[दीवान]हम आलोचना पढ़ते हुए भी अपने शिक्षक संजीव कुमार को सुन रहे थे

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Apr 24 10:07:51 IST 2012


जमाने बाद किसी ऐसे साहित्यिक लेख से गुजरना हुआ, मीडिया की आलोचना और मारकाट
के बीच इसे पढ़कर अच्छा लगा. अच्छा लगा कि मेरी छूटी हुई जमीन पर संजीव जैसे
कथाकार-आलोचक मौजूद हैं और उसे लगातार तर कर रहे हैं.
विनीत
<http://3.bp.blogspot.com/-w2buk90wI0U/T5YMjsUd7oI/AAAAAAAABAo/ZFQsbSDlHRk/s1600/140px-Uday_prakash.jpg>
संजीव कुमार हिंदी के गंभीर आलोचकों में गिने जाते हैं. हाल के वर्षों में जिन
कुछ आलोचकों को मिलने के कारण देवीशंकर अवस्थी सम्मान की विश्वसनीयता बरकरार
है, वे उनमें एक हैं. बहुत खुलेपन के साथ उन्होंने उदय प्रकाश की कहानियों,
उनकी कथा-प्रविधि पर लिखा है. उदय प्रकाश को पढ़ने के एक नए ढंग की ओर यह लेख
हमें ले जाता है. उस उदय प्रकाश को ‘लोकेट’ करने की दिशा में जिसकी लोकप्रियता
असंदिग्ध है, लेकिन हिंदी आलोचना जिससे बरसों से मुँह चुराती रही है. उदय
प्रकाश की षष्टिपूर्ति के वर्ष में लिखा गया विचारोत्तेजक लेख- जानकी पुल.
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*उदय प्रकाश पाठकों को अपनी बौद्धिकता से आतंकित करने वाले कहानीकार हैं।...
वे कहानी के नाम पर निबंध लिखते हैं और वह भी हर तरह के गठन-सिद्धांत की
ऐसी-तैसी करते अराजक बिखराव से ग्रस्त।... उनकी कहानियां रचना-दृष्टि की
विपन्नता को कभी भाषिक छल और कभी अमूर्तन से ढंकने-तोपने की कोशिश करती
हैं।... वे घोर मैनरिज़्म के शिकार हैं।... उनकी कहानियों में अभिप्रेत
संवेदना शिल्प की अतिरिक्त सजगता से क्षत-विक्षत हो जाती है।... वह विदेशी
कथाकारों की नकल मार कर**, **कई जगह उनका अनुवाद कर अपनी धाक जमाने में माहिर
है (**‘**लैब्रिंथ**’ **तो सीधे-सीधे उड़ा लाया! और **‘**मेटामौरफोसिस**’ **का
पहला ही वाक्य! हद है टीपने की भी!)।... वह एक अनैतिक और निष्ठुर कहानीकार
है-- जिन परिचितों से सहानुभूति रखी जानी चाहिए**, **उन पर कहानी लिख कर उनकी
खिल्ली उड़ाता है।...***
*
*
उदय प्रकाश को पढ़ते हुए मुझे तीस साल हो गये और उनके बारे में ऐसे आरोपों को
सुनते-पढ़ते हुए भी कम-से-कम बीस साल तो हो ही गये। इन बीस सालों में मैं हर
समय इन आरोपों से अप्रभावित ही रहा होऊं, ऐसा भी नहीं है। पर इतने सालों बाद
आज पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि इन आरोपों के मुक़ाबले उदय की कहानियां
मेरी अपनी समझ के संसार में, और निस्संदेह वस्तुगत धरातल पर हिंदी कहानी के
संसार में भी, कहीं ज़्यादा टिकाऊ साबित हुईं। आज अगर इपंले (इन पंक्तियों का
लेखक) एक पेशेवर-आलोचक-टाइप पाठक की भूमिका में उदय प्रकाश की कुछ सीमाओं को
चिह्नित करे भी, तो उनका संबंध उपर्युक्त आरोपों से बिल्कुल नहीं होगा। और
जहां तक ‘वस्तुगत धरातल पर हिंदी कहानी के संसार’ का सवाल है, उसने उदय द्वारा
की गयी कई शुरुआतों की अनुकरणीयता को सिद्ध करते हुए उपर्युक्त आरोपों को
चुपचाप, मगर निर्णायक तरीक़े से किनारे कर दिया है। आज की हिंदी कहानी की कई
प्रवृत्तियां ऐसी हैं जिनकी जड़ें तलाशते हुए अगर आपकी निगाह उदय प्रकाश पर ही
जाकर नहीं रुकती, तो कम-से-कम उनकी अनदेखी तो नहीं ही कर सकती है। बेशक, उसके
बाद इस कहानीकार के बारे में आप राय क्या बनाते हैं, यह इस पर निर्भर होगा कि
उन प्रवृत्तियों के बारे में आपकी क्या राय है।

जो उदय की कहानियों के मुरीद नहीं हैं, वे भी यह स्वीकार करेंगे कि दाय में
मिले हुए कहानी के फ़ार्म को उन्होंने एकबारगी तो नहीं, पर आहिस्ता-आहिस्ता
ख़ासा बदल डाला। उस बदलाव पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। मुझे शक़ है
कि‘रूपगत’ प्रयोगों
या नवीनताओं के प्रति जिन आलोचकों का रवैया अगंभीर, यहां तक कि अवमाननापूर्ण
होता है, उनके मन में कहीं-न-कहीं यह धारणा होती है कि यह दरअसल नवोन्मेषी
कहलाने की महत्वाकांक्षा से उपजी कोई ख़ामख़ा की चीज़ है, या फिर किसी सुखद
प्रभातवेला में रचनाकार के मन में उठे इस फि़तूर का नतीजा, कि और तो कुछ उखाड़
नहीं पा रहे, चलो, रूप में ही कुछ उलट-फेर कर डालें।
<http://2.bp.blogspot.com/-9OIpYoCWd5w/T5YNRiJ1IAI/AAAAAAAABAw/paQ9oV3JjGw/s1600/sanjiv.jpg>संजीव
कुमार

लिहाज़ा, सबसे पहले इस बात पर बल देना ज़रूरी है कि रूप का नयापन किसी की
स्वाधीन इच्छा या दिमाग़ी फि़तूर की पैदावर नहीं होता। ज़्यादातर मामलों में
वह स्थापित रूप के भीतर अपनी बात कह पाने में रचनाकार की असमर्थता का परिणाम
होता है। यह असमर्थता बड़ी मूल्यवान चीज़ है,क्योंकि रूप वस्तुतः बोध के ढांचे
से अनुकूलित होता है और अगर बोध का ढांचा अपरिवर्तित है तो चले आते रूपविधान
के भीतर रचने का सामथ्र्य बना रहता है। बोध के ढांचे को ‘तीसरी क़सम’ कहानी के
एक प्रसंग से समझें। कहानी का एक पात्र है, पलटदास। भगत आदमी है। थियेटर में
चलने वाली नौटंकी ‘गुलबदन और तख़्तहज़ारा’ देखते हुए उसकी प्रतिक्रियाः‘पलटदास
कि़स्सा समझता है... कि़स्सा और क्या होगा, रमैन की ही बात! वही राम, वही सीता
, वही लखनलला और वही राबन! सिया सुकुमारी को रामजी से छीनने के लिए राबन
तरह-तरह का रूप धरकर आता है। राम और सीता भी रूप बदल लेते हैं। यहां भी
तख़्तहज़ारा बनानेवाला माली का बेटा राम है। गुलबदन सिया सुकुमारी हैं। माली
के लड़के का दोस्त लखनलला है और सुल्तान है राबन...।’

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