[दीवान]हम नहीं चाहते कि नामवर सिंह वयोवृद्ध कहलाएं

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Fri Jul 29 10:58:54 IST 2011


85साल के हो गये हमारे आलोचक नामवर सिंह। साल-दर-साल जब उनके स्वस्थ और सक्रिय
बने रहने की खबर मिलती रहती है, तो उनके लिए दीर्घायु होने की कामना करने से
कहीं ज्यादा ईर्ष्या होती है। एक तो लगता है कि जिस शख्स के भीतर खुद की जीवटता
है, इलाज के लिए खाते में पर्याप्त धन है और पहले से ही हजारों शुभचिंतक मौजूद
हैं, मेरे कामना करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन ईर्ष्‍या तो होती
ही है। साफ लगता है कि बिना किसी के सहारे के गंभीर कदमों से देशभर के सभागारों
की सीढ़ियों से चढ़ता-उतरता ये आलोचक हम जैसे शब्दों में कारतूस भरकर धज्जी
उड़ाने की नीयत रखनेवाले ब्लॉगरों को खुली चुनौती दे रहे हैं – इन लौंडों का
क्या है, मैगी खाएंगे, कैपचीनो और ब्लैक कॉफी पीएंगे और सालों से मेहनत करके
साहित्य और संस्कृति पर काम करनेवाले को दो मिनट में पिटा हुआ ब्रांड साबित कर
देंगे। इनके मुंह न ही लगें, तो अच्छा। क्या लिखेंगे-पढ़ेंगे, इस पर तो कमेंट
नहीं करुंगा लेकिन देख लीजिएगा पैंतालीस साल के भीतर अपनी अंतड़ी न गला ली,
आंखें न गंवा बैठे, अल्सर न पाल लिया तो मेरा नाम भी नामवर सिंह नहीं।

*मेरी ईर्ष्‍या की तो छोड़ ही दीजिए*, आप उनसे दस-पंद्रह साल कम उम्र के
आलोचकों और साहित्यकारों के बारे में सोचिए न जिनके नाम के आगे वयोवृद्ध शब्द
जोड़ दिया जाता है और वो जब नामवर के आगे कभी भी ये शब्द जुड़ा न देखते होंगे
तो उन पर क्या बीतती होगी? नामवर सिंह हिंदी आलोचना और साहित्य की दुनिया में
अभी भी वयोवृद्ध नहीं हुए और इस तमगे के न लगने पर भी ज्यादा बल्कि सबसे ज्यादा
सम्मान हासिल कर पाये हैं। नहीं तो कई औसत या दोयम दर्जे के साहित्यकारों के
नाम के आगे उम्र से पहले ही वयोवृद्ध या वरिष्ठ शब्द जोड़ने की कवायदें चलती
रहती हैं, जिससे कि पाठक सीनियर सिटीजन की तरह ही लिखे से कहीं ज्यादा अवस्था
को देखकर सम्मान दे दे। नामवर सिंह की हैसियत बिना वयोवृद्ध कहला कर प्रासंगिक
बने रहने की रही है। मेरी मां ऐसे शख्स के लिए टठगर शब्द का इस्तेमाल करती है,
जो कि एक जवान आदमी की तरह सब कुछ खुद से करता है।

*एमए के दौरान हम हिंदी के सेमिनारों में* खूब जाया करते थे लेकिन जैसे-जैसे
साहित्यकारों से थोड़ी-बहुत पहचान बननी शुरू हुई, नजरों का लिहाज पैदा होने
लगा, जाने का उत्साह घटता गया। नामवर सिंह से 10-15 साल कम उम्र के
साहित्यकारों की तरफ इशारा करके हमारे कुछ शिक्षक कहा करते – बेटा, सर को चाय
लाकर दो, किसी को शू-शू-पोट्टी जाना होता तो उन्हें ट्वायलेट तक ले जाना होता।
माफ कीजिएगा, तब मेरे मन में बाकी लोगों की तरह श्रद्धाभाव पैदा होने के बजाय
सवाल पैदा होते – क्या ये नामवर सिंह से ज्यादा उम्रदराज हैं? मुझे लगता है कि
जिस अतिरिक्त सम्मान में पत्रिकाएं और प्रकाशक उनके लिए वयोवृद्ध या वरिष्ठ
शब्द का प्रयोग करते हैं, साहित्यकार उसे पाकर अपनी देह गिरा लेते हैं, दूसरों
पर निर्भर होने लग जाते हैं। नामवर सिंह ने कभी देह नहीं गिरायी। वयोवृद्ध
कहलाकर थोड़ी बहुत सुविधाएं, नजरों का सम्मान तो जरूर मिल जाता है लेकिन भीतर
जो बूढ़े हो जाने की ग्रंथि जन्म ले लेती है, वो उन्हें बहुत सक्रिय बने रहने
से रोकती है। वो शरीर के पहले मन और विचार से बूढ़े हो जाते हैं।
विश्वविद्यालयों की खदानों से निकले साहित्यकार इसके ज्यादा शिकार होते हैं।
विभागाध्यक्ष बने रहे, विभाग में रहे तो एकदम से टनाटन लेकिन जैसे ही बाहर या
रिटायर हुए, अचानक से बूढ़े हो गये। अब अगर वो किसी सभा-संगोष्ठी मे जाएं तो
उनके चेले-चमचों के लिए अलग से एक काम ही हो जाता है कि उन्हें सुरक्षित लाना
और ले जाना है। ऐसे में जो रिटायर होने के बाद पूरी तरह श्रीहीन (जिन्हें न तो
किसी पैनल में रखा जाता है और न कहीं निर्णायक कमेटी में होते हैं), उनका
चेले-चपाटी भी साथ छोड़ देते हैं। नामवर सिंह से विश्वविद्यालय के खदानों से
निकले साहित्यकारों को सीखना चाहिए कि रिटायर होने के बावजूद भी कैसे टठगर और
प्रासंगिक बना रहा जा सकता है? प्रासंगिक का मतलब अगर दरवाजों का सत्ता और ताकत
की तरफ खुलना है इस शर्त पर भी।

*रही बात हम जैसे लैपटॉप में आंखें धंसाये रखने और* दसों उंगलियों को कीबोर्ड
पर पसारकर हिंदी में गिटिर-पिटिर करनेवालों की, तो कभी नहीं चाहेंगे कि नामवर
सिंह जितनी उम्र मिले। हमें नये माध्यमों पर लिखते हुए इस बात का आभास हो गया
है कि कालजयी होने और कहलाने का दौर पूरी तरह खत्म हो चुका है। नामवर सिंह के
बाद हिंदी में शायद ही आगे कोई हिंदी आलोचक होगा, जिसे कि इस रूप में कालजयी की
कैटेगरी में शामिल किया जाएगा। इसकी एक वजह ये भी है कि हमें नामवर सिंह की तरह
पीढ़ी-दर-पीढ़ी सम्मान, सहमति जो कि आगे चलकर चाटुकारिता और चमचई में तब्दील हो
जाती है… नहीं मिलने जा रही है। चीजें इतनी तेजी से बदल रही हैं और हर हिंदी
टाइप करनेवाले के दिमाग में विचार इतनी तेजी से कौंधते हैं कि वो नामवर सिंह की
तरह हम जैसों से लंबे समय तक सहमत हो ही नहीं सकता। वो साल-दो साल तो छोड़िए,
महीने भर में असहमति और ज्यादा तीक्ष्ण विचार साझा करेगा। पाठक और आलोचक की
सत्ता में जो घालमेल हुआ है, उससे कालजयी होने के दावे ध्वस्त हुए हैं और आगे
भी होंगे इसलिए नामवर सिंह को सिर्फ इस बिना पर कालजयी या शिखर आलोचक माना जाता
रहा कि उन्होंने सचमुच बेहतरीन काम किया है, इस बात से हम जैसे लोग शायद ही
सहमत हो पाएं। हम उनके काम का सम्मान करते हुए भी स्वीकृति और कालजयी होने के
सवाल पर कुछ इस तरह से सोचते हैं कि अगर हिंदी में पाठक की सत्ता आज की तरह दस
साल पहले लोकतांत्रिक हो गयी होती तो नामवर सिंह के प्रासंगिक बने रहने की उम्र
घट जाती। आज ये बिल्कुल भी संभव नहीं है कि कोई बीस-पच्चीस साल बिना कुछ लिखे,
सिर्फ बोलने के दम पर अकादमिक और साहित्यिक दुनिया में प्रासंगिक बना रह जाए।
पाठक उसे बहुत जल्द ही निकाल-बाहर कर देगा। दूसरी बात

*आज ये भी संभव नहीं है कि* कोई लेखक या आलोचक सामयिक संदर्भों से किनाराकशी
करते हुए,जाति जनगणना के मसले पर विचारधारा से ठीक विपरीत बयान दे और दूसरे
मसले पर बात करता चला जाए और उसकी स्वीकार्यता बनी रह जाएगी। न्यू मीडिया के
लोग कम और सतही समझ रखते हुए भी, वेब पर साहित्य के सक्रिय पाठक उससे लगातार
सवाल करेगा कि सालों से प्रेम कविताओं और साहित्य पर लिखनेवाले आलोचक प्रेम को
लेकर खाप पंचायत के फैसले पर आपकी क्या राय है, छिनाल लिखने-छापनेवाले सालभर से
अब भी उसी ठसक से बने हुए हैं, आप उस पर क्या कहना चाहेंगे? नामवर सिंह के साथ
सुविधा ये रही कि वो हिंदी के श्रद्धावान पाठकों के दौर में सक्रिय हुए और
पहचान बनायी, सवालों की झड़ी लगा देनेवाली पीढ़ी के बीच नहीं। अगर ऐसा होता तो
शायद हम नामवर सिंह को इस रूप में थोड़े नास्टॉल्जिक, थोड़े भावुक और थोड़े
तल्ख होकर आगे बने रहने की कामना नहीं करते। हम भावनाओं के मिक्सचर में फंसने
के बजाय सीधा कोई एक स्टैंड लेते। न्यू मीडिया की हमारी ये पहली और आखिरी पीढ़ी
है जो कि सालों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी के सम्मान को सिरे से खारिज न करते हुए, कुछ
सवाल-जवाब कर रही है, आगे शायद ऐसी पीढ़ी होगी जो बिना संदर्भों के गूगल लिंक
के आधार पर इन आलोचकों के प्रति एकतरफा राय बनाए।

*इन सबके बीच नामवर सि्ह और* हमारी पीढ़ी के लिए अच्छी बात है कि उनसे असहमत
होते हुए, उन पर गुस्सा, खीज और नाराजगी जाहिर करते हुए भी उनसे मोह नहीं छोड़
पाते। बीच में बाबा ने जब हिंदी साहित्य की दुनिया में प्रवचन काल को प्रहसन
काल में बदलने की कोशिश की, गंभीर से गंभीर मसले पर मीडिया बाइट देने लग गये तो
सुनना बंद कर दिया। लेकिन पिछले दिनों पुरुषोत्तम अग्रवाल की कबीर पर लिखी
किताब पर बोला तो एक बार फिर से मन जुड़ गया। हंस की 31 जुलाई की गोष्ठी में भी
हम उसी असर को याद करके जाएंगे। आज भी उनकी किताबों को कभी निकाल कर पढ़ता हूं
तो साहित्य से खाद-पानी खींचकर बढ़ा हुआ मेरा मन फिर से साहित्य की ही तरफ
लौटने को करता है। ये भी हमदोनों के लिए अच्छा है कि उन पर खीज होते हुए भी,
असहमत होते हुए भी भीतर से एक वयोवृद्ध साहित्यकार के प्रति अवस्था के आधार पर
सम्मान देने का भाव नहीं जगता। जिस दिन ये भाव जग गया, मेरे लिए नामवर उसी दिन
से बुजुर्ग, वयोवृद्ध हो जाएंगे और डर है कि अप्रासंगिक भी। तब ऐसे अप्रासंगिक
हो चले आलोचक पर क्या बात करना। हम अपने आलोचक को ऐसी हालत में नहीं देखना
चाहते।
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