[दीवान]बाबा मार्क्स का अफीम

Ashish Kumar 'Anshu' ashishkumaranshu at gmail.com
Wed Aug 3 14:43:32 IST 2011


एक मित्र की फेसबुक बुक वॉल पर एक कमेन्ट था जिसका लब्बो लुआब यह कि राम-राम,
सलाम वालेकुम, सत श्री अकाल जैसे संबोधन करने वाले साथी उनके फेसबुक की फ्रेन्ड
लिस्ट से बाहर चले जाएं। वे लोग भी बाहर चले जाएं जिन्होंने अपनी तस्वीर की जगह
किसी चर्च, मन्दिर या गुरुद्वारे की तस्वीर लगा रखी है। चूंकि इस नास्तिक
फेसबुकधारी मित्र की नजर में ऐसे सभी लोग ‘धार्मिक’ किस्म के लोगों की श्रेणी
में आते हैं।



इसलिए उसकी यह अपनी वर्जनाएं हैं। धर्म हमारे जीवन में होना चाहिए नाकि पट्टे
की तरह गले में लटकना चाहिए। नास्तिक होना भी धर्म से बाहर नहीं है, जैसे
गुटनिरपेक्ष लोगों का भी अपना एक गुट होता है। धर्म अपने आप में कोई समस्या
नहंीं है, ना मुल्क के लिए ना व्यक्ति के लिए। समस्या उस वक्त आती है, जब हम
इसे मूंछ की बात बना लेते हैं या फिर ठेंगे पर रखने की बात करते हैं। जब इस तरह
धर्म इस्तेमाल होता है, कुछ दृश्य उसी तरह का होता है, जैसे आपने बच्चे के
जन्मदिन पर घर गुब्बारों की जगह कंडोम के गुब्बारो से सजा रखा हो। घर तो आपका
सज जाएगा, हो सकता शहर के अखबारों में आपके इस रचनात्मक काम की प्रशंसा भी हो
लेकिन इस बात से हम सभी सहमत होंगे कि कंडोम इस काम के लिए नहीं है।

यह हमें सोचना चाहिए कि बाबा मार्क्स ने धर्म को अफीम क्यों कहा? वे भांग गांजा
शैम्पेन कुछ और भी तो कह सकते थे। जबकि उन्होंने अपने जीवन में ना धर्म चखा, ना
अफीम चखी। अफीमचियों की कहानी आपने सुनी होगी लेकिन यह भी सच है कि हर अफीम
खाने वाला व्यक्ति अफीमची नहीं होता। जोधपुर की शादियों में अफीम का वही महत्व
है, जो हरियाणा की शादी में हुक्के का।

जब बाबा मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा, इसका मतलब दोनों पर्यायवाची हो गए। अब
धर्म को समझने का काम पंडित और शंकराचार्य करें, अफीम को समझना धर्म के वनिस्पत
थोड़ा आसान जान पड़ता है। इसलिए मंदसौर और नीमच की यात्रा की। ये दोनों जिले मध्य
प्रदेश की अफीम पट्टी के नाम से जाने जाते हैं। वहां की जेल में ऐसे लोगों की
कमी नहीं है, जिनका अफीम से कुछ खास लेना देना नहीं था और अफीम की सजा जेल में
काट रहे हैं। किसी ने दुश्मनी मंे इनकी मोटर साइकिल की डिक्की मंे या फिर इनके
झोले में अफीम डाल दी और पुलिस को फोन कर दिया कि अमुक आदमी अफीम स्मगल कर रहा
है। हो गई गिरफ्तारी। इस इलाके में सैकड़ो बच्चे अफीम खा-खाकर अपनी जिन्दगी तबाह
कर रहे हैं। अफीम की खेती चूंकि इस इलाके में सरकार करवाती है, इसलिए पुलिस की
कड़ी देख रेख में इसकी खेती होती है। यहां के रहने वाले लोग ही बताते हैं, जिन
लोगों ने अफीम का काम दो नंबर में किया, उनके घर में समृद्धि आई है। जिन लोगों
ने खेतों में अफीम को ईमानदारी से बरता, उन्हें नुक्सान ही हुआ है। ऐसे ही
नुक्सान झेल रहे व्यक्ति से जब मैंने पूछा कि जब आपको इस खेती में नुक्सान हो
रहा है? आप छोड़ क्यों नही देते अफीम की इस खेती को? अफीम के उस किसान ने कहा-
इस इलाके में अफीम की खेती मूंछो की बात है, पैसों के लिए कोई अपनी प्रतिष्ठा
छोड़ता हे क्या?

अब इस इलाके के उन लोगों की थोड़ी बात करें जो अफीम की खेती नहीं करते, उनकी नजर
में अफीम की खेती करने वाले बेईमान होते हैं। वे यह भी मानते हैं कि बिना
बेईमानी किए अफीम की खेती से कुछ मिल नहीं सकता और दूसरी तरफ जो अफीम की खेती
करने वाला समाज है, वह कहता है कि जो लोग अफीम की खेती नहीं करते उनकी समाज में
कोई प्रतिष्ठा नहीं है। अफीम की खेती माने प्रतिष्ठा की खेती। एक खास बात और
मंदसौर और नीमच में अफीम के पत्तों की एक खास सब्जी बनती है जो बेहद स्वादिष्ट
होती है। अफीम तैयार होने के बाद उससे कई असाध्य रोगों की दवा तैयार होती है।
वैसे मेडिकल साईंस भी इस बात को मानती है कि आस्तिक लोगों की तुलना में नास्तिक
लोग अधिक मनोरोग के शिकार होते हैं। नास्तिकों में अवसाद ग्रस्त होने का खतरा
आस्तिकों से कई गुणा अधिक होता है। तो क्या अफीम की उपमा आस्तिकों के साथ
जोड़कर रखी जाए या अब वक्त आ गया है जब अफीम को धर्म की परिभाषा करने से मुक्त
कर दिया जाए?
(स्त्रोत: http://visfot.com/home/index.php/permalink/4709.हटमल)

-- 
आशीष कुमार 'अंशु'
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