[दीवान]राज्य, बुद्धिजीवी और हमारे कार्यभार
reyaz-ul-haque
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Wed Apr 11 15:46:48 IST 2012
* यह लेख एक ऐसे देश में बुद्धिजीवियों के सामने मौजूद जिम्मेदारियों,
दायित्वों, जनता की तरफ से उसके जिम्मे आए कार्यों की पड़ताल करता है, जहां
साम्राज्यवाद के भयंकर शोषण के आधार के रूप में सामंतवाद बरकरार हो.
अर्धसामंती-अर्धऔपनिवेशिक समाज व्यवस्थाओं में बुद्धिजीवियों की भूमिकाओं पर
बात करते हुए वे इसी से मिलते-जुलते दूसरे समाजों के बुद्धिजीवियों की
भूमिकाओं के साथ भारत के और खास कर हिंदी के बुद्धिजीवियों की तुलना करते हैं
और पाते हैं कि यहां स्थिति बेहद निराशाजनक है. एक तरफ यहां की
सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था भीषण शोषण और उत्पीड़न को दिनोदिन तेज कर रही है तो
दूसरी तरफ इस शोषण से मुक्ति के लिए संघर्षरत तबकों- दलित, आदिवासी, किसान,
मजदूर, महिलाओं, मुसलिम अल्पसंख्यक और उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं- पर फौजी हमले
भी तेज किए जा रहे हैं. लेकिन हिंदी का बुद्धिजीवी चुप है. वह पुरस्कारों और
पदों को पाकर संतुष्ट है और आनेवाली नई सुबह की हवाई कल्पनाओं में मगन है. इधर
ऐसे बुद्धिजीवियों की एक दूसरी फसल भी भरपूर हुई है, जिनके लिए साम्राज्यवाद
के पक्ष में हो रहे हर बदलाव को ‘लोकतंत्रीकरण’ के रूप में प्रचारित कर रही
है. ऐसे में वर्मा दिखाते हैं कि समाज को बदलनेवाले जुझारू संघर्षों के साथ
जुड़ कर ही बुद्धिजीवी अपने को प्रासंगिक और जनता में लोकप्रिय बनाए रख सकते
हैं. वरना वे एक दूसरे को कालजयी घोषित करते रहेंगे और जनता के संर्घषों से
निर्धारित हो रहा काल उनको निगलता रहेगा.
*राज्य, बुद्धिजीवी और हमारे
कार्यभार<http://hashiya.blogspot.in/2012/04/blog-post_08.html>
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