[दीवान]कश्मीर मसले पर दिलीप पडगांवकर से बातचीत
brajesh kumar jha
jha.brajeshkumar at gmail.com
Fri Nov 4 13:21:54 IST 2011
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> *हम-आप जानते हैं कि कश्मीर मसले पर पहले भी भारत सरकार ने कई वार्ताकार
> नियुक्त किए, लेकिन यह पहली समिति है, जिसने बीते 11 महीने में राज्य के सभी
> जिलों के हर समुदायों के प्रतिनिधियों से मिलकर उनकी समस्याओं को समझने में
> लगाया। इसने 12 बार राज्य का गहन दौरा किया। हर बार एक रिपोर्ट अपने अनुभव के
> आधार पर गृह मंत्रालय को सौंपी। उन दिनों खासकर कुछ अंग्रेजी अखबारों ने उसके
> बारे में खबरें इस तरह छापीं जिससे लगा कि उनके पास रिपोर्ट की कॉपी हो।
> वार्ताकारों के मुताबिक उन खबरों में कोई सच्चाई नहीं होती थी।
> **अब 13वीं और आखिरी रिपोर्ट गृह मंत्री पी.चिदंबरम को वार्ताकारों ने सौंप
> दी है, तब समिति के अध्यक्ष दिलीप पडगांवकर ने प्रथम प्रवक्ता से खुली
> बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने रिपोर्ट के वे अंश बताए जिससे उसके बारे
> में एक परिप्रेक्ष्य सामने आता है। हम नीचे बातचीत का एक भाग दे रहे हैं*-
*सवाल- वार्ताकार की समिति क्यों बनी** ?*
जवाब- 2010 में कश्मीर के हालात काफी बिगड़ गए थे। उसी वर्ष गर्मी के मौसम में
पत्थरबाजी पर सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई में करीब 120 बच्चे मारे गए थे।
इसके बाद दिन-प्रति-दिन स्थितियां बिगड़ती गईं। सितंबर, 2010 में सभी
पार्टियों का एक प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर गया। वहां उसने सभी लोगों से
बातचीत की, जिसमें अलगाववादी नेता भी शामिल थे। दिल्ली लौटकर प्रतिनिधिमंडल ने
सरकार को एक रिपोर्ट दी, जिसमें कई सुझाव भी दिए गए। उस रिपोर्ट में एक सुझाव
यह भी था कि भारत सरकार को एक ऐसी समिति बनानी चाहिए जो जम्मू-कश्मीर जाकर सभी
क्षेत्र और वर्ग के लोगों से मिले। और फिर यह रिपोर्ट दे कि आखिर वे लोग क्या
चाहते हैं। इसके बाद 13 अक्टूबर, 2010 को सरकार ने तीन सदस्यों की एक समिति
बनाई।
*सवाल-** **जब आप यह जिम्मेदारी ले रहे थे तो क्या उस समय आपके मन में कोई
हिचक थी**?*
जवाब- हम तीनों में दो लोगों का कश्मीर से पुराना ताल्लुक रहा है। राधा कुमार
पिछले 15-16 सालों से कश्मीर मामले पर काम कर रही हैं। वह कई बार वहां जा चुकी
हैं। स्थानीय लोग उन्हें निजी तौर पर जानते हैं। और मैं कश्मीर मसले पर 2002
में राम जेठमलानी की अध्यक्षता में बनी समिति का सदस्य था। तब हमलोग श्रीनगर,
जम्मू और दिल्ली में कई लोगों से मिले थे। इसके अलावा हम दो लोगों की कश्मीर
मामले में गहरी रुचि भी रही है। पर हां, जब समिति बनी तो मन में एक तरह का शक
था। वह यह कि पिछले 63 सालों में कई बड़े अनुभवी लोगों ने इस मसले को हल करने
की कोशिश की है। इसके बावजूद वे सफल नहीं हो सके। ऐसे में हम आगे कैसे बढ़े और
इस पेंचीदे सवालों का कैसे सामना करें, यह बात मन में जरूर थी। लेकिन, दो दौरे
के बाद हमें कई चीजें महसूस हुईं। और फिर उसी के आधार पर हमलोग आगे बढ़े।
*सवाल- यह धारणा बनी है कि संवैधानिक व्यवस्था के अंदर ही सार्थक स्वायत्तता
की सिफारिश आप लोगों ने की है**?*
जवाब- नहीं, ऐसी कोई सिफारिश नहीं की है।
*सवाल- कश्मीर में काफी विविधताएं हैं। देश में लोगों को इसकी जानकारी काफी कम
है। वे समझते हैं कि जम्मू कश्मीर एक मुस्लिम बहुल राज्य है। पर ये विविधताएं
भी संरक्षित हों और लोगों की राजनीतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाएं भी पूरी हों,
इसके लिए आपने रिपोर्ट में क्या रुख अपनाया है**?*
*
*
जवाब- पिछले 60 सालों से हम लगातार एक ही गलती करते आ रहे हैं और वह यह कि
हमने पूरे जम्मू कश्मीर के मसले को सिर्फ और सिर्फ कश्मीर घाटी की आंखों से
देखा है। मैं यह मानता हूं कि घाटी में सबसे ज्यादा हिंसाएं हुईं। वहां काफी
लोग मारे गए, लेकिन यह भी सच है कि गुलाम नबी *आजाद* को छोड़ राज्य के सभी
मुख्यमंत्री घाटी से रहे। अलगाववादी संगठनों का घाटी से ही रिश्ता रहा। इसलिए
मीडिया और अन्य लोगों का ध्यान कश्मीर घाटी पर ही केंद्रित रहा। इससे लद्दाख
और जम्मू क्षेत्र लगातार उपेक्षित होता गया। ऐसे में जब हम विविधता की बात
करते हैं तो वह अनेक प्रकार की है। एक तो भाषाई है। राज्य में कम से कम आठ
भाषाएं व बोलियां बोली जाती हैं। सांस्कृतिक विविधताएं वहां आपको काफी
दिखेंगी। एक महत्वपूर्ण बात और है। यह बात जो कही जाती है कि जम्मू कश्मीर एक
मुस्लिम बहुल राज्य है, एक नजर में तो यह सही है पर इसका मतलब यह नहीं कि इनके
बीच फर्क नहीं है। पहला फर्क तो यही है कि सिया-सुन्नी दोनों यहां रहते हैं।
राज्य में जो सुन्नी मुसलमान नियंत्रण रेखा (एलओसी) के नजदीक रहते हैं वे
फकरवाल, गुर्जर, पहाड़ी आदि हैं। वे लोग अपनी भाषा-संस्कृति में कश्मीर घाटी
से पूरी तरह अलग हैं। यहां डोगरा लोग हैं। इनका सम्पन्न साहित्य है। संस्कृति
काफी समृद्ध है। और इनमें हिन्दू-मुसलमान का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि ये
दोनों डोगरा हैं और स्वयं को राजपूत कहते हैं। साथ ही इसपर गर्व करते हैं। यह
जानकारी देश के लोगों को नहीं है। बाहर के लोगों की तो बात ही छोड़ दें। रिपोर्ट
में हमने इस बात को इसलिए प्रमुखता से उठाया है, क्योंकि मैं मानता हूं कि
प्रत्येक समुदाय को यह हक मिलना चाहिए कि वह अपनी सांस्कृतिक विरासत को जिंदा
रख सके।
*सवाल- तो क्या कश्मीरियत इनको जोड़ती है**?*
जवाब- हां, हमने कश्मीरियत पर भी काफी ध्यान दिया है। एक जमाने में इसका बड़ा
मतलब था। और वह यह था कि अगल-अलग धर्म को मानने वाले इकट्ठा रह सकते हैं।
विभिन्न संस्कृतियों में जीने-रहने वाले समुदाय एक साथ रह सकते हैं। पर मैं
समझता हूं कि कश्मीरियत का यह स्वरूप अब काफी कम हो गया है। वह कुछेक
क्षेत्रों में सीमित होकर रह गया है। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि कश्मीर वादी का
जो इस्लाम था जिसे हम सूफी इस्लाम कहते हैं, वह पिछले बीसेक सालों में
प्रतिक्रियावादी हो गया है। वहाबी और सलाफियों की संख्या काफी बढ़ गई है। इससे
वादी का जो सूफियाना रंग था वह धीरे-धीरे धुल गया। अत: मैं अब यह नहीं समझता
कि किसी भी राजनीतिक समाधान के लिए
कश्मीरियत कोई आधार बन सकता है।
*सवाल- उन समूहों से बात क्यों नहीं की जो अलगाववादी माने जाते हैं।***
जवाब- मैंने जम्मू कश्मीर के अपने पहले दौरे में ही कहा था कि हमलोग
अलगाववादियों से मिलना चाहेंगे। उनसे बातचीत करना चाहेंगे। वे हमें बताएं कि
कब और कहां मिलना है। किन शर्तों पर मिलना है आदि-आदि। पर उन्होंने कोई जवाब
नहीं दिया।
*सवाल-इस रिपोर्ट में समस्याओं के हल हैं या आप लोग जिन लोगों से मिले उनकी
भावनाओं का प्रकटीकरण है**?*
जवाब-रिपोर्ट से सभी अध्यायों में वहां की परिस्थिति का विश्लेषण है। फिर कहा
है कि वहां के लोग क्या-क्या चाहते हैं। इसमें बात हमने अपने सुझाव दिए हैं।
मैं पत्रकार हूं इसलिए कहता हूं कि उसमें एक हिस्सा रिपोर्टिंग का है, जबकि
दूसरा विश्लेषण का।
*सवाल-रिपोर्ट में कितने अध्याय हैं**?*
जवाब- कुल छह अध्याय हैं। छह एनेक्सचर हैं। रिपोर्ट पूरी तरह कसी(कॉम्पैक्ट)
हुई है।
*सवाल- यह धारणा बनी है कि आपने तीन रिजनल काउंसिल की बात की है। ***
जवाब- रिजनल काउंसिल की बात हमने नहीं उठाई है। 1950 से ही इसपर चर्चा होती
रही है। शेख अब्दुल्ला साहब ने पहली बार जवाहरलाल नेहरू के सामने इस बारे में
कुछ कहा था। इस मुद्दे पर सबसे गहरा काम बलराज पूरी ने किया है। हम जम्मू में
उनसे कई बार मिल चुके हैं और मैं इतना कह सकता हूं कि उनका हमारी रिपोर्ट पर
गहरा प्रभाव है।
*सवाल- इस रिपोर्ट को थोड़े से शब्दों में आप कैसे समझाएंगे**?*
जवाब- मैं यह कहूंगा कि जम्मू कश्मीर का मसला बहुत कठिन है। इसे हल करने के
लिए इज्जत, इंसाफ और इंसानियत के आधार पर आगे बढ़कर हम कोई योजना बना सकते
हैं।
*सवाल-आपने एक बार कहा था कि हमारी रिपोर्ट से कोई खुश नहीं होगा। अब जब आपने
रिपोर्ट सौंप दी है तो गृह मंत्री की क्या प्रतिक्रिया है**?*
जवाब- नहीं, मैंने यह कभी भी नहीं कहा। मैंने सिर्फ इतना कहा कि रिपोर्ट को
लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए।
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