[दीवान]1 मई के सवाल

shashi kant shashikanthindi at gmail.com
Sun May 2 13:26:52 IST 2010


हमारे प्रिय मित्र सतीश कुमार सिंह आजकल अटलांटा, अमेरिका की सैर कर रहे हैं.
अभी-अभी उन्होंने मुझे यह पोस्ट भेजा है, दीवान के साथियों के लिए. एक बार
पढ़कर तो देखें!
*1 मई के सवाल*
आज एक मई है. मैं अभी अमेरिका के खूबसूरत शहरों में से एक अटलांटा से यह  पोस्ट
लिख रहा हूँ. वही  अटलांटा जहाँ  मार्टिन लूथर किंग की समाधी है, जिन्होंने
अश्वेतों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी थी, और जहाँ 1996 में ओलम्पिक  खेल हुआ था.
दुनिया के सबसे अमीर और सबसे पुराने लोकतान्त्रिक देश में मजदूर दिवस मनाने की
कहीं कोई आवाज़ नहीं सुनाई पड़ी. क्या अमेरिका के सारे मजदूर धनी हैं? क्या
उन्हें वहां के सारे नागरिक अधिकार हासिल हैं? दुनिया के  सभी मजदूरों के एक
होने के स्वप्न का  नारा क्रेमलिन के चौक पर भी सुनायी नहीं दिया. एकाएक  ऐसा
क्यों हो गया की मजदूरों की आवाज़ इस दुनियां में दम  तोड़ती जा रही है. जबकि
हकीक़त है की आज भी इस दुनियां में सबसे अधिक आबादी कामगारों की ही है.

जनतंत्र के अपने मायनों के बीच अगर सबसे अधिक आबादी की आवाज़ गुम हो गयी है तो
इसमे किसका दोष है? खुद कामगारों का या उनको इशारों पे नचाने वाले  उन  लोंगो
का, जिनके लिए वे तिनके के बराबर भी हैसियत नही रखते. सवाल ये है कि दुनियां की
सबसे बड़ी आबादी आज भी ये क्यों नही समझ पाती है कि उनकी अपनी नासमझी की वजह
क्या है?

कार्ल  मार्क्स के इतने समय बीतने के बाद भी यदि मजदूरों की बात करने वाले
संगठन अपनी हैसियत राजनीति में नहीं बना पाते है तो उनके संगठन के मूल मंत्र
में जरुर कोई खामी है. मूल सूत्र के अभाव में कोई रास्ता तय नहीं हो सकता. वह
सूत्र मजदूरों के अपने बीच से आएगा, प्रयोगशाला में बैठकर इसकी चिंता नहीं कि
जा सकती है. जैसे प्यास लगने पे पानी के पास हम  खुद ही जाते है, वैसे ही
कामगारों को कोई दूसरा मंत्र नहीं देगा, उन्हें अपने लिए, अपने आपसे उस मंत्र
को ढूढना होगा.

पर ये भी सही है कि अमेरिका में बैठ कर मजदूरों और गरीबों कि चिंता नही कि जा
सकती है, ये चिंता भी उतनी ही भोथरी है, जितना  ये सोचना कि विश्व बैंक सचमुच
में दुनिया से गरीबी को हटाना चाहता है. आधार वाक्य ही जब सही नहीं रहेगा तो
निष्कर्ष कहाँ से सही होगा?  इसलिए ये कहना लाज़मी है  कि हमे प्यास बुझाने के
लिए अपना कुआं खोदना ही पड़ेगा.

विश्व बैंक की सोच को उधार लेकर जो तरक्की का रास्ता भारत में बताया जा रहा है
और उसे इंद्र से मिला हुआ वरदान माना जा रहा है, उसकी  पूरी स्थिति  को छिपाने
में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही है. भारत को अपने पैरों पे खड़ा होने के
लिए, गरीबी को हटाने के लिए उसके अपने मर्म को समझना होगा. उधार के सिद्धांतो
से कोई देश अमीर नहीं बनता.

सतीश कुमार सिंह, 946, reed road, smyrna, atlanta, USA
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