[दीवान]पैसे से नहीं, प्यार से चलता है यह बाजार

Ashish Kumar 'Anshu' ashishkumaranshu at gmail.com
Thu Feb 10 11:24:12 IST 2011


असम में आदिवासियों का एक गांव ऐसा भी है, जहां रुपये-पैसे से कारोबार नहीं
होता। वहां आज भी वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित है। यानी कोई एक सामान लाइए और
उसके बदले दूसरी चीज ले जाइए। सभ्यता के आरंभ में अर्थव्यवस्था इसी सिस्टम पर
आधारित थी। गुवाहाटी से 60 किलोमीटर की दूरी पर बसे जनबिल गांव में हर साल बीहू
के मौके पर तीवा आदिवासी उत्सव मनाया जाता है। एक झील के किनारे दस हजार से भी
अधिक तीवा आदिवासी जमा होते हैं और मिल-जुलकर खुशी और प्यार बांटते हैं। इस
मौके पर लगने वाले आदिवासियों के बाजार में पैसों से कोई कारोबार नहीं होता।
वस्तुएं ही मुद्रा की भूमिका निभाती हैं। जैसे यहां मैदान से आया एक तीवा
आदिवासी पहाड़ से आए दूसरे तीवा आदिवासी को चावल देता है और बदले में उससे सूखे
मेवे या अपने चावल के बराबर मात्रा में कोई पहाड़ी फल पा सकता है। कोई नमक लाता
है तो उसे आलू मिल जाता है।

यह मेला वास्तव में एक समुदाय के दो समाजों का मिलन उत्सव है, जिसमें तीवा
आदिवासियों का पहाड़ पर रहने वाला और मैदान पर रहने वाला समुदाय आपस में मिलता
है और दोनों आपस में उपयोगी सामग्रियों का आदान-प्रदान करते हैं। कहने की जरूरत
नहीं कि वे आपस में सुख-दुख भी बांटते हैं। एक-दूसरे के जीवन को करीब से
देखते-परखते हैं। जब पूर्वोत्तर भारत उड़ूका (बीहू पर्व की पूर्व संध्या) और
बीहू पर्व की तैयारी में व्यस्त होता है, उस समय इसी समाज के तीवा आदिवासी
जनबिल उत्सव के आनंद में मग्न होते हैं। तीन दिनों के जनबिल उत्सव के बाद उडूका
और बीहू मनाया जाता है। तीवा स्वायत्त परिषद (टीएसी) के सीईएम रमाकांत देवड़ी
कहते हैं कि दक्षिण एशिया के अंदर अब लेन-देन की यह परंपरा सिर्फ तीवा
आदिवासियों के बीच बची है। जिसे लेकर हमारे अंदर गर्व है और हम इस परंपरा को
लंबे समय तक जीवित रखना चाहते हैं।

इस उत्सव में पहाड़ से आने वाले आदिवासी अपने साथ आमतौर पर हल्दी, तील, लाहा,
रंगलाऊ, मीठा लाऊ, कुम्हरा, उबले चावल, जंगली आलू, जालाक आदि लेकर आते हैं। इसी
प्रकार मैदानी भाग के लोग अपने साथ रादो, पीठा, लाडू, जलपान, सांडो, सूखे मेवे,
सूखी मछली आदि लाते हैं। कुछ चीजों के नाम अजीब लगते हैं पर ये आदिवासियों के
लिए बेहद उपयोगी हैं। इस मेले में आप गोभा क्षेत्र के 17 वर्षीय तीवा राजा राम
सिंह देव से मिल सकते हैं। संभवत: वह दुनिया के सबसे कम उम्र के जीवित राजा
हैं। इस वक्त तीवा राजा राम सिंह देव दसवीं कक्षा के छात्र हैं। इस मेले की
शुरुआत कैसे हुई, इस सवाल का संतोषजनक जवाब देने वाला आज कोई जीवित नहीं बचा
है।

हो सकता है देश का शिक्षित मध्यवर्ग इस पर नाक - भौं सिकोड़े और इस बात
के लिए आदिवासियों
की खिल्ली उड़ाए कि उन्होंने अभी भी एक सदियों पुरानी परंपरा को गले से लगाए रखा
है। सचाई यह है कि तीवा आदिवासियों के सामने इसका कोई बेहतर विकल्प कभी सामने आया
ही नहीं। अगर उनकी हालत में सुधार की गंभीर कोशिशें की गई होतीं और
उन्हें मुख्यधारा
से जोड़ने की नीतियों पर अमल किया गया होता , तो संभव है उन्हें अपने कारोबार के
लिए अलग रास्ता चुनने की आवश्यकता पड़ती , लेकिन अपनी इस पुरानी परंपरा ने कम से
कम उनके जीवनयापन का एक मार्ग तो सुरक्षित रखा है। आम तौर पर विकास के
नाम पर आदिवासियों
के जीवन और उनकी परंपराओं को तहस - नहस ही किया गया है। एक तरफ तो
जीवनयापन के उनके
तौर - तरीकों को अव्यवस्थित कर दिया गया है दूसरी तरफ उन्हें मॉडर्न डिवेलपमेंट
का लाभ भी नहीं दिलाया जा सका है।

आदिवासी न इधर के रहे हैं न उधर के। तीवा आदिवासियों के बीच रुपये - पैसे का चलन
न होने से वे एक अनावश्यक होड़ से तो बचे हुए हैं। आदिवासियों की हर
परंपरा को संदेह
की नजर से देखने के बजाय उसकी उपयोगिता के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया
जाना जरूरी
है। आधुनिक विकास और उनकी परंपराओं के बीच सामंजस्य बिठाकर आदिवासियों की तरक्की
का रास्ता ढूंढा जाना चा हिए। (Source:-
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7461182.cms)

-- 
आशीष कुमार 'अंशु'
द्वारा: इण्डिया फाउंडेशन फॉर रुरल डेवलपमेंट स्टडिज,
४०६, ४९-५०, रेड रोज बिल्डिंग, नेहरू प्लेस,
नई दिल्ली- ११००१९
चलभाष: 09868419453
ब्लॉग पता: http://www.ashishanshu.blogspot.com/
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