[दीवान]भइया हो,हमको गांव पर लिखना है
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Thu Jul 21 11:54:39 IST 2011
कोशी नदी में लहरों का उफान इतना नहीं है कि वो टेलीविजन की खबर बन जाए,वहां
ऐसी कोई तबाही नहीं हो रही है कि देश के नामचीन टेलीविजन चेहरे रिपोर्टिंग करने
से लेकर कपड़ें बांटने तक चले जाएं। रेणु के मेरीगंज में मलेरिया का ऐसा कोई
प्रकोप नहीं है कि दिल्ली और कोलकाता से डॉक्टरों की टीम रवाना की जाए।
सहरसा,पूर्णिया,दरभंगा का इलाका अतुल्य भारत के हिस्से में नहीं आता कि जहां
जाने की अपील आमिर खान करते नजर आएं। कुल मिलाकर इन इलाकों में ऐसा कुछ भी नहीं
हो रहा जो कि खबर का हिस्सा बने। लेकिन गिरि(गिरीन्द्रनाथ झा) पिछले कई महीनों
से लेकर अब तक दसों बार कह चुका है-भइया हो,हमको इ गांव पर लिखने का मन करता
है। गिरि की इस एक लाइन में गांव के खबरों के कारोबार में पिछड़ जाने का दर्द
है,वो कुछ लिखकर एक तरह से खबरों और मीडिया के धंधे में इन गांवों की
हिस्सेदारी की मांग करता है। इस एक लाईन के आगे वो गांव पर लिखने के पीछे की
तड़प के बारे में जो कुछ भी कहता है,उस पर मैं कई दिनों से कभी भावुक,कभी
अतिसंवेदनशील(आंखों में आंसू झलझला जाने की हद तक) और कई बार तो फ्रस्ट्रेट तक
हो जा रहा हूं कि आखिर मीडिया के लिए गांव इतना अछूत कैसे होता चला गया?
<http://2.bp.blogspot.com/-I09Hl_LlaYw/TifBxgQEutI/AAAAAAAACoc/j06InivZSYQ/s1600/girindra.PNG>
भइया हो,एतना बड़ा देश में एतना सारा गांव लेकिन कहीं कोई खबर नहीं। खबर भी तो
खाली हत्या,लूटपाट, जमीन कब्जा लेने,महामारी फैल जाने,अंधविश्वास के पीछे जान
दे देने की,काहे कोई उल्लास पैदा करनेवाला खबर इस गांव में नहीं घटता है क्या?
यहां का भी तो आदमी मोबाईल खरीदता है,यहां भी बाजा-गाजा सुनता है,सिनेमा देखता
है,मेले-ठेले में कचरी-मूढ़ी खाकर परिवार के साथ आनंदित होता है लेकिन सबके सब
निगेटिव खबर। दूर-देश में बैठा कोई शख्स वापस इस गांव में आना भी चाहे तो इन
खबरों को पढ़कर घिना जाए,उसका मन कसैला हो जाए। पिछले दिनों गिरि ने अपने ब्लॉग
पर एक पोस्ट लिखी और बताया कि भगैत अवधबिहारीजी की आवाज के जादू ने मन मोह लिया
तो उसने उनकी एक तस्वीर लेनी चाही। आपकी कोई तस्वीर नहीं है के जबाब में
अवधबिहारीजी का जबाब था- *अहां क मोबाइल अछि कि, ब्लूटूथवा ऑन करू न। हमर
मोबाइल से अहां क मोबाइल में फोटू पहुंच जाएत यौ। हमर पोता क अबै छै इ
सब...<http://anubhaw.blogspot.com/2011/07/blog-post_15.html>
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गिरि मीडिया में जिस गांव के शामिल किए जाने की मांग कर रहा है वो उसके मासूम
करार देने की कोशिश नहीं है और न ही गांव को लेकर एक ऐसी नास्टॉल्जिक इमेज खड़ी
कर देनी है कि आप शहर में रहने को एक पछतावे का फैसला मानने लग जाएं। गिरि की
बस इतनी भर कोशिश और सवाल है कि आजाद भारत जो कि आजादी के बाद से कृषि प्रधान
लोकतांत्रिक देश की पहचान के साथ आगे बढ़ा, साठ-पैंसठ साल बाद मीडिया के
कारनामे से शीला और मुन्नी प्रधान देश हो गया। इन गांवों और कस्बों से सिर्फ
आइटम सांग ही नकलकर आए,चैता,फगुआ,रागिनी निकलकर नहीं आयी. कृषि प्रधान देश की
संस्कृति या तो इम्पोरियम और एनजीओ की गठजोड़ में शोषण के नए अड्डे बन गए या
फिर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चारागाह जिस पर कि कुछ भी चरने के लिए,लूटने के
लिए छोड़ दिए जाएं। इन सबके बीच से हर गांव के भीतर दिल्ली-मुंबई-कोलकाता का
एक-एक टुकड़ा घुसता चला गया जिसके कि आशीष नंदी ने बड़ी की खूबसूरती और तार्किक
ढंग से शहर के स्तर या छल्ले के तौर पर विश्लेषित किया है। हर गांव की उपलब्धि
उसके शहर हो जाने में देखी जाने लगी और हर गांव अपने भीतर शहर को समेटकर खुश
होता रहा। शहर को पाने की ललक उसकी इतनी प्रबल रही है कि अपने भीतर खोने की सुध
उसे नहीं है। गिरि जब कहता है कि भइया हम गांव पर लिखना चाहते हैं तो दरअसल वो
मीडिया को फिर से कृषि प्रधान गांवों का देश की तरफ लौटने की बात करता है जो कि
अब मीडिया के लिए शीला और मुन्नी प्रधान देश है।
गिरि की इस सोच के पीछे ऐसा बिल्कुल भी नहीं है जो कि मैंने उससे की गई
लंबी-लंबी चैट से महसूस किया कि खिचड़ी गांव एक बार पूरी तरह से पाटकर रेणु और
बाबा नागार्जुन के जमाने के गांव में तब्दील कर दिए जाएं। लेकिन गिरि ही
क्यों,हमें भी जब गांव से गुजरते हुए आज से दस साल पहले हर ट्यूबल पर जहां
खाद,बीज,कीटनाशक के विज्ञापन और हर हाल में उन तस्वीरों में किसान और देहाती
महिलाएं दिखा करती थी,अब सब जगह एयरटेल,रिलांयस,हीरो होंडा और नैनो के विज्ञापन
दिखते हैं और अधकट्टी टॉप पहनी देसी मेम तो क्षोभ तो होता ही है कि ये कैसा
गांव हम बनते देख रहे हैं जहां खेती तो चावल,अरहर,मसूर की होती है लेकिन लोग
जीते-खाते है कुछ और ही चीजों के बीच हैं। आज अगर लाइफस्टाइल ही पत्रकारिता हो
गई है तो फिर गांव के इन लोगों की लाइफस्टाइल मीडिया का हिस्सा क्यों नहीं है?
क्यों हर मोबाइल पर बात करनेवाला डुप्लेक्स में ही रहेगा और हर फोन कॉल के पीछे
पति का इंतजार और गर्लफ्रैंड की नोंक-झोंक की होगी। मोबाईल पर अवधबिहारीजी
क्यों नहीं होंगे और 3जी स्पीड की चर्चा अररिया में एलडीसी के फार्म भरनेवाला
क्यों नहीं करेगा? दरअसल जिस तकनीक और जीवनशैली पर शहर के लोग थै-थै कर रहे हैं
औऱ सरकार जिसे अपनी बड़ी उपलब्धि मान रही है,उससे अगर लोगों के बीच खुशियां
पैदा हुई है तो उसमें गांव के लोग शामिल क्यों नहीं है? कोशी में अभी जरुर कोई
सावन को ध्यान करके हरी चूड़ियां पहन रही होगी,दो साल पहले बाढ़ में अपना पति
खोई बिसुर रही होगी,लखनमा कटहल के कोवे के लिए मचल रहा होगा लेकिन है कोई कोशी
के बारे में कहनेवाला? ये कितनी बड़ी साजिश है कि इन सभी चीजों का बाजार गांवों
में तेजी से पसर रहा है लेकिन उससे जो सांस्कृतिक स्तर के बदलाव हो रहे हैं,वो
मीडिया का हिस्सा नहीं बन पा रहा है। मीडिया में आकर गांव अभी भी या तो दूध-दही
खाकर देह बनाने की जगह है,भक्तिन और देवी के चमत्कार पैदा होने की या फिर शीला
और मुन्नी की जवानी देखकर वॉलीवुड के लिए आइटम सांग बनाने की। गांव की खबरों को
लेकर मीडिया में जो स्वाभाविकता खत्म हुई है और एक स्टिरियो इमेज बनाने की
कोशिशें हुई है,गिरि उससे अलग गांव पर लिखना चाहता है। ठीक वैसे ही कुछ-कुछ
जैसे रेणु ने मैला आंचल में मलेरिया सेंटर खुलने,चीनी मिल के लगने और डॉ
प्रशांत के रेडियो लाने पर लिखा है। गांव में आकर तकनीक,विज्ञान और इस्तेमाल की
जानेवाली चीजें कैसे एक चरित्र के तौर पर शामिल हो जाते हैं और उसका एक मानवीय
पक्ष होता है,वो शायद मेनस्ट्रीम मीडिया का कभी हिस्सा ही नहीं रहा।
टेलीविजन पर की उत्सवधर्मिता गांव में खुश होने और उल्लास पैदा होने के
छोटे-छोटे बहानों को ध्वस्त करके बाजार की ओर धकेलती है जहां पैसे नहीं तो
उत्सव नहीं। गांव पर लिखने का गिरि का कचोटता मन शायद उन बहानों की खोज होगी जो
वस्तु आधारित क्षण भर की खुशियों से कहीं आगे की चीज होगी।..रोते-बिलखते इस
हिन्दुस्तान में ऐसी खुशियों और बहानों की खोज जरुरी है।
अपीलः- गिरि जिस मीडियाहाउस के वेबपोर्टल के लिए काम करते हैं,उसमें शहर के
आगे से सोचना लगभग गुनाह जैसा है लेकिन ये शख्स गांव का मन और शहर की समझ लेकर
दिनभर किटिर-पिटिर करता है,अपनी दीहाड़ी के लिए। इससे इतर भी बहुत कुछ है कहने
और बताने के लिए। मेरी यहां अपनी तरफ से अपील है कि आपलोगों में से किसी को भी
गांव पर लिखने की गुंजाईश दिखती हो,स्पेस बनता दिखाई देता हो तो गिरि से जरुर
संपर्क करें,गांवों को बचाने के लिए सड़कों पर के आंदोलन तो बहुत हुए और होते
रहते हैं,एक बार इस पर लिखने की तड़प रखनेवाले पर भरोसा करके देखिए।.
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