[दीवान]विचारधारा का संगम “कॉफी हाऊस”

Prakash K Ray pkray11 at gmail.com
Wed Apr 18 15:17:35 IST 2012


मध्यवर्गीय सपने आदमी से क्या-क्या लिखवा लेते हैं और कहाँ-कहाँ
तीर्थयात्रा करवा देते हैं !!

On 4/18/12, Ravikant <ravikant at sarai.net> wrote:
> अमित भाई,
> मैंने एकाध छेड़-छाड़ की है, बस।
>
> रविकान्त
> __
>
> _*
> विचारधारा का संगम “कॉफी हाऊस”*_
>
> शाह आलम भाई के अनुभवों का फायदा मुझे पिछले करीब 10 महीने से मिल रहा है। वो
> मेरे
> सहकर्मी और सहयोगी भी हैं। आज जब कनॉट प्लेस में बिना किसी काम के पहुँचा तो मन
> हुआ कि
> कॉफी हाऊस चला जाए। सबसे पहले जहन में शाह आलम भाई की तस्वीर उभर आई, जेब से
> फौरन
> मोबाइल निकाला और मिला दिया उनका नंबर। हाल चाल लेने के बाद कॉफी हाऊस का पता
> चल पाया। हालांकि कॉफी हाऊस की जानकारी मुझे पहले भी थी लेकिन शाह भाई ने मुझे
> बताया था कि अब इंडियन कॉफी हाऊस जोकि 1957 के बाद से ही अस्तित्व में आ चुका
> था अब
> उसके साथ बुजुर्ग शब्द जुड़ गया है। खैर मैने शाह भाई से जानना चाहा कि युवाओं
> का कॉफी
> हाऊस कहाँ है तो वो भी ठीक से बता नही पाए। खैर सोचा अभी बुजुर्गों के कॉफी
> हाऊस में
> ही चल लेते हैं, सो पहुँच गए। कॉफी हाऊस में कदम रखते ही दिल का एक और अरमान
> पूरा हो
> चला था। मोहन सिंह प्लेस का ये कॉफी हाऊस कई पन्नों पर खुद को दर्ज करा चुका
> है। कॉफी
> हाऊस में इक्का दुक्का बूढे अंग्रेजी अखबार पढ रहे थे। एक युवा जोड़ा कुछ
> गुफ्तगु करने में मशरूफ
> था। दो ऑफिशियल लोग ख्वाबों की ऊंची मीनारों के आसरे अपने-अपने उज्जवल भविष्य
> की
> इमारत को खड़ा करने की कवायद में जुटे हुए थे। एक भ्रांति तो दूर हो गई कि कॉफी
> हाऊस
> पर सिर्फ बुजुर्गों का ही कब्जा नही है उस पर युवाओं का भी बराबर का हक है। कई
> सोफे फट
> चुके हैं। पंखे भी चलने के दौरान बेकग्राऊंड स्कोर देते रहते हैं। लेकिन फिर भी
> एक शांति है
> जिसकी तलाश में मेरे जैसे कई खिंचे चले आते हैं। बैठ गया, मेन्यू पर नज़र डाली
> तो दिल खुश हो
> गया मतलब की जगह और मतलबी रेटों को देखकर लगा चलो एक नया अड्डा ढूंढने में
> कामयाबी
> मिली। आर्डर दिया कोल्ड क्रीम कॉफी का और अखबार के आसरे देश और दुनिया के
> हालातों से
> रूबरू होने की कवायद की शुरूआत कर दी। तीन लोग आकर मेरे बगल वाले सोफे पर बैठ
> गए।
>
> मैं अखबार में मसरूफ़ था अचानक तेज स्वर सुनाई दिया “वामपंथ अब एक विचार नही
> रहा बल्कि
> राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन रह गया है” वामपंथी मित्र को बुरा लगा तो उसने
> भी
> कांग्रेस और दक्षिणपंथियों की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी। सिलसिला चल चुका था
> कभी हंसी
> तो कभी रोष। लेकिन फिर भी चर्चा संतुलित और स्वस्थ। तीन विचारधाराओं का संगम
> होता
> देखा कॉफी हाऊस में। जामिया के फाऊंटेन लॉन, दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी
> और
> जे.एन.यू के गंगा ढाबा पर अक्सर बहस का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला मगर उस बहस
> का
> अंतिम परिणाम विवादित विषयों का निपटारा न होकर एक नए विवाद को मन में घर कर
> देना भर रह जाता था लेकिन कॉफी हाऊस की उस बहस में निपटारा भी था, विवाद भी था,
> समस्याओं का समाधान और हंसी का पिटारा भी था। कॉफी के कप में कई विचारों को
> ढूंढ-ढूंढकर निकालने वाले भी देखने के मिल जाते हैं यहाँ। काफी खुला हुआ है
> यहाँ का एरिया
> लेकिन भीड़ नजर नही आती, कई कॉफी के अड्डे खुल गए हैं ना ! अब लोग कॉफी की
> तुलना हॉट
> सन्नी लियोन से करते हैं और कॉफी हाऊस का मिज़ाज बताता है कि सन्नी लियोन पर
> सिर्फ
> चर्चा तो यहाँ हो सकती है लेकिन फूहड़ता का फ्लेवर यहाँ की कॉफी में नही मिल
> सकता।
> शायद इसलिए भीड़ कम ही नज़र आती है! शहर की तेज़-तर्रार और सिर झन्न कर देने
> वाली
> जिंदगी में सूकूं के दो पल बिताना बहुत जरूरी है। विचारों के जन्म के लिए जिस
> आत्मिक और
> बौद्धिक शांति की आवश्यकता होती है उसकी प्राप्ति मेरे लिहाज से यहाँ हो सकती
> है।
> बाथरूम की भयानक बदबू हालांकि इस मामले में अपवाद हो सकती है लेकिन कौन सा हमें
> बाथरूम
> में बैठकर कॉफी पीनी है। लेकिन सफाई हो जाए तो बेहतर ही होता है। क्योंकि कई
> बार
> शौचालय में भी सोच का सृजन होता है। मंडी हाऊस, कटवारिया सराय, नार्थ कैंपस,
> जामिया
> का फाऊंटेन पार्क, जे.एन.यू. का ढाबा, मुखर्जी नगर, क्रिश्चियन कॉलोनी और न
> जाने ऐसी
> ही कितनी जगहें, रचनात्मक लोगों के सोचने विचारने और टाइम पास करने के अड्डे
> में शुमार हैं।
> उसी तरह मोहन सिंह प्लेस का ये कॉफी हाऊस अपने आप में परिपूर्ण है एक सामाजिक
> सोच
> विकसित करने के लिए जहाँ टेबल पर आपके सामने पानी और कॉफी एक आर्डर पर आ जाते
> है। और
> क्या चाहिए, सरकार के दावों की हवा निकालते शिगुफे, और कभी-कभी तो किस्सों
> कहानियों
> के कथानक और मेरे जैसे कुछ लिखने वालों के लिए लिखने का बहाना ये कॉफी हाऊस
> गाहे-बगाहे
> बन ही जाता है। 2 घंटे कॉफी हाऊस में बैठना मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रहा
> जिसको
> शब्दों में बयाँ करना जरा मुश्किल है लेकिन मुझे भरोसा है कॉफी हाऊस की इस पहली
> कॉफी की
> महक, वेटर का वो सादा लिबास सिर पर ताज की तरह सजती नेहरू टोपी, और सबसे अहम
> विचारधाराओं के संगम की ये अवधारणा मेरे ज़हन में रचनात्मक रूप में सदैव
> व्याप्त रहेगी।
>
>
> *अमित कुमार*
>
> *पेशे से पत्रकार**, **जनता टीवी में कार्यरत **हूँ**।*
>
> *मो**-9958412139*
>
>


-- 
Prakash K Ray
Research Scholar, Cinema Studies,
School of Arts & Aesthetics,
Jawaharlal Nehru University, New Delhi-67.

0 987 331 331 5
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