[दीवान]नहीं कहलाना पाकिस्तानी

shashi kant shashikanthindi at gmail.com
Thu May 6 21:08:37 IST 2010


 "नहीं कहलाना पाकिस्तानी"अमेरिका मे रह रहे हमारे पाकिस्तानी भाइयों को खुद को
भारतीय कहने में कोई परेशानी नहीं होती. हमारे मित्र सतीश कुमार सिंह ने
अभी-अभी अटलांटा से ये पोस्ट भेजा है. दीवान के हमारे साथी भी इसे पढ़ सकते
हैं. शुक्रिया. शशिकांतनहीं कहलाना
पाकिस्तानी...<http://gangavaranasi.blogspot.com/2010/05/blog-post_05.html>
 नहीं कहलाना पाकिस्तानी...
पाकिस्तान के लोग जो अमेरिका मे रहते हैं, उनमें से अधिकतर अपना परिचय एक
भारतीय के रूप मे देना पसंद करते हैं. कोई अमेरिकन यदि उनसे पूछता है कि" आर यू
इंडियन" तो उनका जबाब हाँ में होता है. यह बात मुझे पहली बार समझ में नही आई.
लेकिन जो भारतीय यहाँ कई सालों से हैं, उन्होने जब यही बात कही तो मुझे सच में
बहुत ही ताज्जुब हुआ. मेरी समझ में नहीं आया कि कोई कैसे अपनी राष्ट्रीयता
छिपाने में गर्व महसूस कर सकता है. भारत और पाकिस्तान में कभी भी दोस्ती का
संबंध नही रहा है, इसलिए मुझे समझने में परेशानी हुई कि कोई कैसे अपने को शत्रु
राष्ट्र का नागरिक बताने में हिचकता नही है.जिस पाकिस्तान के निर्माण के लिए
क़ायदे आज़म ने कोई कोर कसर नही छोड़ी, जिसके लिए लाखों लोगों का कत्लेआम हुआ,
वहीं के लोग केवल ६ दशकों के बाद ही अपने को वहाँ का नागरिक कहलाने में अच्छा
अनुभव नही करते हैं. जिन लोंगों ने आधुनिक भारत का इतिहास पढ़ा है, उन्हें यह
बात हजम होने वक़्त लगेगा. ख़िलाफत मूवमेंट के बाद और डाइरेक्ट एक्सन दे और
उसके बाद बटवारे के समय के दंगों की बात पढ़ने पर आज भी मॅन सिहर उठता है. जिस
नयी राष्ट्रीयता की खोज के लिए यह सब हो रहा था, उसी राष्ट्र में पैदा हुए लोग
विदेश में जाकर अपनी राष्ट्रीयता बताने में अच्छा महसूस नही करते है. वे अपने
को भारतीय बताने में ज़्यादा अच्छा समझते हैं. राजनीतिक दर्शन का विद्यार्थी
होने की वजह से पाकिस्तान की अराजकता, इस्लामिक कट्टरपंथ, ग़रीबी, तालिबान, अल
क़ायदा जैसे ढेरों प्रश्न समझ में आते हैं. अपनी वास्तविक पहचान छिपाना कोई नही
चाहता है, पर बदले हुए हालातों मे ऐसा हो रहा है तो नये राष्ट्रों के लिए होने
वाले संघर्षों का अंजाम अच्छी तरह से देखा जा सकता है.
अटलांटा में पाकिस्तान के बहुत से लोंगों के पास बिजनेस है, भारतीयों के पास भी
बिजनेस है. वे एक दूसरे से मिलते हैं, साथ मे खाना भी खाते है. मैने किसी
पाकिस्तानी नागरिक के साथ भारत में खाना नहीं खाया था.क्योंकि कभी ऐसा मौका ही
नही मिला था. यहाँ लाहोर रेस्तूरेंट में एक पाकिस्तानी परिवार ने दावत दी
थि.लजिज खाना के साथ हुई बातचीत में "राष्ट्रीयता" का दर्द साफ दिखायी दे रहा
था.
सतीश कुमार सिंह
अटलांटा
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