[दीवान]लप्रेक की रचना प्रक्रिया(एक)
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sat Apr 23 16:45:04 IST 2011
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फेसबुक पर रवीश कुमार ने आज से कोई तीन महीने या उससे भी पहले लप्रेक यानी लघु
प्रेमकथा की शुरुआत की तो एकबारगी पढ़कर ऐसा लगा कि जो शख्स टेलीविजन स्क्रीन
पर और जीवन में इतना सरोकारी है,गंभीरता से मुद्दों की बात करता है,उसके भीतर
का कोई आदिम फटीचर निकलकर हमारे सामने नंग-धडंग आकर खड़ा हो गया है। कभी किसी
दिलफेंक,लुच्चे-लफंगे की तरह सार्वजनिक जगहों पर इश्किया के लिए स्पेस तैयार
करने की फिराक में है तो कभी पान बेचनेवाले कल्लू और डीपीएस में पढ़नेवाली
लड़की के बीच कुछ-कुछ हो जाने की उम्मीद पाले बैठा है। तब हमने इस लप्रेक को
किसी भी अवधारणा के नट-बोल्ट के भीतर कसने की जरुरत महसूस नहीं की थी और उसे
यह सोचकर पढ़ने लग गए थे कि रवीश क्या हर इंसान के बीच एक ऐसा दिल धड़कता है
जो सिर्फ रक्त प्रवाह के लिए मदद करने और सांसों की आवाजाही से हरकत करने के
लिए नहीं होते,उसका कुछ भावनात्मक और मानवीय भूमिका भी होती है। हम अपने भीतर
उसी दिल को टटोलने लगे थे और पाया कि वो हमारे भीतर भी मौजूद है।
साहित्यिक लेखन जिस गंभीरता और कालजयी होने की उत्कंठा की मांग करती है,लप्रेक
पहली की रचना में उसके प्रतिरोध से पैदा हुई थी। मेरे लिए आकर्षण की सबसे बड़ी
वजह यही थी और वैसे भी दिल जिसका टूटा है,किसी को लेकर रतजग्गा जिसने की
है,फ्रैक्चरड अफेयर का शिकार जो हुआ है,उसे क्या कोई साहित्य का कालजयी आलोचक
बताएगा कि वो अपनी गाथा,ह़दय विदारक अनुभवों को कैसे लिखे? भोगा हुआ सच लिखने
के लिए शिल्प की बारीक समझ से कहीं ज्यादा अन्तर्वस्तु के प्रति ईमानदारी की
जरुरत होती है,ये कुछ चंद लाइनें दिमाग में ऐसे चक्कर काट रही थी कि लिहाजा
हमने भी रवीश की तर्ज पर लप्रेक लिखने का मन बनाया। मेरे लिए लप्रेक लिखना,अपने
हिस्से के अनुभव से कहीं-कहीं ज्यादा दूसरों के प्रति ऑब्जर्वेशन थे जिसमें कि
कई बार मैं अपनी भी उपस्थिति घुसेड़ देता। इस बात का तो भय तो था ही फेसबुकिए
साथी कहेंगे कि रवीश की नकल उतार रहा है तो इसके पहले ही हमने अपने को
"पायरेटेड रवीश"घोषित कर दिया। ऐसा करने से रवीश का दुमछल्लो होने का भय तो था
लेकिन हमारे लिखे की गुणवत्ता पर कोई सवाल खड़ी नहीं कर सकता था। रवीश से तुलना
करके प्रतिक्रिया देने का मतलब था कि जबाब पहले से ही तैयार- पायरेटेड की
गुणवत्ता इससे अधिक नहीं हो सकती। रवीश के लिए लप्रेक के मुकाबले बहुत ही कम
लेकिन प्रतिक्रियाएं आने लगी और कुछ लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर कहा कि अच्छा लग
रहा है आपलोग जो फेसबुक पर इस तरह से लिख रहे हैं। तारीफ और उत्साह की बात
छोड़कर बात करें तो देखते ही देखते एक माहौल तो बन ही गया जो कि रवीश या मेरे
लिखने से बहुत आगे की चीज थी कि मेरी तरह कई और भी लोग इसी तरह से लिखने के लिए
तैयार हो गए। घंटे-दो घंटे में लप्रेक लेखकों की संख्या बढ़ने लग गयी और दो
दिनों के भीतर फेसबुक पर कुल 17 लप्रेक लेखक हो गए। फेसबुक के भीतर
कहानीकारविहीन पहचान लोगों की जमात पैदा होने लग गयी थी जिसके भीतर के कैदखाने
में कुछ कहानियां सालों से कैद थी,कहानी नहीं तो धुंधली या स्क्रैच खायी हुई
यादें या फिर इश्क के अनुभवों के चिद्दी-चिद्दी टुकड़े। ये प्यार भी हैं या
नहीं,सिर्फ आभासीय सच या प्लेटोनिक,प्रेम-प्रेम सी दिखती हुई सहज मानवीय
अनुभूतियां,इसका विश्लेषण आगे कभी। लेकिन वो सबके 420 शब्दों में उसे लप्रेक के
तौर पर एक जींस की शक्ल दे रहे थे। हमने किसी को नहीं कहा था कि आप लिखें लेकिन
कोई ये कहता कि हम भी लिखना चाहते हैं तो जरुर उत्साह बढ़ाते।
लप्रेक लेखकों की संख्या जब बढ़ी तो इस पर बात करने का लोगों का तरीका भी बदला।
अब लोग इसे महज 420 शब्दों में उंगलियों की कीबोर्ड पर आकर खुजलाहट मिटाने की
सस्ती वजह देखने के बजाय आलोचनात्मक होकर देखने लग गए। सबसे पहले मिहिर ने
शुरुआत में लिखा कि रवीश जो लप्रेक लिख रहे हैं,दरअसल उसमें प्रेम से कहीं
ज्यादा नायक के तौर पर शहर है,उसका परिवेश और आप इसके माध्यम से दिल्ली को समझ
सकते हैं,सिटी स्पेस के बारे में जान सकते हैं। ठीक उसी तरह विनीत के लिखे में
मीडिया और अकादमिक दुनिया का परिवेश है। हमें खुशी हुई कि हमने जिस चार सौ बीसी
लेखन की शुरुआत प्रेम को केन्द्र में रखकर किया,वो अब अवधारणाओं की देहरी को
छूने लगी है और इस पर भी बात हो सकती है। कल अगर पत्रिकाओं का ध्यान इस पर जाता
है तो संभव है पूरा-पूरा एक लेख का शीर्षक ही होगा- लप्रेक के बहाने कालजयी
प्रेमकथाओं पर एक बहस। हमने सहज अंदाज में लिखा कि मिहिर इस लप्रेक के पहले
आलोचक हैं और वो हमारे लिखे पर इस तरह की प्रतिक्रिया देते रहें। वैसे भी रचना
लंबे समय तक आलोचना से निस्संग होकर नहीं रह सकती और फिर आलोचनात्मक दृष्टि भी
तो रचना ही है। इस तरह लप्रेक लिखनेवालों के साथ-साथ उस पर आलोचनात्मक समझ के
साथ बात करनेवाले मिहिर जैसे लोग भी शामिल होने लगे। हमने तब मजाक-मजाक में ही
उम्मीद पाल ली थी कि कभी बहुत सारे लप्रेक को जमा करके इकठ्ठे छपवाएंगे और
उसे"फेसबुक फिक्शन" नाम देंगे।
हमने तो अपने लिखे को पायरेटेड रवीश नाम इसलिए दिया था कि हमारे लिखे की
गुणवत्ता की कोई मिलान न करे और दूसरा कि हम पर कोई नकलचेपी का आरोप लगाए कि
इससे पहले ही अपने को घोषित कर दो कि हम पायरेटेड माल प्रसारित कर रहे हैं।
लेकिन बाद में जब लोगों ने इसकी शुरुआत की तो आप इसे विधान कह लें या फिर
वर्चुअल स्पेस पर पैदा हुई ईमानदारी की सबों ने लप्रेक लेखक के तौर पर अपना नाम
कुछ इस तरह से रखा कि उसमें रवीश किसी न किसी रुप में आ ही जाता। उदाहरण के तौर
पर हिमांशु पंड्या ने लिखा- रवीश उदयपुरी, कानपुर से गिरीन्द्र ने रवीश मैनिया,
दिल्ली से शैलेन्द्र ने खाटी रवीश...। उदयपुर से प्रज्ञा जोशी ने जब लप्रेक
लिखना शुरु किया तो लगा कि हजार लुक्का के बीच वो अकेले भारी पड़ेगी टुच्चागिरी
की हाइट कर दी उसने। शोहा महेन्द्रू की लप्रेक,इश्क अकेला नहीं है दुनिया में
गालिब,जमाने के दर्द और भी हैं टाइप से इसके कन्सर्न को विस्तार देने की शुरुआत
की। निहिता सोलेस की लप्रेक की लाइनें ऐसी होतीं कि इरफान के ब्लॉग-टूटी बिखरी
हुई की याद दिलाती। लगातार भीतर कुछ छीज रहे ठोस अनुभवों से रिसकर फेसबुक पर
जमा होती हुई एक रचना। सब रवीश के लप्रेक विधान से शुरु करते हुए भी,प्रेम पर
बात करते हुए भी,उसके घनत्व को अलग-अलग दिशा में ले जा रहे थे और पाठ के स्तर
पर,विचारणा की धरातल पर अलग तरीके से जमीन तैयार कर रहे थे।..(आगे भी जारी)
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