[दीवान]'अन्ना नहीं ये गाँधी है' अर्थात गांधीवाद के अन्ना संस्करण का एक उत्तर पाठ

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Sat Aug 27 20:01:02 IST 2011


दोस्तों,  रामलीला मैदान के चंद दिलचस्प अनुभवों को शेयर करने, भारतीय राज्य
व्यवस्था में गहराई तक पैठे भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए अन्ना की अगुवाई में
जन लोकपाल जैसी किसी संस्था को स्थापित करने की हालिया मुहीम से जुड़े कुछेक
पहलुओं पर संवाद की खातिर, और अपने आखिरी वादे के मुताबिक *गांधीवाद के अन्ना
संस्करण का एक उत्तर पाठ* ले कर चिट्ठाकार आप के समक्ष एक बार फिर हाज़िर है !
कहना नहीं होगा कि मौजूदा 'पाठ' की अनदेखी, इसका आवश्यक्ता अनुरूप  रसास्वादन
या इस पर सहमती-असहमति ज़ाहिर करने की पाठकों की मूलभूत स्वतंत्रता  का
चिट्ठाकार सौ फीसदी सम्मान करता है. हालाँकि ऐसे तमाम पाठक जिन्हें हिंदी से
परहेज है, या  'स्व'-भाव से जिनका हिंदी का हाजमा कुछ कमजोर है, या फिर इन
दिनों मौसम के असर में इस जुबान में लग रहे छौकें से दुरुस्त नहीं चल रहा हो,
को अपने इस 'पाठ' के माध्यम से जाने अनजाने पीड़ा पहुचाने या अति सीमित मनोरंजन
लाभ कराने की जवाबदेही स्वीकार करते हुए  चिट्ठाकार उन सभी पाठकों से माफ़ी का
तलबगार है.

*'पाठ' की भूमिका- *
दिल्ली का रामलीला मैदान इस बार एक नई 'क्रांति' का गवाह बनने को तैयार है. अभी
कुछ दिनों पहले ही, इसी मैदान से स्विस बैंक खातों में जमा काले धन को वापस
लाने की मांग पर अड़े योग गुरु और आयुर्वेदिक दवाओं के अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी
बाबा रामदेव को दूर दराज़ से आये उनके तमाम समर्थकों सहित आधी रात को लाठिओं के
बूते खदेड़े जाने के बाद शायद ही किसी ने सोचा हो कि दोबारा से (और वो भी इतने
कम समय अंतराल में !) यह मैदान किसी बड़ी मुहीम का साक्षी बनने जा रहा है. खुद
अन्ना हजारे भी तो जन लोकपाल बिल पास कराने के लिए धरना देने उसी जंतर-मंतर
जाया चाहते थे जहाँ पिछली बार चार दिनों तक आमरण अनशन पर बैठ कर उन्होंने
कांग्रेस सरकार से गज़ट नोटिस जारी करा सिविल सोसाइटी सदस्यों  के साथ एक
संयुक्त समिति के ज़रिये लोकपाल बिल ड्राफ्ट करने की घोषणा करवाने सहित उक्त
समिति में अपने एक प्रमुख सहयोगी को महत्वपूर्ण पद पर बिठाने जैसी अभूतपूर्व
सफलता अर्जित की थी. बलिहारी कांग्रेस के दूरंदेस और व्यवहार कुशल रणनीतिकारों
की क़ाबलियत का जिन्होंने गहन ऐतिहासिकता बोध का परिचय देते हुए इस आसन्न 'अन्ना
क्रांति' के मंच को रामलीला मैदान में लगवाना ही बेहतर पाया जहाँ से पहले कभी
जे. पी. ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा बुलंद करते हुए कांग्रेस को सत्ता से बाहर
करने जैसी सफलता पाई थी. वैसे तो मेगसेसे और बाद को भारत रत्न जैसी उपाधिओं से
नवाज़े गए गाँधीवादी लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व और सत्तर के दशक की
सम्पूर्ण क्रांति के धुर राजनैतिक लक्ष्य से तुलना करते हुए अन्ना हजारे के
नेतृत्व वाली आसन्न 'क्रांति' पहली नज़र में 'नैतिक' ज्यादा और 'राजनैतिक' कम
मालूम होती है. लेकिन  अरुंधती रॉय समेत कई बुद्धिजीविओं ने इसके राजनैतिक
निहितार्थों पर भी अब तक पर्याप्त टीका टिप्पणी कर दी है.  हालाँकि, यह एहसास
कर कि विद्वानों के बीच मौजूदा 'क्रांति'  के चरित्र, इसके कारणों, और इससे
जुडी संभावनाओं को लेकर वाद विवाद अभी जारी है, इस चिट्ठाकार की अपनी समझ के
मुताबिक पहले से इस मुहीम या इसके भविष्य के बारे में कोई आखिरी राय कायम कर
लेना थोड़ी जल्दबाजी होगी.  मगर हाँ, जब हमने ये पाया कि नौजवान तो नौजवान लेकिन
पिछली पीढ़ी के ऐसे सठियाए जवान , जो पहले कभी एक बार जे. पी. के सम्पूर्ण
क्रांति के नारे का हश्र, ठोस रूप से --जार्ज फर्नाडीस, लालू यादव, मुलायम सिंह
यादव, और प्रफुल्ल कुमार महंत जैसे समझौतावादी सत्ता लोलुपों या भ्रस्ट
राजनेताओं की पूरी खेप के रूप में--  खुद अपनी आँखों देख चुके हैं, भी 'मैं भी
अन्ना' का नारा लगा कर भ्रस्टाचारिओं पर हल्ला बोलने को तिरंगा उठाये तैयार खड़े
हैं तो दिल ओ दिमाग में ये सवाल जरुर कौंधा की आखिर ये माजरा क्या है ? पिछले
कई दिनों में हम खुद से बार बार ये सवाल करते रहे हैं कि क्या जन लोकपाल की यह
मांग  सिर्फ उदारीकरण की मलाई खा रहे मध्यवर्ग के एक छोटे से तबके की है जो
भ्रस्टाचार पर रोक लगाने के लिए अब कॉरपोरेट गवर्नेंस जैसे किसी मॉडल प्रशासन
के लिए आतुर है? या कि उदारीकरण के मौजूदा दौर में जारी व्यापक  ढांचागत
बदलावों से आगे आई नई सामाजिक शक्तियां, मसलन सिविल सोसाइटी, अब अपनी मुश्कें
भींच कर सत्ता और व्यवस्था में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराना चाहती हैं?, या
कि दोनों ही वजहों से अलहदा किसी तीसरी वजेह से पेशतर है मौजूदा सूरत ए हाल ?
साथ ही यह भी कि मौजूदा मुहीम का भविष्य क्या होगा और किस करवट बैठेगा भारतीय
राज्य व्यवस्था की दशा और दिशा का ऊंट?

*बना कर फ़कीरों का हम वेश ग़ालिब तमाशा ए अहले करम देखते हैं! *
तो दोस्तों, सबसे पहले हमने अपने ज्योतिषी मित्र, जो अक्सर ग्रहों की माया
सिद्ध करने के लिए राजा हरिश्चंद्र के सपरिवार बिकने, और डोम राजा कल्लू द्वारा
बनारस में हरिश्चंद्र को बोली लगा कर खरीदने, के साथ ही साथ, उज्जैन के राजा
विक्रमादित्य के एक तेल पेरने वाले के यहाँ नौकरी करने जैसे दृष्टान्त दिया
करते हैं, से भ्रस्टाचार विरोधी मुहीम का भविष्य जानना चाहा. इस गरज से  जब हम
अपने उन ज्योतिषी मित्र के यहाँ पहुंचे तो वे कंप्यूटर पर कुछ पढ़ रहे थे और
अपने इस काम में जरुरत से कुछ ज्यादा ही डूबे हुए लग रहे थे. बहरहाल, हमने चाय
के दौरान जब उन्हें अपने आने का सबब बताया तो ज्योतिषी महोदय ने बड़ी गंभीरता
के साथ और अपने 'ज्ञान' पूरा प्रदर्शन करते हुए कहा कि: 'वह तो रामदेव की
कुंडली का ग्रह-योग था जो अचानक बड़े बड़े बाबाओं के रहते हुए उन्हें सुर्ख़ियों
में ले आया, वैसे दिल्ली में अनशन पर बैठने का जो समय (शनिवार, ४ जून २०११,
सुबह ७ बजे) उन्होंने चुना उससे तो उनका 'पिटना' तय था. जहाँ तक अन्ना का सवाल
है, स्वतंत्र भारत की कुंडली के साथ अन्ना की कुंडली का मिलान करते हुए, तो ऐसा
लग रहा है की अगले २५ अक्तूबर २०१२ तक, अन्ना की मुहीम के असर से, सरकार
व्यवस्था के सुचारू सञ्चालन और सुधार की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण और दूरगामी
कदम उठाने को मजबूर होगी. जहाँ तक व्यक्तिगत रूप से अन्ना का सवाल है, उनके लिए
आगामी दिसम्बर (२०११) और जून (२०१२) के दो महीने बड़ा महत्व रखेंगे '. हमने भी
अपने मित्र को धन्यवाद कहा और चलते चलते उनसे ये जानना चाहा कि मेरे आने से
पहले कंप्यूटर पर इतना डूब कर वो आखिर कौन सी चीज़ पढ़ रहे थे. इस सवाल से हमारे
मित्र पूरी तरह से बिदक गए गए और मुझ पर बिफरते हुए और कुछ तंज करने के अंदाज
में उन्होंने कहा कि, 'मिश्रा जी, मनुष्य योनी और ब्राह्मन कुल में जन्म लेने
के बाद भी, काल सर्प योग के प्रभाव से आप की मती ख़राब है जो आप 'शास्त्रों' को
उपयुक्त सम्मान नहीं देते. लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि हम भी अपना 'धर्म'
भूल जायें ? जाइये, हम अभी इकोनोमिक टाइम्स में पिछले ३ जून २०११ को देवदत्त
पाठक का लिखा हुआ आलेख "लक इज सेल्द्म फेक्टार्ड  इन टू कार्पोरेट सक्सेस" पढ़
रहे हैं !'.                              *
तख़्त बदल दो, ताज़ बदल दो...!!*
कार्पोरेट लूट और भ्रस्टाचार विरोधी अन्ना मुहीम पर केन्द्रित अरुंधती रॉय का
नवीनतम आलेख, 'आई वुड रादर नॉट बी अन्ना', राज्य व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक
पैठे भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए हजारे की अगुवाई में जारी लोकप्रिय मुहीम को
एक ऐसे "रक्तपात मुक्त गाँधीवादी तख्ता पलट" के प्रयास के रूप में पेश करता हैं
जिसके लिए एक संस्था के तौर पर राज्य, और सत्तासीन कांग्रेस सरकार खुद,
"सहयोगी" की भूमिका में है, और जिस कारवाही को अंजाम देने के लिए, विशेषकर,
"दस्तों" के रूप में, खाए- अघाए शहरी संगठित नज़र आ रहे हैं.  एक विशेष अर्थ में
माओवादी संघर्षों और भ्रस्टाचार विरोधी इस "अन्ना की क्रांति" में साम्यता
(राज्य सत्ता को उखाड फेकने के तौर पर ?!) के अपने विवेचन से शुरू कर, रॉय का
'पाठ' यह घोषणा करता है कि, सत्ता के केन्द्रीकरण का उपकरण बन टीम अन्ना का
प्रस्तावित जन लोकपाल, अंततः, न सिर्फ भ्रस्टाचार की मात्रा में बढ़ोत्तरी
करेगा बल्कि "कुलीन तंत्र" में भी संख्या के तौर से एक इज़ाफा भर साबित होगा.
वैसे अगर आप इस बात पर बहस फ़िलहाल न करने की हामी भरें कि कार्पोरेट और
राजनैतिक गठजोड़ से चल रही मौजूदा राज्य व्यवस्था (जो रॉय के अनुसार सारी असमानत
और भ्रस्टाचार की पक्षपोषक और मूल वजेह भी है!) के उन्मूलन के साथ- साथ एक
भ्रस्टाचार मुक्त प्रशासन, और पूर्णतः लोकतान्त्रिक मूल्यों वाला एक नया समाज
या समानता मूलक नयी जवाबदेह शासन व्यवस्था किस जादू के ज़ोर से निर्मित होगी
या, दूसरे शब्दों में कहें तो, अगर आप इस फेर में फ़िलहाल न पड़ने का वादा करें
कि अरुंधती रॉय समर्थित और 'विकास का वैकल्पिक माओवादी मॉडल' दरअसल क्या है ?,
तो मै आप के सामने, तात्कालिक रूप से, रामलीला मैदान के कुछ दिलचस्प प्रसंग और
आँखों देखे नज़ारे पेश करने का प्रस्ताव रख आगे बढ़ने के लिए आप की इजाजत
चाहूँगा.

*सौ सौ जूते खाए, तमाशे घुस के देखे!!
*तो दोस्तों, अभी दो दिनों पहले ही, उस रस्म की जानकारी कर कि केंद्र सरकार
द्वारा मान्यता प्राप्त दिल्ली के एक विश्वविद्यालय से शोध कार्य (पी एच डी)
हेतु दाखिले की प्रक्रिया को मुकम्मल होने के लिए अभी हमें, सनद के तौर से,
अपनी 'बेरोजगारी' और 'चरित्तर' का हलफनामा (बाकायदा १० रुपये मूल्य के गैर
न्यायिक स्टाम्प पेपर पर, नोटरी के दस्तखत सहित, और इस बात का उल्ल्लेख करते
हुए कि बयान देने वाला भारतीय नागरिक है) जमा करना बाकी है, और यह भी कि उक्त
हलफनामा ६०-७० रुपये खर्चने से कहीं भी बड़ी आसानी से बनवाया जा सकता है, हम
अपनी पहले से तय योजना के अनुसार रामलीला मैदान जाने के लिए २५ रुपये का टिकट
ले ललकी (ए. सी.) बस में चढ़ गए.  कुछ देर बाद और सफ़र का जायेका बढ़ाने की गरज
से  जब हमने अपने बस्ते से एक लोकप्रिय पत्रिका का हालिया अंक निकाल कर पलटना
शुरू किया तो राजधानी में पिछले दिनों आयोजित "स्ल्ट वाक" की रपट पढ़ते हुए
हमारी बस कब बारहखंभा रोड तक जा पहुंची इसका जरा भी एहसास नहीं हुआ. तेज रफ़्तार
बस के शीशों से बाहर नज़र दौडाते हुए जैसे ही हमारी नज़रें नारे लगाते, बैनर
थामे, प्लेकार्ड और तिरंगा लिए नौजवान लड़के-लड़किओं के एक हुजूम पर जा कर ठहरी
कि बस भीतर आराम फरमा रिसर्चर- एक्टिविस्ट ने अगली ही लाल बत्ती पर हमें बस से
उतार चौराहे पर ला खड़ा किया. पीछे से आ रहे जुलूस के इंतजार में बन्दे ने एक
सिगरेट सुलगाई और कुछ ही पलों में उसी नौजवान जत्थे को ठीक अपनी बगल से गुजरता
पाया. ये समझने में कोई मुश्किल नहीं हुई की डेढ़ से दो सौ की तादाद में और
जुलूस की शक्ल में नारे लगाते निकले ये नौजवान लड़के -लड़कियां अन्ना के समर्थन
में रामलीला मैदान की ओर ही जा रहे होंगे. बस हम भी उत्साही नौजवानों का संग
बेहतर समझ उसी जत्थे के साथ साथ रामलीला मैदान की ओर चल दिए. सबसे पहले तो अपने
अन्दर उमड़ रही जिज्ञासा का समाधान करने के मकसद से हमने उसी हुजूम में शामिल एक
नौजवान से यह दरियाफ्त किया कि वो कौन लोग हैं? उस लड़के ने जरा गौर से मेरी तरफ
देखा फिर बताया कि हम लोग देहली युनिवेर्सिटी, कालेज ऑफ़ आर्ट, के स्टुडेंट
हैं. गालिबन मेरी सूफियाना वेश-भूषा का लिहाज रखते हुए मुझसे किसी ने कोई सवाल
नहीं किया, बहोत संभव है कि उन्होंने मुझे अपनी ही बिरादरी का मान कर कुछ पूछना
मुनासिब न समझा हो! बहरहाल, "शीला की जवानी बंद करो, अन्ना की वाणी चालू करो"
जैसे जुमले लिखे प्लेकार्ड हाथों में थामें ये नौजवान अन्ना/ जन लोकपाल बिल/
समर्थक जो नारे लगा रहे थे वो भी कम मजेदार नहीं. इन नारों में राजनैतिक धार
कुंद होने के बावजूद एक तरफ अगर भ्रस्टाचारी तंत्र के प्रति उनका गुस्सा साफ
झलक रहा था ('एक, दो, तीन, चार, बंद करो ये भ्रस्टाचार!') तो वहीँ दूसरी तरफ
शासन सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी को भी बक्शने के मूड में वो कतई नहीं थे
('सोनिया जिसकी मम्मी है, वो सरकार निकम्मी है!!'). टीम अन्ना ने हालाँकि दबाव
बनाने की जुगत में अपने समर्थकों से पिछले दिनों (बी. जे. पी. सहित) सारे
सांसदों का घर घेरने की अपाल की है. बावजूद इसके आम तौर पर भ्रस्टाचार विरोधी
और अन्ना (या उनके जन लोकपाल बिल) समर्थकों का गुस्सा निशाने के तौर से
सत्तासीन कांग्रेस को ही जिम्मेवार ठहराता दिखता है. मसलन, अभी कल ही मेट्रो से
अपने सफ़र के दौरान हमने उसी कोच में सफ़र कर रहे बीस के लगभग नौजवानों को 'हू,
हा, हू, हा, राहुल गाँधी चूहा!' और 'देश का युवा जाग गया, राहुल गाँधी भाग
गया!!' जैसे नारे लगाते भी सुना, खयाल रहे कि संसद में अन्ना मुहीम के सन्दर्भ
में श्री गाँधी का बयान आने से कई दिनों पहले ही हवा में तैरते ये नारे कहीं न
कहीं राहुल के युवाओं का वास्तविक रहनुमा होने के एक बेबुनियादी प्रोजेक्सन और
भ्रस्टाचार के विरोध में अन्ना की लोकप्रिय मुहीम के साथ उठ खड़े हुए युवाओं की
अपेक्षाओं को अनदेखा करने जैसे तथ्यों को भी उजागर किया चाहते थे.
खैर जब हम उत्साही छात्रों के उस नौजवान जत्थे के साथ साथ चलते हुए रामलीला
मैदान के करीब पहुंचे तो मैदान से उठते 'रघुपति राघव राजा राम' के स्वरों के
तुरंत बाद बसंती साफा सर पर बांधे भगत सिंह और राजगुरु के पारिवारिक सदस्यों का
अन्ना के समर्थन में मंच से दिया गया वक्तव्य भी सुनने में आया. यूँ तो वक्ताओं
की एक पूरी लम्बी फेहरिश्त है मगर उनमें से सिर्फ एक का जिक्र मैं आप से जरुर
करना चाहूँगा. मानुषी की एडिटर और लम्बे समय से दिल्ली में रिक्सावालों, पटरी
के दुकानदारों, और रेहड़ीवालों के अधिकारों के लिए संघर्षरत मधु किश्वर का. मधु
जी ने इसी वर्ग के नजरिये से, जिसके शहरी स्पेस पर बराबरी के अधिकार की लड़ाई
वो लडती रही हैं, अपनी बात रखी.
उन्होंने भ्रस्टाचार विरोधी लोकप्रिय मुहीम को खाए-अघाए मध्यवर्ग का आन्दोलन
बताने वालों पर सवाल करते हुए इस बात की तरफ ध्यान खींचना चाहा कि कैसे पटरी
व्यवसाई और रिक्शा चालक जैसे हाशिये के लोग भ्रस्टाचारी प्रशासनिक-राजनैतिक
व्यवस्था के हाथों न सिर्फ रोजाना 'लुटते' बल्कि 'पिटते' भी हैं और इस लिहाज से
भी भ्रस्टाचार पर अंकुश लगाना सभ्य समाज की एक तात्कालिक जिम्मेवारी बनती है.
खबर है कि किसानो के नेता नरेश टिकैत, जिन्होंने अन्ना की लड़ाई को जायज बताते
हुए इसके समर्थन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के साथ दिल्ली कूच करने
का भी ऐलान किया है , ने मायावती द्वारा अन्ना को चुनाव लड़ने की सलाह  और राहुल
गाँधी के ताजातरीन बयान  पर अपना एतराज जाहिर करते हुए यह सवाल भी किया कि यह
सोचने की बात है की आम आदमी भ्रस्टाचार के खिलाफ भला कैसे लडेगा? बाद को चुनाव
विश्लेषक और राजनैतिक समाजशास्त्री योगेन्द्र यादव ने भी अपने वक्तव्य में शायद
कई शंकाओं का जवाब देने की गरज से ही इस बात पर जोर दिया है की लोकतंत्र को
मजबूती सड़कों, गलियारों और मैदानों में होने वाले आंदोलनों से मिलने की बात
इतिहास से साबित होती है.  बहरहाल,  उपस्थिति के तौर से रामलीला मैदान में
गृहणियों और महिलाओं सहित हर आयु-वर्ग और विविध पेशों से जुड़े लोगों की मौजूदगी
न केवल एक बड़े मेले सा लुभावना दृश्य बनाती बल्कि इस पहलू से सोचने पर भी
मजबूर करती है की आखिर इन तमाम लोगों की लाइफ को यूं चेंज कर देने वाला आईडिया
दरअसल क्या है ? खैर अपनी उधेड़बुन में डूबे जब हम रामलीला मैदान से निकलने को
हुए तभी हमारी नजर एक समर्थक की तख्ती पर पड़ी जो यह दावा पेश कर रही थी कि
"अन्ना नहीं ये गाँधी है!"

*'अन्ना नहीं ये गाँधी है' और **'दूसरी **आजादी की लड़ाई'
*भ्रस्टाचार के खात्मे के लिए जन लोक पाल बिल को संसद से पास करवाने की अपनी
माँग के क्रम में  दबाव बनाने के इरादे से अनशन पर बैठने जे पी पार्क जा रहे
अन्ना हजारे को जब पोलिस ने दिनांक १६ अगस्त को बंदी बना लिया तो उसके ठीक बाद
जारी देशवासिओं को संबोधित अपने पहले सन्देश में श्री हजारे ने 'दूसरी आजादी की
लड़ाई' की शुरूआत का बाकायदा ऐलान करते हुए अपनी इस दूसरी आजादी की लड़ाई को
'परिवर्तनवादी' और एक 'सच्चे प्रजातंत्र' की स्थापना की दिशा में पहला कदम करार
दिया. अगले दिन, १७ अगस्त को, द इकोनोमिक टाईम्स की रपट में श्री हजारे की इस
तथाकथित 'दूसरी आज़ादी की लड़ाई' पर कमेन्ट करते हुए एक तरफ तो इसकी समय अवधि के
लम्बा खींचने की शंका जाहिर की गयी तो वहीँ दूसरी तरफ इस मुहीम की मांगों और
तरीको पर भी सवाल खड़े किये गए हैं. सनद रहे कि, अरुंधती रॉय भी मौजूदा मुहीम की
'माँगों' को  'गाँधीवादी' मानने से इंकार करती हैं. इतना ही नहीं दलित विचारक
उदित राज ने अन्ना के जन लोकपाल बिल के सामानांतर बहुजन लोकपाल बिल प्रस्तावित
कर लोकपाल के गठन में दलितों कि भागीदारी सुनिश्चित करने कि मांग रखी है. साथ
ही उदित राज जी गैर सरकारी संगठनों, मीडिया और कार्पोरेट को भी लोकपाल के दायरे
में लेन का प्रस्ताव रखते हैं. इस कड़ी में अरुणा रॉय द्वारा प्रस्तावित बिल तो
पहले से ही चर्चा में है. वैसे तो खुद प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने प्रधान
मंत्री पद को लोकपाल के दायरे में ले आने की बात स्वीकार की है लेकिन सहयोगिओं
के विरोध के चलते वे ऐसा करने में समर्थ नहीं हैं ऐसा उनका तर्क है. संसद में
जन लोकपाल बिल को पास कराने और सरकार द्वारा प्रस्तावित बिल को वापस लेने की
मांग से शुरू कर अन्ना की टीम और समर्थक अब बीच का रास्ता तलाशते हुए इस
सन्दर्भ में कुछ एक मुद्दों पर संसद में बहस की शुरुआत के समाधान तक आ पहुंचे
हैं. लेकिन सत्ता पक्ष और अन्ना पक्ष दोनों ही अपने लिए सम्मानजनक स्थिति चाहते
हैं और इस वजह से भी अब तक गतिरोध बना हुआ है और यह चिट्ठा लिखने तक तो इस
मामले में कोई हल निकलता नहीं दिख रहा है.
कहना नहीं होगा कि जहाँ तक लोकपाल या जन लोकपाल जैसी किसी संस्था के गठन का
सवाल है तो इस को ले कर जनमत पूरी तरह विभाजित दिखता है. इस सन्दर्भ में जब
हमने अपने दोस्तों की राय जानना चाहा तो कुछ महत्वपूर्ण पहलु उभर कर सामने आये.
पिपली लाइव की डिरेक्टर अनुषा रिज़वी ने हमारी मौजूदा व्यवस्था की मजबूती और
कमजोरिओं का हवाला देते हुये यह कहा कि सबसे पहले तो लोकपाल के निर्वाचन में जन
भागीदारी सुनिश्चित करना चाहिए . इससे न सिर्फ इस संस्था को जनता के प्रति
जिम्मेवार बनाया जा सकेगा बल्कि इसके असीमित अधिकार हासिल कर  गैर जवाबदेह होने
का खतरा भी एक सीमा तक कम हो जायेगा. साथ ही इस मुल्क के विविधतापूर्ण चरित्र
को देखते हुए इस संस्था में विभिन्न प्रतिनिधि समुदायों की भागीदारी भी होनी
चाहिए. एक बड़ा प्रश्न जो अन्ना के प्रस्तावित बिल से जुड़ा है वो ये कि फर्ज
कीजिये आप एक व्यक्ति को राज या  सरकारी तंत्र में फैले भ्रस्टाचार को मिटाने
के लिए असीमित अधिकार दे देना चाहते हैं तो उस व्यक्ति को भला कैसे चुनेंगे ?
इसके बाद यह भी मान लें कि वो व्यक्ति भ्रस्टाचार में लिप्त नहीं हो जायेगा
लेकिन क्या गारेंटी है कि अपराधी तत्वों और माफिया के द्वारा उस पर दबाव बनाने
के लिए जो तरीके इस्तेमाल हो सकते हैं उनसे पूरी तरह अप्रभावित रहते हुए अपनी
सारी जिम्मेवारिओं का वह ठीक ठीक निर्वाह कर ले जायेगा. युवा समाजवेत्ता एस.
एम. फैज़ान अहमद जिनका मानना है कि मौजूदा मुहीम, जो सरकार के द्वारा स्थितिओं
का सटीक आंकलन न कर पाने और सरकार की रणनैतिक विफलताओं मसलन नागरिक समाज के
दूसरे तत्वों और मिसाल के तौर पर हर्ष मंदर या अरुणा रॉय की अनदेखी का नतीजा
है, और इसके द्वारा प्रस्तावित जन लोकपाल बिल भ्रस्टाचार से मुक्ति की गारंटी
नहीं हो सकता. अहमद कहते हैं कि बिल के मौजूदा प्रारूप को पास किये जाने की
स्थिति में जनता द्वारा मताधिकार का इस्तेमाल करते हुए संसदीय व्यवस्था के
सञ्चालन हेतु चुने गए उसके अपने प्रतिनिधिओं और भ्रस्टाचार के निवारण के लिए
नियुक्त लोकपाल में सीधे संघर्ष की सम्भावना ज्यादा मजबूत दिखती है. ऐसे किसी
भी संभावित प्रत्यक्ष संघर्ष की स्थिति में अंततः मामला न्याय पालिका में
जायेगा और लम्बे समय के लिए वहां लंबित पड़ा रहेगा यही गुंजाईश ज्यादा है. तो
क्या यह मान लिया जाये कि अन्ना कि मौजूदा मुहीम का कोई भी सकारात्मक पहलु या
योगदान नहीं है और हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के समक्ष यह मुहीम एक वास्तविक
और बड़ा खतरा है?
दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के शोधार्थी और साहित्यकार रोहित यह याद
दिलाते हैं की जिस स्वतः स्फूर्तता से विभिन्न तबकों के लोग भ्रस्टाचार के
विरोध में जारी इस मुहीम में आगे आये हैं और प्रतिरोध का जैसा नमूना हमें इस
मुहीम के ज़रिये से कम से कम दिल्ली में देखने को मिला है वह निश्चित रूप से एक
हद तक सकारात्मक है. खुद प्रधानमंत्री ने भी अन्ना के जज्बे को सलाम किया है और
उनके इस जज्बे की तारीफ सार्वजनिक रूप से की है. इतना ही नहीं कांग्रेस के एक
प्रवक्ता जिन्होंने पहले अन्ना को भ्रस्ट साबित करने का प्रयास करते हुए उन पर
व्यक्तिगत आक्षेप किये थे भी अब अपने कहे पर शर्मिंदा हैं और उन्होंने अपना वो
आपत्तिजनक बयान वापस ले लिया है.

यह तो कोई भी मानेगा की गांधीवाद का अन्ना संस्करण काफी दिलचस्प है और इसकी
अपील टिकाऊ. आज जितनी बड़ी तादाद में लोग गाँधी टोपी का अन्ना संस्करण (मैं
अन्ना हूँ लिखी घोषणा के साथ) और अन्ना के फोटो वाली टी शर्ट पहने घूम रहे हैं
या 'अन्ना नहीं ये गाँधी है' जैसे स्वर अगर फ़िज़ा में नारों के बतौर तैर रहे
हैं तो इसके लिए गाँधी बाबा का करिश्मा भी कोई छोटी वजेह नहीं है. इस करिश्में
को मुम्बईया फिल्मों ने भी समय समय पर  कैश किया है और गाँधी की परंपरा से खुद
को जोड़ कर देखने-दिखाने वालों ने भी. जो लोग मौजूदा मुहीम की मांगों पर सवाल
उठाते हुए अन्ना के गाँधीवादी होने से इंकार कर रहे हैं दरअसल वो इस विशिष्ट
संस्करण को नहीं समझ पाये हैं. वर्ना क्या वजह थी की अहिंसा के हथियार से अपनी
लड़ाई लड़ने वाले महात्मा ने विश्वयुद्ध के दौरान औपनिवेशिक सत्ता का साथ दिया
और युद्ध के पक्ष में सेना में भर्तियाँ भी करवाई , अलग निर्वाचन की बाबा साहेब
अम्बेडकर की मांग के विरोध में उपवास किया और उन्हें झुकने पर मजबूर किया,
आदिवासिओं और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के मुद्दों को  बुलंद करने से परहेज रखा
और नए उभर रहे पूंजीपतियों से नजदीकी रिश्ता भी.  और अंत में  कांग्रेस पार्टी
को अंततोगत्वा भंग करने जैसे अपने लीक से अलग विचारों के साथ गाँधी जी खुद भी
तो ऐतिहासिक नजरिये से कई बार गैर गाँधीवादी लगने वाली मांगों के पक्ष में खड़े
दीखते हैं.

दोस्तों के लिए
कमल मिश्र की ओर से
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