[दीवान]विदेशी चंदा और आंदोलन का धंधा
Ashish Kumar 'Anshu'
ashishkumaranshu at gmail.com
Sat Aug 11 16:26:00 IST 2012
देशभर में चल रहे विभिन्न जन-आन्दोलनों को लेकर सरकार के पास मिल रही जानकारी
में यह बात स्पष्ट हो रही थी कि इन आन्दोलनों में भी जमकर विदेशी पूंजी निवेश
किया जा रहा है। तमिलनाडू के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ चल
रही मुहिम के दौरान ये बातें खुलकर अखबारों की सुखियां बनी। यह भी कहा गया कि
आन्दोलन में चर्च और उससे जुड़े हुए एनजीओ दोनों हाथों से पैसा खर्च कर रहे
हैं। इसी दौरान अन्ना और रामदेव के आन्दोलनों में एनजीओ की भूमिका ने सरकार को
और अधिक सतर्क कर दिया। विदेशी पैसे से सरकार की नाक में दम करने का यह नया
तरीका निश्चित रूप से एक संप्रभु सरकार को परेशान करनेवाला है।
पिछले एक महीने में सरकार ने 4139 एनजीओ पर विदेश से किसी प्रकार की सहायता
राशि लेने संबंधी रोक लगाई है। इनमें सबसे बड़ी संख्या 794 (19 प्रतिशत)
तमिलनाडु के एनजीओ की है। सरकार ने गृह मंत्रालय की वेवसाइट पर उन सभी एनजीओ
के नाम की सूचि डाल दी गई है।
हाल के दिनों में आई केन्द्रिय गृह मंत्रालय की एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया
है कि 2009-10 में विदेश से आने वाली कुल 10,000 करोड़ रूपए में से अधिकांश
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और यूरोप से आई हुई रकम थी। रिपोर्ट के अनुसार बाहर
से पैसा देने वाली और भारत में उन पैसों का इस्तेमाल करने वाली अधिकांश
संस्थाएं धार्मिक हैं या फिर धार्मिक संस्था प्रायोजित एनजीओ हैं।
गृह मंत्रालय का 42 पृष्ठों का यह विश्लेषण रिपोर्ट कहता है कि देश में 14,233
एनजीओ ने विदेशी मदद को स्वीकार किया है और विदेश से इनके लिए आने वाली कुल
रकम 10,337.59 करोड़ है। मदद के लिए आए इन पैसों का बड़ा हिस्सा दिल्ली (1815.91
करोड़) पहुंचा और उसके बाद तमिलनाडु (1663.31 करोड़) व आन्ध्र प्रदेश (1324.87)
गया। दिलचस्प है कि जिलावार विश्लेषण करने पर चेन्नई इस सूचि में 871.60 करोड़
के साथ सबसे ऊपर है। उसके बाद बेंगलुरु (703.43 करोड़) और मुम्बई (606.63
करोड़) का नंबर आता है।
एनजीओ के पास जो रकम देश से बाहर से समाज के कल्याणार्थ आ रही है, इन पैसों को
भेजने वाले देशों में सबसे आगे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका (3105.73 करोड़) खड़ा
है। उसके बाद जर्मनी (1046.30 करोड़) और यूके (1038.68 करोड़ ) का नंबर आता है।
ये तीन देश पिछले कई सालों से एनजीओ की दानदाताओं की सूचि में टॉप पर हैं। इन
देशों से आने वाला अधिकांश पैसा, इन देशों की धार्मिक संस्थाएं या धार्मिक
संस्था प्रेरित संस्थानों के मार्फत आता है। भारत की गरीबी, अशिक्षा और
स्वास्थ को लेकर इन देशों की धार्मिक संस्थाओं के मन में उपजे प्रेम ने गृह
मंत्रालय को सतर्क कर दिया है। मंत्रालय समझने की कोशिश में जुटा है, क्या
इनके मदद का उद्देश्य वास्तव में खालिश समाज सेवा ही है, या कुछ और है?
इन तीन देशों के अलावा भारतीय एनजीओ को कुछ अन्य देशों से भी मदद मिल रही है।
मदद करने वाले अन्य देश, इटली (583.47 करोड़) नीदरलैंड (509.46 करोड़), स्पेन
(437.23 करोड़) स्वीट्जरलैन्ड (302.06 करोड़) हैं। इसके साथ कनाडा (297.98
करोड़), फ्रांस (189.12 करोड़), आस्ट्रेलिया (148.28 करोड़) और यूएई (133.15
करोड़) भी भारतीय गैर सरकारी संगठनों के बड़े मददगारों में शामिल हैं।
‘द रिपोर्ट ऑफ होम मिनिस्ट्री ऑन फॉरेन कंट्रीब्यूशन एंड रेगुलेशन फॉर द
पीरियड ऑफ ईयर 2009-10’ के अनुसार विदेश से भारतीय एनजीओ के पास आने वाला सबसे
अधिक पैसा यूएसए की संस्था ‘द गॉस्पेल फॉर एशिया इंक’ (232.71 करोड़) की तरफ से
आता है। इसके बाद बार्सिलोना (स्पेन) की संस्था फंडासियस विसेन्ट फेरर (228.60
करोड़) और यूएसए की संस्था ‘द वर्ल्ड विजन ग्लोबल सेन्टर (197.62 करोड़) का नंबर
आता है। यह प्रमुख तीन विदेशी दानदाता संस्थाएं एक खास धर्म से संबंधित
संस्थाएं हैं। चौथी दानदाता कॉम्पेशन इंटरनेशनल (131.57 करोड़) है। यह भी इसी
धर्म श्रेणी की दानदाता संस्था है।
यह बात कई लोगों को चौंकाने वाली लग सकती है कि भारत को विदेशी मदद करने वाली
पांचवें नंबर की जो संस्था है, वह एक भारतीय संस्था है। जिसका नाम एचसीएल है।
एचसीएल 94.28 करोड़ रुपए अपने मॉरिशस शाखा से चेन्नई के सेवा सुब्रमण्यम नाडार
एजुकेशनल ट्रस्ट को दान करता हैं। यह ट्रस्ट एचसीएल के मालिक शिव नाडार के
पिताजी के नाम पर बनी है।
विदेशों से आने वाली सबसे बड़ी रकम ‘वर्ल्ड विजन ऑफ इंडिया’, (208.94 करोड़)
तमिलनाडू, चेन्नई की एक गैर सरकारी संस्था के पास जाता है। इसके बाद आन्ध्र
प्रदेश के अनंतपुर स्थित ‘रूरल डेवलपमेन्ट ट्रस्ट’ (151.31 करोड़) को जाता है।
तीसरे नंबर पर चेन्नई के सेवा सुब्रमण्यम नाडार एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट
(94.28 करोड़ रुपए) का नंबर आता है। इस आलेख में इस ट्रस्ट का जिक्र पहले भी एक
बार आया है।
गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार एनजीओ के पास विदेश से आए हुए पैसे विभिन्न
मदों में खर्च किए गए। कुल खर्च जिसे व्यवस्था के विभिन्न हिस्सों को सुधारने
पर किया गया, 1482.58 करोड़ है। इसके बाद ग्रामीण विकास पर 944.30 करोड़, बाल
विकास पर 742.42 करोड़, स्कूल कॉलेज के निर्माण और साज-संभाल पर 630.78 करोड़
रूपए का खर्च आया। इसी तरह योग्य गरीब बच्चों के लिए स्कॉलरशिप, सहायता राशि,
पैसों द्वारा या उपयोगी सामग्री के ऊपर विदेशी मदद से प्राप्त रकम का भारतीय
गैर सरकारी संस्थाओं ने उपयोग किया। इस मदद पर कुल 454.70 करोड़ रूपए खर्च किए
गए।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009-10 दौरान 133 गैर सरकारी संस्थाओं को 10 करोड़
रूपए से अधिक की विदेशी मदद मिली। 179 गैर सरकारी संस्थाओं को 5-10 करोड़ के
बीच में मदद मिली। 1594 गैर सरकारी संस्थाओं को 01 से 05 करोड़ तक की मदद राशि
मिली। 12327 गैर सरकारी संस्थाओं को एक करोड़ से कम की मदद राशि विदेशों से
मिली।
2010-11 में विदेशों से एनजीओ के पास आए पैसों को लेकर भारत सरकार के पास
खुफिया जानकारी रही कि इन पैसों का दूसरे मद में उपयोग किया गया है। जिस मद
में यह पैसा विदेश से लाया गया था, उस मद में इसका इस्तेमाल नहीं हुआ।
राज्य सभा में एक सवाल का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री मुल्लापल्ली
रामचन्द्रन ने बताया था, वर्ष 2009-10 में 21674 एनजीओ के पास 9914.19 करोड़
रुपए विदेशी मदद आई। 2008-09 में 22544 एनजीओ के पास 10,987.05 करोड़ रूपए की
विदेशी मदद आई। 2007-08 में 21365 एनजीओ के पास 9914.19 करोड़ रुपए की विदेशी
मदद आई।
बहरहाल बड़ा सवाल यही है कि सरकार की मंशा यदि गैर सरकारी संस्थाओं को लेकर और
विदेशी मदद को लेकर साफ थी तो उसने जांच की कार्यवायी को उस दौर में क्यों
गंभीरता से आगे बढ़ाया जब देश भर में केन्द्र सरकार के खिलाफ विभिन्न अभियान
चलाए जा रहे हैं। देश भर में सरकार विरोधी एक माहौल बना है। कहीं सरकार की
मंशा विदेशी मदद की आड़ लेकर लोकतंत्र में अपने विरोधी सामाजिक कार्यकर्ताओं को
परेशान करना तो नहीं है।
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आशीष कुमार 'अंशु'
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