[दीवान]मीडिया को खरीदने के बाद अब स्‍वतंत्र आवाजों पर हमले!

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Mon Sep 19 11:50:55 IST 2011


मुख्‍यधारा मीडिया और बिहार की सत्‍ता : अब फेसबुक पर भी नहीं लिख सकते

*♦ विनीत कुमार*

*कृपया इस पोस्ट को न केवल बिहार सरकार और मीडिया के एक दूसरे की मुखापेक्षी या
हमशक्ल होने की बात समझने के तौर पर पढ़ा जाए बल्कि इसे मुसाफिर बैठा और अरुण
नारायण के निलंबन के प्रतिरोध में उठनेवाली आवाज का हिस्सा मानकर पढ़ा जाए :
लेखक*


*मुसाफिर बैठा*


*अरुण नारायण*

फेसबुक पर नीतीश सरकार के कामकाज के रवैये पर असहमति जाहिर करने के क्रम में
मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण का निलंबन दरअसल मुख्यधारा मीडिया के घिनौने चेहरे
के बेनकाब हो जाने की घटना है। सरकार की बर्बरता का प्रतिरोध करने की स्थिति
में लेखक/पत्रकारों के साथ बिहार में क्या किया जा सकता है या किया जाता रहा
है, ये सब कुछ अलग से बताने की जरूरत नहीं है। पहली प्रतिक्रिया में ही हम
नीतीश सरकार की जमकर आलोचना और इस कार्रवाई की भर्त्सना करें, ये भी जरूरी है।
लेकिन ऐसा करते हुए ये भी जरूरी है कि वहां काम कर रहे मुख्यधारा के मीडिया,
जिसमें अखबार और समाचार चैनल दोनों शामिल हैं, उन्हें भी बराबर का दोषी माना
जाए। उन्हें इस बात के लिए चाहे जितना भी लताड़ा जाए वो कम है कि उन्होंने
सरकारी विज्ञापनों के आगे बिछ जाने की बेशर्मी में मीडिया के प्रतिपक्ष होने के
स्वर को खत्म कर दिया। नीतीश के दौर के बिहार का इतिहास जब भी लिखा जाएगा,
उसमें मीडिया का चेहरा इतना विद्रूप और घिनौना होगा, इसका अंदाजा हम अभी से ही
लगा पा रहे हैं। मुख्यधारा मीडिया ने ऐसा करके तत्काल कुछ सालों के लिए अपनी
जेबें तो जरूर भर ली लेकिन पत्रकारिता की जमीन और जमीर को बहुत लंबे समय तक
खत्म कर दिया। नीतीश सरकार के विकास के नगाड़े पीटकर मीडिया ने अपने भीतर जिस
अविश्वास और बिकाऊ मानसिकता का विस्तार किया है, उसे पाटने में बहुत लंबा वक्त
लगेगा। आज अगर मुख्यधारा मीडिया की जमीर थोड़ी भी बची होती और नीतीश सरकार के
भीतर का खौफ होता कि सबके सब मीडिया हमारे हाथों बिक कर कठपुतली नहीं हो जाएंगे
तो यकीन मानिए मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण पर हाथ डालने के पहले बिहार विधान
परिषद के सभापति और बीजेपी के नेता ताराकांत झा दो-चार बार जरूर विचार करते और
वो भी तब जबकि नीतीश कुमार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के पक्ष में
ढोल-नगाड़े पीटकर सत्ता तक पहुंचे हैं।

*बिहार में मुख्यधारा मीडिया का चरित्र* सिर्फ विज्ञापनों के लालच से ही बदला
है, ऐसा कहना दरअसल पूरे मामले को सरलीकृत करके देखना होगा। प्रमोद रंजन ने
करीब दो साल पहले बिहार मीडिया को लेकर मीडिया में हिस्सेदारी के तहत शोध किया
था, उसे इस विज्ञापन के कारण बदले चरित्र के साथ जोड़कर देखना बहुत जरूरी है।
प्रमोद रंजन का शोध बड़ी ही गंभीरता से ये प्रस्तावित करता है कि अखबारों के
भीतर पत्रकारों और मीडिया के भीतर काम करनेवाले लोगों के भीतर की जातिगत संरचना
कैसी है? किस जाति के लोग मुख्यधारा मीडिया पर काबिज हैं और किसके पक्ष में
माहौल बनाने का काम करते हैं? अगर मुख्यधारा मीडिया में इसके साफ-साफ संकेत
मिलते हैं (कई मौके पर स्वयं मुसाफिर बैठा और प्रमोद रंजन ने इसकी शिनाख्त की
है) तो मामला विज्ञापन के प्रभाव से कहीं अधिक संश्लिष्ट है। संभव है कि कल
नीतीश की सरकार पलट जाती है और आनेवाली सरकार नीतीश के कार्यकाल का मूल्यांकन
करती है तो मीडिया उनके साथ हो ले और गड़बड़ियों को सामने लाये। यानी एक तरह से
जिसकी सत्ता, उसका मीडिया जैसा फार्मूला बने लेकिन जातिगत प्रभाव में आकर जो
मीडिया लगातार काम कर रहा है, उसका क्या? दूसरी बात कि इस प्रभाव में सीधे तौर
पर धन या लाभ का मामला भी नहीं है। ये वो मामला है, जिसकी जड़ें आनेवाले पता
नहीं कितने सालों तक दुराग्रह बनाने के काम आती रहेंगी? मुसाफिर बैठा और अरुण
नारायण के निलंबन का मामला कहीं इसी मीडिया संरचना के भीतर से होकर तो नहीं
गुजरता? अगर ऐसा है, जिसकी कि पूरी पूरी गुंजाइश हो सकती है, तो फिर यकीन
मानिए, बिहार में मीडिया की जकड़बंदी विज्ञापन के प्रभाव से मुक्त हो जाने की
स्थिति में भी खत्म नहीं हो सकती।

*इधर तत्काल की वस्तुस्थिति पर* गौर करें तो नीतीश सरकार में इस स्तर का
बेहयापन है और बिहार से छपनेवाले अखबारों में आला दर्जे की बेशर्मी कि अगर
मामले ने कहीं ज्यादा तूल पकड़ लिया तो सरकार इन अखबारों में दोनों के खिलाफ
इश्तिहार छपवाएगी और ये करार देगी कि दोनों शख्स बिहार के विकास में न केवल
बाधक हैं बल्कि सरकार का विरोध के बहाने बिहार की गौरवपूर्ण संस्कृति को कलंकित
करने की इन्‍होंने कोशिश की है। लोगों को जज्बाती होने में शायद बहुत वक्त भी न
लगे क्योंकि इस चुनाव में हमने अपनी आंखों से देखा है कि टेलीविजन पर न दिखाने
की कोशिश में भी गड्ढे दिख जा रहे थे जबकि स्क्रीन पर बिहार के विकास का गान
करते हुए स्लग आ रहे थे। मेनस्ट्रीम मीडिया की बेशर्मी इस स्तर तक की रही है कि
बिहार चुनाव से पहले एनडीटीवी इंडिया जैसे चैनल ने नीतीश कुमार को बेहतरीन
मुख्यमंत्री होने का खिताब दिया। मीडिया नेताओं को बेहतरीन और सर्वश्रेष्ठ होने
का जो सम्मान देता है, इस पर कभी किसी ने सवाल नहीं किया। जिस एनडीटीवी ने
नीतीश कुमार को बेहतरीन करार दिया क्या तकनीकी रूप से उसे आगे निरंकुश,
लोकतंत्र विरोधी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ निर्णय देनेवाला करार दे
सकता है? यही हाल हिंदुस्तान और दैनिक जागरण जैसे अखबारों का है, जो कि उनके
कार्यकाल में बिहार की विकास गाथा की कहानी पूरे-पूरे पन्ने में छापते आये हैं।
अपनी साख बचाने के लिए अगर एकाध बार कुछ विरोध में छाप भी दिया तो वो रोज की
चारण खबरों और विज्ञापनों के आगे कौन सा प्रभाव पैदा करेगा?

*सवाल है कि जिस मीडिया में* शीर्ष से ही ये फरमान जारी कर दिया जाता है कि
सरकार के खिलाफ कोई बात नहीं करनी है, ऐसे में व्यक्तिगत स्तर पर उन मीडिया
संस्थानों के जागरूक पत्रकारों के लिए भी विकल्प कहां बचते हैं – या तो वो
खबरें छापें / दिखाएं और अपने संस्थान और सरकार का कोपभाजन बनें या फिर इस खेल
में मालिक का खुलकर साथ दें और धीरे-धीरे वे भी मेहरबानी की कमाई के रास्ते पर
चल निकलें। और वैसे भी मुख्यधारा के मीडिया ने बेईमानी और दलाली का जो माहौल
पैदा किया है, उसमें पत्रकारों की व्यक्तिगत स्तर की ईमानदारी का कोई न तो
महत्व है और न ही वो संस्थान में रहकर जिंदा रहने की हालत तक रह पाती है, हां
कुछ अपवाद बचे रह जाएं तो अलग बात है। मीडिया मालिकों ने पत्रकारों से उनकी
कितनी बड़ी ताकत छीन ली है, इसका अंदाजा हम अरुण नारायण और मुसाफिर बैठा के
निलंबन के संबंध में समझ सकते हैं।

*दिल्ली में जिन अखबारों को* मैं पढ़ता हूं, बिहार और दूसरे राज्यों में जाते
ही उसकी जुबान बदल जाती है। कई बार तो दिल्ली संस्करण जिस बात का समर्थन करता
है, राज्य के संस्करण उससे न केवल अलग राय रखते हैं बल्कि बुनियादी अधिकारों के
लगभग विरोध में चले जाते हैं। बाबाओं के प्रवचन की खबरें, दुकान/शोरूम के
उद्घाटन से लेकर हल्के-फुल्के मनोरंजन के नाम पर शैक्षणिक संस्थानों में
होनेवाले कार्यक्रमों से अखबार के पन्ने दर पन्ने भरे रहते हैं, जिसका कि
जनसरोकार से कोई मतलब भले ही न हो लेकिन इन खबरों की प्रकृति को देखकर ही आप
अंदाजा लगा लेंगे कि इनके बीच से या ता विज्ञापन पाने की संभावना दी जा रही है
या फिर ये संस्थान या बाबा की समिति पहले से ही विज्ञापन देती आ रही है। बाकी
जो भी अपराध और जुर्म की घटनाएं छपती हैं, वो प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए
नहीं बल्कि प्रकाश झा जैसे फिल्म निर्माताओं को गंगाजल और अपहरण जैसी फिल्में
बनाने और आकर्षित करने के लिए। ऐसे में मीडिया पूरी तरह से बिकाऊ कोतवाली बनकर
रह गया है, जिसमें कि उसी की सुनी जाती है जो उसके आगे थैली फेंक सकता है।
मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण के पक्ष में दिलीप मंडल ने फेसबुक में जो नोट
लगाया है उसमें इस बात का विस्तार से जिक्र है कि नीतीश कुमार ने साल 2010-11
में विज्ञापन के जरिये *छवि निर्माण में किन-किन अखबारों और चैनलों को कितने
लाख के विज्ञापन
दिए*<http://www.facebook.com/notes/dilip-mandal/%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A5%87-700-%E0%A4%B2%E0%A4%82%E0%A4%AC%E0%A4%BE-%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%B8%E0%A5%87/240164016030151>
और
मीडिया ने लाभ कमाया। आंकड़े साफतौर पर बताते हैं कि नीतीश कुमार और उनकी सरकार
ने विकास की डुगडुगी बजाने के लिए मीडिया का जितना पेट भरा, उसका आधा भी अगर
सचमुच विकास के काम में लगाती तो दो काम होता – एक तो साधनों और सुविधाओं की
पहुंच सचमुच उस जनता तक पहुंच पाती, जिन्हें इसकी जरूरत है और दूसरा कि बेशर्म
मेनस्ट्रीम मीडिया की खाल पहले से और मोटी होने से बच जाती। इन आंकड़ों के साथ
अगर गौर करें तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि बिहार चुनाव के दौरान कितने छुटभइये
चैनलों ने बिहार में अलग संस्करण लाने की कोशिश की, राजस्व के लिए अपने
मीडियाकर्मियों पर दबाव बनाया और वो ये सब किससे हासिल करना चाह रहे थे? आज अगर
बिहार में नीतीश कुमार और ताराकांत झा जैसे उनके अनुचर अभिव्यक्ति की आजादी के
हत्यारे हैं, तो इसकी हत्या करने के औजार मेनस्ट्रीम मीडिया ने थमाये हैं। सवाल
है कि नीतीश कुमार की इस बर्बरता की सजा तो देर-सबेर वहां की जनता वोट के जरिये
जरूर दे देगी लेकिन मीडिया को सजा देने का काम कौन करेगा? उस मीडिया का जिसका
चरित्र किसी भी बॉलीवुड फिल्म के खलनायक चरित्र से अलग नहीं है।

*मुझे अभी तक इस बात की* पक्के तौर पर जानकारी नहीं है कि बिहार के मेनस्ट्रीम
मीडिया ने इस घटना को कितनी प्रमुखता से प्रकाशित या प्रसारित किया है लेकिन
अगर किया भी है, तो उसका पक्ष क्या है, ये जानना बेहद जरूरी है। नेशनल मीडिया
के लिए फेसबुक और इंटरनेट के जरिये शादी, अफेयर और सिलेब्रेटी की गॉशिप दिन की
बड़ी खबर होती है लेकिन इसी न्यू मीडिया के भीतर जब अभिव्यक्ति की आजादी का गला
घोंट देने की खबर आती है तो वो कितना दोमुंहे चरित्र का हो जाता है, ये अब
हमारे सामने हैं। ये कितनी खतरनाक स्थिति है कि जो मीडिया ऐसे माध्यमों की
उदारता का दोहन अपने धंधे के लिए जमकर करता है, उसी के भीतर से संभावना की
पत्रकारिता पनपती है तो या तो उसकी नोटिस नहीं लेता या फिर कुचलने में सत्ता के
साथ हो लेता है। फेसबुक पर जिस तरह से लोग इस घटना को लेकर सक्रियता जाहिर कर
रहे हैं और सरकार के फैसले के प्रतिरोध में माहौल बनाने का काम कर रहे हैं, लगे
हाथ ये काम भी जरूरी है कि बिहार बल्कि देशभर के लोगों के बीच व्यापक तौर पर ये
समझ पैदा करें कि खबर के नाम पर आप जो देख/पढ़ रहे हैं, वो नीलामी के बाद का
निकला हुआ माल है, जिसके लगातार उपयोग से आप बहुत बड़े कुकर्म का साथ दे रहे
हैं। आप उसकी खाल मजबूत कर रहे हैं जो कि अब तक के शोषण के तमाम औजारों से भी
ज्यादा घातक हमले कर रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो मुसाफिर बैठा और अरुण नारायण
का लिखा-पढ़ा बिहार सरकार की नीतियों के खिलाफ एक जरूरी हस्तक्षेप के दायरे में
आता और जिसे कि इन दोनों को लिखने की जरूरत नहीं पड़ती और ये काम मेनस्ट्रीम
मीडिया बहुत पहले कर चुका होता।

मूलतः प्रकाशित-मोहल्लाlive<http://mohallalive.com/2011/09/19/vineet-kumar-react-on-mainstream-media-of-bihar/>
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