[दीवान]बच्चों के "बाबा नागार्जुन" हैं अरविंद गुप्ता
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Tue Jul 3 10:55:42 IST 2012
खिलौने पर अरविंद गुप्ता के प्रयोग और विश्लेषण सुनकर लगा कि हम जिस समाज में
रह रहे वो बड़ी तेजी से हमारी क्रिएटिविटी को बाजार के हाथों बहुत ही औने-पौने
दामों पर बेच आते हैं जिसमें कि हमारे मां-बाप और टीचर सबसे ज्यादा शामिल हैं.
<http://3.bp.blogspot.com/-ygbkhhUfPoA/T_J_vgU4xPI/AAAAAAAADK0/WD0gNNLoyVI/s1600/arvind%2B2.PNG>
ये क्रिएटिविटी बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, एसी ट्वायज शोरुम और आखिर में कार के
पिछवाड़े, अस्त-व्यस्त ड्राइंगरुम और मेड के बच्चों के हाथों जाकर तिरोहित हो
जाती है. ऐसा करते हुए विज्ञान के नाम पर हम सिर्फ और सिर्फ कबाड़ पैदा करते
हैं और समाज के नाम पर उतरन. इस कबाड़ और उतरन के बीच हमारी कल्पना के, हमारी
रचनात्मकता के चिथड़े-चिथड़े न हो जाए, इससे बचने के लिए हजारों अरविंद गुप्ता
का होना जरुरी है. अरविंद गुप्ता ने कबाड़ के बीच खिलौने, कला, विज्ञान और
उत्साह को खोजने का काम किया और रवीश ने टीवी के कबाड़ कार्यक्रमों के बीच
अरविंद जैसे शख्स को लाने का. दोनों का बहुत-बहुत शुक्रिया.
अरविंद गुप्ता के इस शो को अगर थोड़ी भी सावधानी के साथ देखें तो ये समझना
मुश्किल नहीं है कि वो हिन्दुस्तान जैसे मुल्क के बीच किस जिद के साथ अपना काम
कर रहे हैं ? रोटी में सबों की हिस्सेदारी, कविता में रोटी की तरह सबों की
हिस्सेदारी कहनेवाले फिर भी सभ्य समाज में हजारों लोग मिल जाएंगे लेकिन
बार्बी,पोकेमॉन( ऑरिजनल और पायरेटेड) के बीच गरीब बच्चों का हक कैसे मारा जाता
है, उनके बचपन पर कैसे सभ्रांत समाज से आनेवाला बच्चा कब्जा कर जाता है और तब
वह अवस्था की मासूमियत के बावजूद अपनी स्टेटस में उतना ही क्रूर हो जाता है,
जितने उनके मां-बाप, अरविंद को सुनते हुए आप शिद्दत से महसूस करेंगे...दो
पैसे-चैर पैसे की पन्नी,स्ट्रॉ,माचिस की तिल्ली और रिफिल से उन्होंने जिन
खिलौने को बनाकर दिखाया और हम जैसे ठस चेहरे पर भी लगातार खुशी और कई बार
आंखों में आंसू आते रहे. आमिर खान अगर इस शो को देखते हैं तो उनकी जुबान से
पता नहीं कितनी बार "ओ तेरी की" निकलेंगे. आपको अनायास राजेश जोशी की कविता "बच्चे
काम पर जा रहे हैं"
<http://www.kritya.in/0712/hn/poetry_at_our_time.html>याद आने लगेगी.
कोई सौ बच्चों के बीच एक प्रयोग करके देखे- आधे बच्चे को
डोरेमॉन,पोकेमॉन,स्पाइडर और बार्बी के खिलौने दे दे और आधे को अरविंद के
खिलौने के साथ छोड़ दे और फिर उनकी खिलखिलाहट और मुस्कान की नाप इंच में
करे..यकीन मानिए, इस नतीजे के बीच शॉपिंग मॉल के खिलौने के शोरुम ध्वस्त नजर
आएंगे. कॉन्वेंट स्कूलों की साइंस क्लासेज इनह्यूमन बनाने के कारखाने लगेंगे
और स्टेटस के साथ जीनेवाला मां-बाप का घर कन्ज्यूमर बनाने की फैक्ट्री लगेगी.
आप भी इस शो को देखिए और उस सभावना के साथ खुश होइए..कोई तो है जो कबाड़ के
भीतर सोई आत्मा को जगाने का काम कर रहा है. कोई तो है जिसे इस कबाड़ को पैदा
करनेवाले से शिकायत नहीं, वो अकादमिक समाज के बाकी लोगों की तरह पर्यावरण बचाओ
के नाम पर सेमिनार करके हजारों किलो कचरा पैदा नहीं करता. कला और कविता की
तरफदारी करते हुए भी इंडिया हैबिटेट और इंडिया इंटरनेशल जैसे ठिकाने को "उपभोग
करने के अड्डे" नहीं बना डालता बल्कि उसके भीतर "मतलब" पैदा करने की कोशिश
करता है. जिस शख्स का वजूद कबाड़ के बीच ही है. पता नहीं क्यों मुझे अरविंद
सौंदर्य विधान,नायिका भेद करनेवाले और मोटे-मोटे पोथे लिखनेवाले सैंकड़ों
कवि-आचार्यों के बीच भी ज्यादा करीब और विश्वसनीय लगे. हक और सरोकार की बात
करनेवाले जनवादी कवियों के बीच के लगे. फर्क सिर्फ इतना है कि ये कवि हमारे
कोर्स में आकर बेदखल होने से (छोटे ही सही हिस्से में) बच गए जबकि अरविंद
कबाड़ होती जिंदगी के बीच जहां हम खुद ही बेदखल होते जा रहे हैं, उसमें बहुत
कुछ बचा लेने की बात कर रहे हैं. यकीन मानिए अरविंद गुप्ता का काम और उसके
पीछे का तर्क उन तमाम रचनाकारों के लिए खुली चुनौती है जो कविता और साहित्य के
जरिए आए दिन एक खूबसूरत दुनिया की कल्पना करते हैं. हम निराशावादियों के लिए
कबाड़ के बीच खिलौने यानि उत्साह यानि जिजीविषा बनाए रखनेवाले अरविंद
गुप्ता बच्चों
के "बाबा नागार्जुन" जैसे लगे. पूरी बातचीत और एप्रोच में भी और काफी हद तक
कद-काठी और हुलिए से भी.
पूरा शो देखने के लिए चटकाएं- कबाड़ के जुगाड़ से बने अरविंद के
खिलौने<http://www.ndtv.com/video/player/hum-log/video-story/237898>
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