और
इन विषयों पर उनकी जिज्ञासा का निराकरण भी करते हैं। समय-समय पर इसके लिए चौपाल
का भी आयोजन किया जाता है, जहां किन्नर और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग इकट्ठा
होते हैं और हर बार किसी एक विषय पर विस्तार से चर्चा होती है।
पार्लर की मुख्य ब्यूटिशियन सिमी के अनुसार उसके पास अभी कई जगहों से नौकरी के
ऑफर है, जहां निश्चित तौर पर यहां से अच्छी आमदनी हो सकती है। लेकिन यहां काम
करना उसे अच्छा लगता है।
पार्लर की आगामी योजना के संबंध में यशविंदर बताते हैं कि वे इस तरह का पार्लर
देश के दूसरे हिस्सों में भी खोलना चाहते हैं। उनका उद्देश्य पार्लर के माध्यम
से किन्नरों को सिर्फ सुंदर बनाना नहीं है। वे चाहते हैं, समाज इस तीसरे जेंडर
को स्वीकार करे। उसी प्रकार जिस प्रकार वह स्त्री और पुरुष को स्वीकार करता है।
यदि ईश्वर ने इन्हें तीसरे जेंडर के रूप में इस संसार में भेजा है, तो इसमें
इनका कोई कसूर तो नहीं है। यशविंदर जानना चाहते हैं, फिर उसकी सजा किन्नरों को
समाज में हाशिये पर डाल कर क्यों दी जा रही है? जिस प्रकार एक स्त्री और पुरुष
की भावना होती है, उनकी संवेदना होती है, उसी प्रकार की भावना और संवेदना
किन्नर समाज के लोगों में भी होती है। यह समाज को समझना होगा।
(http://mohallalive.com/2010/03/25/eunuchs-first-beauty-parlor/)
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