[दीवान]इस देश का मीडिया मूलतः हिन्दुओं का मीडिया है

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Sep 21 01:18:44 IST 2010


17तारीख को विश्वकर्मा पूजा के मौके पर झारखंड से प्रकाशित होने वाले सभी अखबार
नहीं छपे। जाहिर है, इसमें मशीन चलानेवाले लोगों से ज्यादा मशीन को राहत
देनेवाली बात रही होगी। जिस मशीन की भगवान मानकर पूजा करें, उसे उसी दिन खटने
के लिए लगा दें, ऐसा कैसे हो सकता है? दूसरी तरफ सारे न्यूज चैनलों का प्रसारण
जारी रहा। चाहते तो चैनल में भी इस मौके पर एक दिन के लिए चैनल बंद कर सकते थे।
आखिर वहां भी तो लोहे-लक्कड़ के कई सामान होंगे, जिसमें भगवान विश्वकर्मा विराज
रहे होंगे। दिल्ली में हमें अखबार दिखाई दिये तो समझिए कि झारखंड के अखबार की
मशीन विश्वकर्मा भगवान और दिल्ली में वही अखबार की मशीन खालिस लोहा। ये ऐसे कुछ
मौके होते हैं जहां मीडिया एहसास करा देता है कि इस देश का मीडिया मूलतः
हिंदुओं का मीडिया है, जिसको चलानेवाले से लेकर पढ़नेवाले लोग हिंदू हैं। बाकी
के समुदाय से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। साल के कुछ खास दिन जिसमें
विश्वकर्मा पूजा, दीवाली सहित हिंदुओं के कुछ ऐसे त्योहार हैं, जिसमें अखबार
खरीदनेवाले को न तो पाठक और न ही ग्राहक की हैसियत से देखा जाता है बल्कि हिंदू
के हिसाब से देखा जाता है। बाकी के जो रह गये वो अपनी बला से। उन्हें अगर उस
दिन अखबार पढ़ना है, तो इतना तो बर्दाश्त करना ही होगा कि वो एक हिंदू बहुल
मुल्क में रह रहे हैं। अब आप कहते रहिए इसे सामाजिक विकास का माध्यम और पढ़ाते
रहिए लोगों को बिल्बर श्रैम की थीअरि। पत्रकारिता के भीतर कर्मकांड और पाखंड
पहले की तरह जस का तस पसरा हुआ है।

ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पक्ष में एक राय बनायी जा सकती है कि वो प्रिंट
मीडिया के मुकाबले ज्यादा खुले मिजाज का है, ज्यादा सेकुलर और कर्मकांडों से
मुक्त है। मीडिया को जो लोग एक ऑडिएंस-रीडर की हैसियत से देखते हैं, वो ये काम
बहुत आसानी से कर सकते हैं और इस मौके पर प्रिंट मीडिया की बजा सकते हैं कि
बड़ा अपने को भांय-भांय करनेवाले न्यूज चैनलों से अलग बताते हो, तुम तो उससे भी
ज्यादा पाखंडी और कर्मकांडों में फंसे हो। लेकिन जो लोग इसके अंदरूनी सच को
जानते हैं वो समझ सकते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है। यहां भी कर्मकांड के आगे
कानून को धत्ता बता दिया जाता है और जिस चैनल के नाम से रजिस्ट्रेशन है, उस पर
दूसरे नये खुलनेवाले चैनल को कुछ देर के लिए इसलिए दिखाया जाता है कि उस दिन
किसी पहुंचे हुए बाबा ने शुभ मुहूर्त बताया था। दूसरी तरफ एक चैनल में नारियल
फोड़ने में थोड़ा ज्यादा टाइम इसलिए लिया जाता है कि मनहूस वक्त निकल जाए।
मनोरंजन चैनलों में खासकर सीरियलों पर गौर करें, तो लगभग सारे हिंदुओं के
त्योहार के मौके पर उनके स्पेशन एपिसोड तैयार किये जाते हैं। दूसरी मान्यताओं
का कोई शख्स अगर इन सीरियलों को देखना चाहे तो वो हिंदुओं के कर्मकांड और पाखंड
को झेलने के लिए अभिशप्त है। कुल मिलाकर मीडिया के तमाम रूपों का चरित्र लगभग
एक-सा है।

जिस मीडिया की जुबान पर बात-बात में राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति की बहुलता को
बचाने की चिंता और सबसे ज्यादा सेकुलर साबित करने की होड़ लगी रहती है, वो खुद
किस तरह से राष्ट्रीयता की मूल भावना में मठ्ठा घोलने का काम करता है, इसे ऐसे
ही मौके पर बारीकी से समझने की जरूरत है। यहां ये साफ कर दूं कि राष्ट्रीयता को
लेकर मेरी अपनी वही समझ नहीं है, जो कि 15 अगस्त और 26 जनवरी में सरकारी
चबूतरों से दोहराये जाते हैं और न ही जिसके राग अलापकर सिम बेचे जाते हैं। मैं
इसे आधुनिकता की सबसे शातिर अवधारणा मानता हूं। खैर, जो प्रभात खबर ये लिखता है
– अखबार नहीं आंदोलन, वो अगर विश्वकर्मा पूजा के दिन अखबार नहीं छापता है, मशीन
को देवता मानकर पूजता है और उसे रेस्ट देता है, वो अपनी सालभर की प्रगतिशीलता
के बावजूद भी किस तरह के मैसेज समाज को दे रहा है, इस पर बात होनी चाहिए।
फेसबुक पर बस दो लाइन का ही स्टेटस लिखने पर लोगों की नसीहतें मिलने लगी। कुछ
ने बहुत ही महीन तरीके से रिएक्ट किया और मजदूरों को आराम देने के एंगिल से
असहमति जगायी तो तो किसी ने बातचीत के माध्यम से कहा कि यहां अखबार विश्वकर्मा
पूजा के मौके पर नहीं छपेंगे तो तुम क्या चाहते हो कि ईद के मौके पर न छपे? माफ
कीजिएगा, मैं इस तरह के समाहार की समझ लेकर नहीं सोचता कि ऐसा किया जाए कि
एक-एक दिन उन तमाम समुदायों, पंथों और मान्यताओं के खास मौके पर अखबार नहीं
छापे जाएं। ये काम नेताओं के लिए ही छोड़ दिया जाए तो बेहतर होगा। फिलहाल हम
दूसरे मसले को लेकर बात को आगे बढ़ाना चाहेंगे।

इस देश के ज्यादातर अखबार, देश को फिलहाल रहने दीजिए, झारखंड की ही बात करें तो
ज्यादातर अखबार उन हिंदू मालिकों के हैं जो कि हिंदू कर्मकांडों और मान्यताओं
पर घनघोर तरीके से भरोसा रखते हैं। वैसे भी धंधा करनेवाले लोग धार्मिक
क्रियाकर्म में अक्सर सक्रिय पाये जाते हैं। उस एक मालिक की समझ और मान्यता
पूरे अखबार पर लाद दी जाती है जिसे कि पत्रकार छुट्टी मानकर मौज में आकर हम
जैसे लोगों को फोन करके टाइम पास करते हैं। एहसास कराते हैं कि आज रिलेक्स फील
कर रहे थे तो सोचा कि याद कर लूं। वो हमारे माई-बाप जैसे बन जाते हैं और हमसे
हिसाब-किताब मांगने लग जाते हैं कि क्या चल रहा है? क्या किसी पत्रकार के दिमाग
में ये सवाल कभी आता होगा कि जिस विश्वकर्मा पूजा या दीवाली के नाम पर वो चिल्ल
हो रहे हैं, उसका बड़े संदर्भ में क्या अर्थ जाता होगा? कहने को बहुत ही सपाट
तरीके से कहा जा सकता है कि पत्रकार क्या कोई काठ का बना हुआ है, उसके
घर-परिवार बच्चे नहीं हैं कि वो त्योहार मनाएं? ये सरासर जबरदस्ती का मुद्दा
बनानेवाली बात हो गयी। सही कह रहे हैं, लेकिन कभी सोचा कि जिस राष्ट्रीयता और
अनेकता में एकता की दुहाई आपकी कलम और उस दिन तो आपका मालिक भी देता है, उसमें
आपके खुद के एटीट्यूड भी शामिल होते हैं। ऐसे में आपको आज के एटीट्यूड का ध्यान
दिलाया जाए तो इसमें बेजा क्या है? सबसे बेसिक और जरूरी सवाल और वो भी खासकर
प्रिंट मीडिया के लोगों से कि आपने पूरे देश के लोगों के लिए जो पैमाना बना रखा
है, क्या वही पैमाना खुद आप पर लागू नहीं किया जा सकता? आप जिसे छुट्टी मानकर
मजे ले रहे हैं, वो दरअसल एक तंग सोच को मजबूती दे रहे हैं। आपके कहने और लिखने
के अंदाज से तो ऐसा लगता है कि आपको जैसे किसी बड़ी शक्ति ने कान में मंत्र
फूंक दिया कि जा तेरा काम समाज को ठोक-पीटकर दुरुस्त करना है, तू पैदा ही इस
काम के लिए हुआ है और आप लग गये राष्ट्रीयता की रक्षा करने में।

जिसने हमसे सवाल किया कि आप मजदूरों के लिहाज से सोचिए न कि इसी बहाने उन्हें
एक दिन की छुट्टी मिल जाती है, तो इसमें बुरा क्या है? हुजूर, क्या अब तक इस
देश में मानव कल्याण के सारे एजेंडे धर्म के जरिये ही पूरे किए जाएंगे, बाकी
मानवाधिकार, कानून सब पुटपुटिया बजाने के लिए हैं क्या? आप अगर इन मजदूरों को
लेकर सचमुच कुछ सीरियसली सोच रहे हैं तो बेहतर हो कि आप इस बात पर गौर करें कि
उन्हें कैसे 14-15 घंटे बिना अतिरिक्त पैसे दिये काम की भट्टी में झोंका जाता
है। जहां दिन-रात मानवाधिकार, इंसानियत, न्याय जैसे शब्द सैकड़ों बार सिर्फ एक
दिन के अखबार में छपते हैं। सालभर तक चूसने का जो विधान चला आ रहा है, उससे एक
दिन विश्वकर्मा पूजा के नाम पर रिहा करना जितना जेनुइन और मासूम दिखाई देता है,
वो उतना ही खतरनाक है। दिक्कत तो ये है कि ये ऐसा मसला है कि इसमें आरक्षण,
सरकारी हस्तक्षेप और कानून का मामला सीधे-सीधे भी नहीं बनता। रह जाती है तो वही
नेतागिरी, जिसमें ये कहा जाए कि होली-दीवाली, विश्वकर्मा पूजा की ही तरह ईद,
क्रिसमस के नाम पर भी उस दिन अखबार नहीं छपेंगे। लेकिन पत्रकारों की दफन हो
चुकी पहल के आगे इस नेतागिरी का क्या रंग होगा, ये हमें पहले से मालूम है।

मूलतः प्रकाशित-
मोहल्लाlive<http://mohallalive.com/2010/09/20/vineet-kumar-react-on-hindi-media-traditional-approach/>
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