[दीवान]चंद लोगों की मनमानियों का अड्डा बना AIR FM GOLD 106.4

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Sat May 1 13:04:32 IST 2010


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करोड़ो रेडियो लिस्नर (श्रोताओं) के दिलों पर राज करनेवाला AIR FM GOLD 106.4
आज खुद चंद लोगों की अफसशाही और मनमानी का अड्डा बनकर रह गया है। कार्यक्रमों
के प्रसारण का जो स्तर और भीतर की जो हालत है, उसे देखकर किसी के भी मन में ये
सवाल जरूर उठेगा कि सूचना, मनोरंजन और जागरुकता के नाम पर देश के मेहनतकश लोगों
के खून-पसीने की करोड़ों रुपये की कमाई को जिस तरह पानी में बहाया जा रहा है,
उसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? इस माध्यम को कमजोर करने के जो कुचक्र रचे जा
रहे हैं और देश के इस एफएम चैनल को कैसे किसी ऊटपटांग निर्देश जारी करनेवाले
लोगों के हाथों सौंप दिया गया है, उनसे सवाल किये जाएं? हालात ये है कि संसद
भवन के ठीक बगल में चलनेवाला ये चैनल अब धीरे-धीरे कबाड़खाना की शक्ल में
तब्दील होता जा रहा है।

इसे चलाने के लिए करोड़ों रुपये के बजट तैयार किये जाते हैं, पैसे भी आवंटित
होते हैं लेकिन लापरवाही और भीतरी गड़बड़ियों की वजह से करीब सालभर से
प्रजेंटरों को कोई भुगतान नहीं किया जाता है, सही चीजों को हटाकर भारी ठेके
देकर नयी गैरजरूरी चीजें लगायी जाती है, चालू हालत की चीजों को कबाड़खाने में
डाल दिया जाता है। चीजों के रखरखाव का जो आलम है उसे देखते हुए किसी भी
रेडियोप्रेमी का खून खौल जाए। दुर्लभ और कीमती रिकार्ड्स छतों पर फेंक दिये गये
हैं जिसे कि कोई पूछनेवाला नहीं है। कुछ के पैकेट खोले तक नहीं गये और काफी कुछ
कबाड़‍ियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेच दिया गया। पूरे सिस्टम के डिजिटलाइज
हो जाने की वजह से पुरानी मशीनें और सामान म्यूजियम के नाम पर साइड कर दिये गये
हैं जिसका कुछ भी मेंटेनेंस नहीं है।

शुरुआती दौर से जुड़े जिन लोगों ने इसे देश का नंबर वन एफएम चैनल बनाया, वो इस
पूरी स्थिति को लेकर दुखी हैं। वो अभी भी दिन-रात इसकी बेहतरी के लिए काम करने
को तैयार हैं। लेकिन भीतर का माहौल ऐसा है और इस किस्म की बदहाली है कि कोई
चाहकर भी व्यक्तिगत स्तर पर बहुत कुछ नहीं कर सकता। इनके बीच लंबे समय से इन सब
बातों को लेकर गहरा असंतोष रहा है। पिछले दिनों (17 फरवरी, 2010) AIR FM GOLD
की बिगड़ती हालत और कार्यक्रमों के गिरते स्तर को लेकर रेडियो प्रजेंटरों ने
इसकी शिकायत ऑल इंडिया के डायरेक्टर जेनरल से की थी। उस शिकायत पत्र में साफ
कहा गया था कि इस चैनल को चलाने के लिए विज्ञापन की जो जरूरत है, उसे लेकर कोई
मार्केट स्ट्रैटजी अपनाने के बजाय गलत हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। ज्यादा से
ज्यादा एसएमएस आधारित कार्यक्रमों को शामिल करने से कार्यक्रम की क्रिएटिविटी
खत्म होती है।

इधर जिन कायक्रमों और जिंग्लस को शामिल किया गया है, वे एफएम गोल्ड की ब्रांड
इमेज के अनुकूल नहीं है। लेकिन इस दिशा में किसी भी तरह की संतोषजनक कारवाई न
होने की स्थिति में अब उन्होंने save fm gold movement का एलान किया है। इस
कड़ी में 26 अप्रैल 2010 को एक बार फिर ऑल इंडिया रेडियो की डायरेक्टर जेनरल को
शिकायत पत्र लिखकर बद से बदतर होती चैनल की स्थिति से अवगत कराने की कोशिश की
है। फिलहाल वो अपनी सारी कारवाई संबंधित अधिकारियों और विभागों के प्रति शिकायत
दर्ज करके कर रहे हैं फिर भी किसी भी तरह का सुधार नहीं होता है तो जल्द ही
सड़कों पर उतर आएंगे और फिर ये आंदोलन सिर्फ प्रजेंटरों का न होकर हम सब
रेडियोप्रमियों का होगा।

एफएम गोल्ड के भीतर जो भी गड़बड़ियां हैं, वो कोई एक स्तर पर नहीं है। इस संबंध
में अगर आरटीआई डालें जाएं, तो संभव है कि आकाशवाणी के भीतर बड़े पैमाने पर
घोटाले निकलकर सामने आएं जिसमें कि पैसे को लेकर भी घपले शामिल हो सकते हैं। इस
बात की संभावना इसलिए भी जतायी जा रही है कि पिछले एक साल से करीब साठ एफएम
गोल्ड के प्रजेंटरों, जो कि चैनल की आवाज हैं, जिनके कारण लोग चैनल से
सीधे-सीधे जुड़ते हैं, उन्‍हें कोई भुगतान नहीं किया गया है। इस बात की शिकायत
पर केंद्र के वित्तीय अधिकारी की तरफ से जवाब मिला कि उनका पैसा कॉमनवेल्थ के
लिए लगा दिया गया है, इसलिए ऐसा हुआ है।

लेकिन मामला ये नहीं है। इस पर डिप्टी डायरेक्टर जेनरल राजकमल ने प्रजेंटरों को
साफ कहा कि आपलोगों के लिए दो करोड़ रुपये अलग से जारी किये गये हैं और
कॉमनवेल्थ से आपकी पेमेंट का कोई संबंध ही नहीं है। उस काम के लिए अलग से 25
करोड़ रुपये आकाशवाणी को दिये गये हैं। ऐसे में सवाल उठते हैं कि एक ही संस्थान
को लेकर दो अलग-अलग वर्जन क्या कहते हैं?

जारी है यहां तुगलकी फरमान
इन दिनों रेडियो प्रजेंटरों पर दबाव बनाकर एक ड्राफ्ट पर साइन करवाया जा रहा
है, जिसमें ये लिखा है कि प्रजेंटर एक महीने में छह से ज्यादा किसी भी विभाग,
चैनल में कार्यक्रम नहीं करेंगे। इस पर साइन करने का मतलब होगा कि प्रजेंटर
अपनी मर्जी से छह से ज्यादा कार्यक्रम नहीं करना चाहते हैं जबकि ये छह
कार्यक्रम करके भी उनका क्या होगा? एक कार्यक्रम के लिए उन्हें 1600 रुपये
मिलने का प्रावधान है। पहले ये राशि लगभग इसकी आधी हुआ करती थी। बढ़ी हुई ये
राशि उन्हें अभी मिली नहीं है। राजधानी या इंद्रप्रस्थ चैनल में ये राशि मात्र
400 रुपये है। अधिकांश लोगों को कम से कम तीन के बाद चार या पांच कार्यक्रम
करने को मिलते हैं। अगर उन्हें 6 कार्यक्रम मिल भी गये तो कुल 9,600 रुपये बनते
हैं। कुछ प्रजेंटर जो कि पार्टटाइम के तौर पर काम करते हैं, उन्हें छोड़ दें तो
बाकी के जो पूरी तरह इस पर ही निर्भर हैं उन्हें अगर सालभर तक दस हजार के आसपास
की ये रकम भी नहीं मिलती है तो उनकी हालत क्या होगी – इसका अंदाजा आप लगा सकते
हैं।

इस पर भी साइन करवाने के पीछे की राजनीति ये है कि कोई भी व्यक्ति अगर कैजुअल
स्टेटस पर 90 दिनों तक संस्थान में काम कर लेता है, तो परमानेंट होने की उसकी
दावेदारी बढ़ जाती है। इसलिए पूरी कोशिश होती है कि ऐसी स्थिति आने ही न दिया
जाए। कागजी तौर पर ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि वो महीने में छह दिन ही कार्यक्रम
देंगे। इस संबंध में जब एक प्रजेंटर ने साइन करने से ये कहते हुए मना कर दिया
कि आप हमें लिखित तौर पर दिखाएं कि किस ऑफिशयल ऑर्डर के तहत ऐसा है, तो
प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव रीतू राजपूत का साफ कहना है कि अब हर बात के लिए फाइलें
तो नहीं खोली जा सकती। वैसे भी आकाशवाणी से जुड़ते समय ही उसके कागजात में इतने
क्लाउज पहले से शामिल होते हैं कि प्रजेंटर के हाथ-पैर पूरी तरह बंध चुके होते
हैं। वो ज्यादा कुछ कर नहीं सकता। लेकिन उसके बाद पेक्स (प्रोग्राम
एग्जीक्यूटिव) की मनमानी के बीच सर्वाइव करने का एक ही तरीका है कि वो महज एक
चमचा बनकर रह जाए।

भाषा में बोल्‍ड हूं, इतना कायर हूं कि एफएम गोल्‍ड हूं

भाषा को लेकर आकाशवाणी सहित एफएम गोल्ड में ऊटपटांग प्रयोग जारी है। चैनल की
पेक्स रीतू राजपूत का जबरदस्ती का हिंदी प्रेम स्टूडियो के भीतर चस्पाये
निर्देशों से लेकर कार्यक्रम में प्रयोग किये जानेवाले शब्दों, संबोधनों में भी
साफ तौर पर दिखाई देता है। यहां प्रजेंटरों के लिए सूत्रधार शब्द का प्रयोग
किया जाता है और एसएमएस पैगाम हो जाता है। वैयाकरणिक तौर पर ये दोनों शब्द
प्रयोग तो गलत हैं ही, दूसरी बात कि ये हिंदी को सहज बनाने के बजाय हास्यास्पद
ज्यादा बनाते हैं।

भाषा को लेकर आकाशवाणी सहित चैनल के भीतर का एक और गड़बड़झाला है। ऑडिशन की
लंबी प्रक्रियाओं के बाद, जिसमें कि तीन से चार लोग ही पास हो पाते हैं, वाणी
सर्टिफिकेट कोर्स नाम से पांच दिनों की ट्रेनिंग दी जाती है। इस ट्रेनिंग के
लिए पास हुए लोगों से पांच हजार रुपये लिये जाते हैं। कोर्स के पीछे का तर्क है
कि वो इसमें भाषा-दक्षता, विशेषता और व्यावहारिक प्रयोग के बारे में जानकारी
देंगे। लेकिन दिलचस्प है कि ये ट्रेनिंग सिर्फ हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के
लोगों के लिए है। बाकी नेपाली, तमिल, मलयालम या दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए
नहीं है। विदेश प्रसारण सेवा में जो भाषाएं शामिल हैं, उनके लिए भी नहीं। वो
बिना किसी तरह की रकम या ट्रेनिंग लिये प्रवेश पा जाते हैं। पिछले महीनों इस
बात को लेकर काफी हंगामा भी हुआ जिसमें कि आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा ने
नेपाली को विदेशी भाषा करार दे दिया।

बहरहाल, ऐसा इसलिए है कि इतनी बड़ी आकाशवाणी के पास इन भाषाओं की ट्रेनिंग देने
की कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन इसका नतीजा पांच हजार देकर आये लोगों के बीच के
असंतोष का पनपना है और ये भाषाई भेदभाव का मामला बनता है। वो पांच हजार में
पांच दिन कोई गंभीर ट्रेनिंग के बजाय खाने-खिलाने के तौर पर काट देते हैं। अगर
इस तरह पांच हजार लेकर एक कमाई का जरिया ही बनाना है तो फिर ये काम बाकी भाषाओं
के साथ क्यों नहीं? पिछले दिनों से आकाशवाणी के भाषा संबंधी रवैये को लेकर
संसदीय राजभाषा समिति जो भी जांच कर रही है जिसमें कि नेपाली और फ्रेंच विशेष
रूप से शामिल हैं, इस कड़ी में बाकी के भाषाई सवाल शामिल किये जाते हैं तो कई
और गड़बड़ियां सामने आने की गुंजाइश बनती है।

“वो भूली दास्‍तां” उर्फ कंटेंट और पुराने रिकॉर्डर का कबाड़

कंटेंट के स्तर पर एफएम गोल्ड का बुरा हाल है। मैं पिछले तीन महीने से लगातार
इस चैनल को आब्जर्व कर रहा हूं। इसमें कोई निराला की कविता तोड़ती पत्थर को
सिनेमा के गीत से जोड़ दे रहा है तो कोई शिवरात्रि के मौके पर आदिम जमाने के
क्लास नोट्स पढ़ने लग रहा है। अधिकांश विशेष अवसरों के कंटेंट बदलते नहीं है।
मसलन होली, दीवाली से लेकर तमाम आर्थिक-राजनीतिक घटनाएं तेजी से बदल रहे हैं
लेकिन प्रस्तुति के स्तर पर कोई प्रयोग नहीं है। दूसरी बात कि जो ब्रॉडकास्ट हो
रहा है, उसके पीछे कंटेंट को लेकर अगर ऑथेंटिसिटी और अकाउंटेबिलिटी की बात की
जाए तो चैनल के पास शायद ही कोई संतोषजनक जवाब हो। अखबारों की कतरनों के बूते
बनायी जानेवाली अधिकांश स्क्रिप्ट के पीछे कोई रिसर्च नहीं है। इस कंटेंट से ही
जुड़ा एक बड़ा सवाल
बजनेवाले संगीत का भी है।

रेडियो प्रजेंटर के लिए ये भारी सिरदर्द का काम है कि वो जो भी ट्रैक बजाये,
चाहे वो लिस्नर की फरमाइश पर ही क्यों न हो, उसे वो खुद मैनेज करे। म्यूजिक
प्लेयर डिजिटलाइज हो जाने की वजह से पुराने सारे रिकार्डर बेकाम के हो गये हैं।
करोड़ों रुपये की धरोहर बेकार हो गयी जिसकी कोई खोज-खबर नहीं है। एआईआर ने उसे
गंभीरता से न लेकर डिजीटल फार्म में नहीं बदलवाया। नतीजा एक बड़ा भारी संसाधन
बेकार हो रहा है। अगर जो मटीरियल यहां मौजूद हैं, तो वो भी सरकारी टाइम-टेबल से
ही मिलने हैं – जिसमें कि दस से पांच की ड्यूटी के बीच लंच ब्रेक भी शामिल है,
बाबू के नहीं होने की भी कहानी है। कुल मिलाकर एफएम गोल्ड के स्टॉक का कोई सीधा
लाभ न तो लिस्नर को मिल रहा है और न ही प्रजेंटर को कोई सुविधा मिल पा रही है।
अब एफएम गोल्ड पर जो बजता है वो समझिए प्रजेंटर का अपना जुगाड़ है। वो घर से,
बाजार से जहां से भी हो, सीडी लाये और एफएम गोल्ड पर बजाये। पहले ये पैनड्राइव
में लाया करते लेकिन वायरस आ जाने का हवाला देकर ऐसा नहीं करने दिया जाता। ऐसे
में ये सवाल जरूर उठता है कि तब कार्यक्रम को बेहतर बनाने में प्रोग्रामिग टीम
की तरफ से क्या एफर्ट लगाये जा रहे हैं।

तकनीकी रूप से बात करें तो देशभर में चलनेवाले प्राइवेट एफएम चैनलों को प्रसारण
सुविधा देने का काम स्वयं आकाशवाणी के ट्रांसमीटर से होता है। लेकिन ये बिडंबना
देखिए कि निजी चैनलों के लिए जहां 20 किलोवाट का ट्रांसमीटर है वहां एफएम गोल्ड
मात्र ढाई किलोवाट के ट्रांसमीटर पर चल रहा है। आधिकारिक रूप से इसे 5 किलोवाट
पर चलाने का प्रावधान है। तकनीकी रूप से बहुत गहराई में न भी जाएं तो इतना तो
समझ ही सकते हैं कि आकाशवाणी चैनलों जिसमें कि गोल्ड भी शामिल हैं, फ्रीक्वेंसी
को लेकर एक-दूसरे पर जो चढ़ा-चढ़ी होती है, उसके पीछे इसी तरह की हरकतें
जिम्मेदार हुआ करती होगी। एफएम गोल्ड डिजिटल फार्म में है फिर भी रेडियो सिटी
या मिर्ची की तुलना में उसकी आवाज में स्पष्टता कम है।

पैसा न कौड़ी, बाजार में दौड़ा दौड़ी

और अंतिम बात कि माध्यम और प्रसारण का सारा खेल विज्ञापन का है, उसकी ब्रांडिंग
और रेवेन्यू का है लेकिन एफएम गोल्ड की कहानी इस मामले में भी अलग है। चैनल को
बेहतर विज्ञापन मिले इसके लिए कोई मार्केटिंग स्ट्रैटजी नहीं है। आकाशवाणी की
साइट पर इसका कॉलम बुत्त पड़ा है, कहीं कोई अपडेट नहीं है। हैरानी की बात है कि
जिस आकाशवाणी की ऑडियो रिसर्च यूनिट इसके सबसे ज्यादा सुने जाने का दावा करती
है वही चैनल RAM (रेडियो ऑडिएंस मेजरमेंट) में शामिल नहीं है। ये RAM टेलीविजन
रेटिंग प्वाइंट जारी करनेवाले TAM का ही भाई है, जो कि रेडियो के लिए रेवेन्यू
खड़ा करने का पैमाना है। मामला साफ है कि इस चैनल को बाहर की दुनिया से कोई
लेना-देना नहीं है। जो भी विज्ञापन आते हैं, वो सराकारी तोड़-जोड़ का नतीजा है,
जनहित में जारी का प्रसाद है।

इन जनहित में भी क्या प्रसारित हो रहा है, इस पर बारीक नजर नहीं है। पिछले
दिनों जेएनयू के प्रोफेसर चमनलाल ने कंडोम अपनाने के जनहित में जारी विज्ञापन
पर जो लेख लिखा, उसे पढ़कर मामला और साफ हो जाता है। चैनल तुम्हारा वाला तो
सिंकदर निकला, दिनभर में पंद्रह से बीस बार जरूर बोलता है लेकिन खुद ही कई
मोर्चे पर लड़खड़ा रहा है।

और ये सब कुछ हो रहा है स्वनामधन्य कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी की नाक के नीचे,
जिनकी कविताओं की पंक्तियों से बीच-बीच में सरोकार, मानवता, नैतिकता जैसे शब्द
उड़-उड़कर कवि सम्मेलनों की शोभा बढ़ाते हैं। वाजपेयी के कंधे पर रखकर छोड़े
जानेवाले रितू राजपूत के निर्देशों पर गौर करें तो अंदाजा लग जाएगा कि कैसे देश
के कभी इतने मशहूर रहे चैनल का सत्यानाश करने की कवायदें की जा रही है और ये
महज चंद लोगों को खुश करने का अड्डा बनकर रह गया है, जहां देर रात महिला
प्रजेंटर को घर से दो किलोमीटर पहले ही छोड़ दिया जाता है और वीमेन सेल चुप्प
मार जाता है। भीतर बहुत बड़ा सडांध है, घपला है, धोखा है। ये सब हमें रेडियो
लिस्नर की हैसियत से कंटेंट और प्रस्तुति के स्तर पर दिखाई देता है जबकि भीतरी
तौर पर कहीं न कहीं ये भारी वित्तीय गड़बड़ी की मामला हो सकता है, शोषण और
सांकेतिक हिंसा का मामला हो सकता है। ऐसे में, आज मजदूर दिवस है। हम हर साल इस
मौके पर मजदूर आंदोलनों की जरूरतों, अधिकारों और उनके भविष्य को लेकर बात करते
हैं। इन दिनों आकाशवाणी और न्यूज चैनलों के भीतर काम कर रहे कलाकारों,
पत्रकारों, स्क्रिप्ट लेखकों से बात करके, उनकी जो हालत मैंने देखी है, मेरी आप
सबसे अपील है कि देशभर के मजदूरों पर बात करने के क्रम में आज उन्हें भी शामिल
कर लें।
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