[दीवान]साहित्य और मीडिया पर सेमिनार आज,हैबिटेट आएं
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Tue May 18 07:11:55 IST 2010
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*हिंदी साहित्य* मीडिया के लिए सेलेबल कमॉडिटी (बिकाऊ माल) क्यों नहीं है?
क्या यह सच है कि हिंदी साहित्य में अब लोगों की दिलचस्पी नहीं के बराबर है
और एक हजार मामूली प्रिंट ऑर्डर वाले हिंदी साहित्य की हालत बहुत खराब है?
हिंदी की आखिरी बेस्टसेलर “मुझे चांद चाहिए” थी, जो सन बानबे में आयी। उसके
बाद ऐसी कौन सी किताब है, जिसको पढ़ने में पचास हजार लोगों ने सामूहिक
दिलचस्पी दिखायी हो? अगर ऐसा नहीं है कि तो हमारा मीडिया लेखक को भी उतना ही
सम्मान क्यों नहीं देता, जितना समाज के दूसरे मोर्चों पर सक्रिय रहने वाले
नायकों को देता है? ये इतने बड़े मसले हैं, जिन पर बात होना जरूरी है। संभवत:
अब तक बात इसलिए नहीं होती रही हो, क्योंकि हम सच का सामना करने से डरते हों!
*हिंदी की वर्चुअल दुनिया* के सबसे पॉपुलर मंच जनतंत्र/मोहल्ला लाइव और
पेंगुइन प्रकाशन के हिंदी सहयोगी यात्रा बुक्स के साझा प्रयास से इस विषय पर
एक सेमिनार का आयोजन किया गया है। 18 मई की शाम सात बजे इंडिया हैबिटैट सेंटर,
नयी दिल्ली के गुलमोहर सभागार में आयोजित इस सेमिनार में हिंदी साहित्य और
मीडिया के पांच जरूरी नाम सेमिनार में अपनी बात रखेंगे। ये वक्ता होंगे :
राजेंद्र यादव, सुधीश पचौरी, ओम थानवी, रवीश कुमार और शीबा असलम फहमी।
*इस संगोष्ठी में* हम बात इस पर नहीं करना चाहेंगे कि अखबार साहित्य को कितनी
जगह देते हैं या टीवी में साहित्यिक बुलेटिन्स को लेकर इतनी उदासीनता क्यों
है – बात शायद इस पर करना चाहेंगे कि हिंदी साहित्य का असर समाज पर क्यों
नहीं है और ब्रेकिंग न्यूज क्यों नहीं हैं? क्हिंदी साहित्य के साथ अपने
ऑडिएंस से संवाद की ऐसी क्या मुश्किल है?
*जनतंत्र*, मोहल्ला लाइव और यात्रा बुक्स ने मिल कर दिल्ली में सेमिनारों का
सिलसिला शुरू कर रहे हैं, जिसमें हर महीने साहित्य, संस्कृति, समाज और
राजनीति के नये सवालों पर चर्चा होगी। साहित्य और मीडिया पर बहस के साथ ही आज
का आयोजन जनतंत्र/मोहल्ला लाइव और यात्रा बुक्स की इस साझा सेमिनार शृंखला की
पहली कड़ी है। आप आएंगे, तो अच्छा लगेगा
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