[दीवान]तीसरा सत्रः सिनेमा और बाजार

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Sep 28 22:11:37 IST 2010


*मंच पर बैठे हैं संजय झा मस्‍तान, अजय ब्रह्मात्‍मज, अनवर जमाल, जयदीप वर्मा
और अनुराग कश्‍यप*

सिनेमा के होने और बनने में बाजार बड़ी भूमिका है। अगर हम मेनस्ट्रीम सिनेमा की
बात करें तो कंटेंट से लेकर ट्रीटमेंट तक में बाजार और पैसा साफ तौर पर दिखाई
देता है। सिनेमा पर इसके बिना बात नहीं की जा सकती। बहसतलब 5 के तीसरे सत्र में
हिंदी सिनेमा का बाजार पर जमकर चर्चा हुई, जिसमें सिनेमा की लागत से लेकर अपनी
मर्जी का सिनेमा बनाने, ऑडिएंस ढूंढने, नये माध्यमों से बाजार तलाशने और
छोटे-छोटे एफर्ट से मेरठ और मालेगांव जैसे शहरों के स्वतंत्र बाजार खड़ा हो
जाने पर विस्तार से चर्चा हुई। इस सत्र में कई दिलचस्प बातें हुईं, जिसमें कि
सत्र शुरू होते ही मॉडरेटर के तौर पर युवा पटकथा लेखक वरुण ग्रोवर, जिन्होंने
कि लॉफ्टर शो से लेकर दस का दम जैसे कार्यक्रमों के लिए लिखा और अभी हाल ही में
अनुराग कश्यप के लिए फ्रस्टीआओ नहीं मूरा जैसे गीत लिखे, को मंच पर बुलाया जाना
एक है। अविनाश ने सत्र को लेकर एक छोटी सी भूमिका बनाते हुए जैसे ही वरुण
ग्रोवर को मंच पर बुलाया, अनुराग कश्यप ने चुटकी लेते हुए कहा – सिनेमा और
बाजार के सत्र का मॉडरेशन उस आदमी से करवा रहे हो, जो खुद अपने आपको नहीं बेच
सकता। ये वरुण को लेकर जितनी चुटकी थी, उतनी उसकी इंडस्ट्री में जाकर फार्मूला
लेखक न हो जाने की तारीफ भी। बहरहाल…

वरुण ग्रोवर ने बाकी मॉडरेटर से अलग विषय को और बेहतर तरीके से खोला। चूंकि
विषय प्रवर्तन का काम भी उनके ही जिम्मे था, तो इसलिए भी उन्हें ऐसा करने का
मौका ज्यादा मिल पाया। मंच पर बैठे सारे वक्ताओं का परिचय उन्होंने अपने तरीके
से दिया। ये जानते हुए कि दूसरे दिन तक हममें से अधिकांश लोग सबों को बेहतर
तरीके से जान गये हैं।

वरुण ग्रोवर ने अपना परिचय देते हुए कहा कि मेरा मेन काम सटायर राइटिंग है।
टेलीविजन पर सटायर का जो हाल है, मुझे लगा कि बुरा ही करना है तो सोचा कि मैं
ही करूं, लोग बहुत बुरा कर रहे हैं इस फील्ड में। यहां मॉडरेटर हूं, मेरी कोई
इज्जत नहीं है, आप जब चाहें मुझे टोक सकते हैं। सुकेतु मेहता ने लिखा एक जगह,
जयदीप ने ये बात कही थी इस इंडस्ट्री में जिस समझदारी से फिल्म बना रहे हैं,
उससे ज्यादा समझदार लोग हैं। कई बार समझदारी सिनेमा में खो जाती है। यहां बड़ा
इनसेंटिव है कि आप सीधे बात कर सकते हैं। वक्ताओं का परिचय देने के क्रम में ही
उन्हें हमसे इस रूप में परिचित कराया कि हमारे दिमाग में साफ नक्शा बन जाए कि
किस वक्ता से किस तरीके के सवाल किये जा सकते हैं और हमें उसे किस तरह की
उम्मीद रखनी चाहिए?

अनवर जमाल का परिचय देते हुए कहा कि साहित्यकारों पर फिल्मों की एक सीरीज बनायी
हैं, स्वराज फिल्म बनायी है। एनजीओ के लिए फिल्म बनाते हैं, इससे आप एक हद तक
समझ सकते हैं कि ये भी सिनेमा का एक रेवेन्‍यू मॉडल हो सकता है। अजय
ब्रह्मात्मज के बारे में वरुण कहते हैं कि एक फिल्म पर जितने रिव्यू आये हैं,
वो सब मेरे ब्लॉग पर आ जाएं। अजय मानते हैं कि हिंदी सिनेमा की बात हिंदी में
हो। वरुण ने तीसरे वक्‍ता का परिचय देते हुए कहा कि संजय झा के साथ मस्तान नाम
जोड़ा जाए। कुल तीन फिल्में बनायी हैं इन्होंने, एक फिल्म है इनकी – प्राण जाए
पर शान न जाए। हम जो सटायर से डरते हैं, हम सिनेमा में अपनी बुराई करते हैं, तो
वो एक तरह की प्रीज ही लगती है। संजय झा मस्‍तान ने स्ट्रिंग और मुंबई चकाचक
नाम से फिल्म बनायी है। मुंबई चकाचक को लेकर झमेले की एक लंबी कहानी है, जिसे
कि बाद में अजय ब्रह्मात्मज साफ करते हैं। जयदीप के बारे में वरुण कहते हैं कि
वो इकलौते हैं जिनकी म्यूजिक की समझ बहुत सधी हुई है। कहते हैं कि म्यूजिक की
कोई भाषा नहीं होती। हल्ला फिल्म बनायी है, आज के कनटेंपररी शहर पर बहुत ही
सटायर किया है। इंडियन ओशन बैंड पर लिविंग होम नाम से फिल्म बनायी। क्रिकेट से
बहुत लगाव है। बहुत सारे टूल्स बनाये हैं जो कि क्रिकेटर को नापने-समझने के काम
आ सकें। अनुराग कश्यप की बाकी फिल्मों की चर्चा बहुत हुई यहां, पर लेकिन लास्ट
ट्रेन टू महाकाली नाम से जो फिल्म बनायी है वो यूट्यूब पर आ गयी है।

वक्ताओं का परिचय देने के बाद वरुण ग्रोवर ने विषय को लेकर एक मजबूत भूमिका रखी
और सिनेमा और बाजार के संदर्भ में किन-किन बिंदुओं को उठाया जाना चाहिए, इसे
विस्तार से बताया।

बाजार और बिजनेस का मतलब सिर्फ बेचना नहीं – वरुण ग्रोवर

हिंदी सिनेमा का जो बिजनेस है, इसको समझना बहुत जरूरी है, ये एब्सट्रेक्ट
बिजनेस है। इसमें साबुन नहीं, आइडिया बेचना है। पैसा तो कमाना ही है क्योंकि
पैसा कमाये बिना आप सिनेमा बना नहीं सकते। एक तरीका तो ये है कि आप सीडी बनाकर
घर-घर भेज दीजिए, आपको दुख नहीं होगा। इतनी जटिलता है सिनेमा में… सबलोग गणित
लगाते हैं लेकिन सक्सेस नहीं हो पाता, अरिंदम ने लगाया, यशराज ने लगाया। बिजनेस
की जो जटिलता है, उसे वो किस तरह से सिंप्‍लीफाय करते हैं।

बिजनेस को लेकर एक सवाल जयदीप ने उठाया था कि हम कहते हैं बिजनेस लेकिन स्पिरिट
ऑफ बिजनेस नहीं है। हमारे बिजनेस में रिस्क टेकिंग है क्या? मेरे हिसाब से हमें
लोगों को बेचना आता है – इनोवेटिव तरीके से बेच सकते हैं। हम बेचने के लिए
मनीषा कोइराला के मर्डर की अफवाह भी फैला सकते हैं लेकिन हम अच्छी फिल्म कैसे
बनाएं, इस पर काम नहीं होता। हमारी पब्लिसिटी, पीआर और बेचने के तरीके में
इनोवेशन दिखता है, लेकिन रिस्क नहीं है। हम चाहते हैं कि कोई आगे बढ़े और फिर
हम उसके पीछे चलेंगे लेकिन पहले कौन बनाएगा इसी में साल निकल गये हैं।

एक और बात, क्या बिजनेस को सिर्फ बेचने तक ही सीमित हो जाना चाहिए या फिर रिस्क
टेकिंग भी होगा, क्या ये सिर्फ रिस्क टेकिंग में ही रह जाएगा।

अगला सवाल कि मल्टीप्लेक्स आया था इस वादे के साथ कि छोटी फिल्मों को प्रोमोट
करेगा। राहुल बोस की फिल्म को मल्टीप्लेक्स में देखेंगे। राहुल और मल्टीप्लेक्स
एक दूसरे के पर्याय या ट्विन के तौर पर दिखे। लेकिन अब लग रहा है कि
मल्टीप्लेक्स छोटी फिल्मों का दुश्मन हो गया है। लेकिन ये मल्टीप्लेक्स की अलग
ही दुनिया है। सारी चीजें मंहगी है। बहुत जुगत लगानी पड़ती है। बहुत ताम-झाम है
कि कि कॉबो मील लेना है कि नहीं। तो ये जो आडंबर बन गया है, उसका माइंड सेट ही
बताता है कि वो आम लोगों के लिए नहीं रह जाता। तो मल्टीप्लेक्स का सपना कितना
पूरा होता है, इस पर बात होनी चाहिए।

वरुण ग्रोवर की बातचीत के दौरान अनुराग कश्यप लोगों से सॉरी बोलते हुए
हस्तक्षेप करते हैं और अपनी तरफ से क्या प्रयास होने चाहिए, उस पर फोकस करते
हैं।

पायरेसी अपने आप में एक माध्यम है – अनुराग कश्यप

हमारे सौ लोगों के मिलने से सीन बदलनेवाला है। हम किस तरह से अपनी जगह बना सकते
हैं, उस पर बात कर सकते हैं। हम कैसे एक मार्केट बना सकते हैं, इस पर बात करनी
चाहिए। हमारी भड़ास सेम है, हम निकाल चुके हैं। हमलोग इस पर बात करें। मैंने
मोबाइल के लिए तीन-तीन मिनट की फिल्में बनायी है, जो कि मेरी सिनेमा की अब तक
की कुल कमाई से ज्यादा है।

पायरेसी अपने आप में एक नया मीडियम है, हम इसे पायरेसी बोलकर नकार नहीं सकते।
ये कौन सोचेगा कि हम उसी दिन 20 रुपये में ऑरिजिनल सीडी निकालेंगे। ये एक
ऑल्टरनेट मीडिया है, इस पर बात होगी।

अनुराग की बात को बढ़ाते हुए अनवर जमाल ने आगे हमसे अपने अनुभव शेयर किये।

मल्टीप्लेक्स में अच्‍छे सिनेमा के लिए रिजर्वेशन जैसा कुछ हो – अनवर जमाल

बाजार को बहुत नजदीक से देखने का मौका मिला। जो बाजार की स्थिति है, उससे कोई
लेना देना नहीं है। सारा खेल नंबर का है, एक्सेल सेल पर किसका नंबर है। हम जब
सिनेमा की बात करते हैं, तो ऑरिजिनलिटी या संवेदना की बात करते हैं। तब मुझे
लगता है कि अलग से बॉलीवुड शब्द की जरूरत क्यों है? मुझे लगता है कि आप एक खास
तरह का, फारुकी ने बोला कि सारा का सारा जो संबोधन है और उसका जो बाजार है –
भोजपुरी और बाकी तमाम है, वहां से मुझे लगता है कि सिनेमा को समझना चाहिए।
सिनेमा आज भी कहीं न कहीं एक बड़े समाज के लिए बहुत अच्छी चीज नहीं है। जैसे
पहले नौटंकी को खराब समझा जाता है। सिनेमा की एक बड़े समाज में आज भी
एक्सेप्टेंस नहीं है।
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