[दीवान]सावन में अनधरैले पर सगरों हरियरी देखाला !!
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Fri Jul 29 11:52:00 IST 2011
दोस्तों, सावन की फुहारों ने दिल्ली का दिल तर कर दिया है I वैसे तो सावन की
बरसात ने हमेशा से प्रेमियों, भक्तों, सूफीओं, कवियों और बिरहिओं को झकझोरा और
बौराने पर मजबूर किया है... और विविधरूपी हिंदी साहित्यक परम्परों की बानगी से
शुरू कर रुपहले परदे तक इस उत्पाती सावन की एकाधिक धुनें सुनी जा सकती हैंI
लेकिन इस बार दिल्ली का सावन कुछ और ही ठसक के साथ आया मालूम होता है I क्यों
? अरे भाई इसमें उदारीकरण के यौवन का उन्माद जो शामिल है! और शामिल है दिल्ली
को नयी दुल्हन की तरह सरापा सजाने और इसकी खूबसूरती पर इठलाने का सत्तामूलक
विमर्श I
मुमकिन है आप पूछें कि मियां जब मनमोहन और शीला जी "सावन को आने दो!!" का राग
पंचम सुर में छेडें हैं और सारा ज़माना "सावन में लग गयी आग" के बैंड पर थिरक
रहा है तो आप क्यों "मेरे नैना सावन भादो" का आउटडेटेड रिकॉर्ड पेले पड़े हैं?
तो आप को बता दूं कि इस सावन की आग से निकली चिंगारी ने अभी कल ही शहर के कुछ
मजलूम दलितों के घरों को निगल लिया है, और आप को अगर सावन का मेरा यह 'पाठ'
मर्सिया जैसा लगे तो ना खौफ़जदा होइए और शिकवा भी मत कीजिये....
तफसील ए वाकया ये है कि कल दिन के ग्यारह बजे करोल बाग़ मेट्रो स्टेशन से लगे
हुए चाइना बाज़ार के पास पहले से बिना कोई नोटिस - इत्तला के एम. सी. डी. ने
पोलिस पलटन के साथ धावा बोल कर उन १५ दलित परिवारों को बेघर कर दिया जो १९४० के
दशक से वहीँ मुकाम किये और रहते आ रहे थे. जुल्म की इन्तेहा ये कि जिन ८०
लोगों के घर "गैर कानूनी" कह कर मटियामेट कर दिए गए उनके पास अपनी सालों
साल कीरिहाइश साबित करते सनद मसलन जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र, राशन
कार्ड, पानी और बिजली
बिल तो हैं ही साथ ही साथ ऊँची अदालत में उनके मामले की सुनवाई भी जारी है और
दरअसल आज ही उनके मामले में सुनवाई की तारीख है.
अब हुजूर एम सी डी के आला अधिकारिओं की कार्य परायणता पर भला किसे सुबहा
है?लेकिन जिस असाधारण
तत्परता से क़ानूनी प्रक्रिया को ताख पर रख कर और विकास आधारित बेदखली के मामलों
में अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों विशेष कर यू. एन. जैसी संस्थाओं के स्पष्ट दिशा
निर्देशों की अनदेखी करते हुए २६८ वर्ग यार्ड की जमीन "कब्जे" में लिए
"अतिक्रमणकारिओं" को इस उन्मादी सावन की फुहारों में भिगो देने के मकसद से उनके
घरों पर बुलडोजर चढ़ा दिया गया उस पर आप क्या कहेंगे?? न तो इन दलित परिवार की
महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों का ख्याल किया गया और न ही उनको उजाडने से पहले
उन्हें कोई वैकल्पिक या तात्कालिक व्यवस्था प्रदान की गयीI मैं मानता हूँ कि
मानवाधिकारों की खाट खडी करने का हमारे मुल्क और शहर में यह कोई इकलौता या
पहला मामला नहीं है (!) लेकिन परेशानी की एक वजह और भी हैI *नेशनल कैम्पेन ऑन
दलित ह्युमन राइट्स* से जुड़े कार्य कर्ताओं की बात पर अगर गौर करें तो इस मामले
का एक दूसरा पहलु भी सामने आता है... बाल्मीकि बिरादरी के जिन घरों को उजाड़ा
गया है उनकी रिहाइश से इस परिवेश के उच्च भ्रू और उच्च जातीय पडोसिओं को खासी
तकलीफ बताई जाती है I
एक संवेदनशील नागरिक इस मंजर को देख कर "आग लगा दो सावन को (!)" जैसा
जुमलाभले ही
न कहे लेकिन हम तो इस हाल ए तस्वीर- जो एक बाजारोन्मुखी और गैर जवाबदेह मीडिया
के जरिये आज चारसूं नुमायाँ है- देख यही कहेंगे कि *सावन में अनधरैले पर सगरों
हरियरी देखाला* !!
दीवान के दोस्तों के लिए कमल मिश्रा की ओर से
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