[दीवान]उदयन शर्मा मीडिया सेमिनार में अधिकांश मीडियाकर्मी नेतागिरी छांटने लगे
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Jul 11 21:41:26 IST 2012
आज पत्रकार उदयन शर्मा की याद में आयोजित मीडिया सेमिनार में जाना हुआ. विषय
था- बदलते दौर में मीडिया की भूमिका. लेकिन अफसोस कि जो मीडियाकर्मी क्लास
मॉनिटर की तरह अपने टॉक शो और प्रेस कॉन्फ्रेंस में डपटते आए हैं कि मुद्दे की
बात कीजिए सर, ऐसे मौके पर वो नेताओं से भी कहीं ज्यादा अश्लील ढंग से
भाषणबाजी पर उतर आते हैं और मुद्दे किस खोह में चले जाते हैं, पता ही नहीं
चलता. खैर,
<http://3.bp.blogspot.com/-z20AEQvdckg/T_2kc9AIijI/AAAAAAAADMQ/Hr3AaIyhyP4/s1600/samvad2012_thumb_medium630_772.jpg>
मैं पिछले चार सालों से इस सेमिनार में जा रहा हूं और उदयन शर्मा के संदर्भ
में मंच से और मंच से आजू-बाजू भी इस बात की लगातार चर्चा होती रही है कि उनके
कांग्रेस के नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं. मैं फिलहाल इस बहस में बिल्कुल
नहीं जाना चाहता कि किसी पत्रकार के लिए व्यावहारिक जरुरत होने के बावजूद किसी
खास राजनीतिक पार्टी से गहरे और अच्छे संबंध होना अच्छा है या बुरा. लेकिन हां
उदयन शर्मा की जो स्मारिका "छवि उदयन" जो हमें दी गई, उसमें कांग्रेस के अलावे
भी बाकी पार्टी के नेताओं के साथ उनकी तस्वीर लगी है. ये अलग बात है कि शायद
एक भी तस्वीर ऐसी नहीं है जिससे ये समझा जा सके कि उदयन शर्मा के अपने दौर के
बुद्धिजीवी, प्रोफेसर,पत्रकार,कलाकार जैसे लोगों से भी गहरा लगाव-जुड़ाव रहा
था.
इन सबके बीच कौन सी समझ काम करती है,ये तो नहीं मालूम लेकिन इस बात का अफसोस
लंबे समय तक रहेगा कि मंच संचालक विनोद अग्निहोत्री( मैनेजिंग एडीटर, नेशनल
दुनिया) और वक्ता सुमित अवस्थी ( एंकर, आजतक) इन दोनों ने इस सेमिनार को
"कांग्रेस पार्टी चाकर सम्मेलन" बनाने में कहीं से कोई कसर नहीं छोड़ी. विनोद
अग्निहोत्री जैसे-जैसे कांग्रेस पार्टी से जुड़े लोग आ रहे थे, मंच से कमेंटरी
और स्वागत बाइट दिए जा रहे थे, वहीं सुमित अवस्थी बात पीछे वक्ता की हैसियत से
बैठे कांग्रेस मंत्री आर.पी. एन.सिंह के जरिए सरकार से गुहार लगा रहे थे कि ये
नीति लाए,वो नीति लाए, इकॉनमी मॉल तैयार करे ब्ला...ब्ला.
दूसरा कि आप किसी भी मीडिया सेमिनार में चले जाइए, दस मिनट के भीतर ऐसा माहौल
बनाया जाता है कि जैसे आप "हृदय परिवर्तन या शुद्धीकरण यज्ञ" में आ गए हों.
मीडिया में ईमानदारी नहीं रह गई है,ये बात तो बच्चों तक को समझ आने लगा है
लेकिन मीडियाकर्मियों में इतनी भी ईमानदारी भी नहीं बची है कि क्या मौजूदा
हालात है, वस्तुस्थिति है, कायदे से उसे ही उन श्रोताओं तक पहुंचा दें जो
सौ-सवा सौ रुपये भाड़े लगाकर इस भीषण गर्मी में चलकर सुनने जाता है. अब बताइए,
सुमित अवस्थी ने कहा कि हमें मीडिया में अच्छे लोग चाहिए, हमें मीडियोकर लोग
नहीं चाहिए, जिनके पास विषय का ज्ञान हो, समझदारी हो. कौन नहीं जानता कि
मीडिया में मीडियोकर लोग जितनी आसानी और बेहतर तरीके से खप सकते हैं,
पढ़े-लिखे संजीदा और ईमानदार शख्स का खपना उतना ही मुश्किल है. प्रकाश सिंह
जैसा शख्स फर्जी स्टिंग ऑपरेशन करता है, जेल जाता है और कुछ ही महीने बाद
दूसरे चैनल में न केवल फिट हो जाता है बल्कि रसूकदार मंत्री का मीडिया सलाहकार
हो जाता है. ऐसे दर्जनों उदाहरण सामने हैं. जो थोड़े ईमानदार मीडियाकर्मी बचे
हैं, वो कैसे किस्तों में मर रहे हैं, इस पर भी कभी नजर डाला जाना चाहिए. सवाल
सिर्फ ये नहीं है कि अच्छे औऱ पढ़े-लिखे लोग नहीं आते. सवाल है कि अगर वो आते
भी हैं तो उसके लिए मीडिया में कितना स्पेस बचा है? माफ कीजिएगा सुमित अवस्थी
साहब. आइआइएमसी,जामिया मीलिया और खुद आपके संगठन के मीडिया संस्थान टीवीटीएमआई
से जो दर्जनों मीडिया छात्र हर साल बाहर आते हैं, वो सबके सब डफ्फर नहीं होते
और न ही सिर्फ चिकनी चमेली और ढ़ाई करोड़ में ठुमके लगाएगी मुन्नी जैसी स्टोरी
कर सकते हैं. वो बस्तर, झारखंड और लुटियन जोन के बाहर की भी पत्रकारिता भी
उतनी काबिलियत और संवेदनशीलता के साथ कर सकते हैं.
मुझे हंसी आ रही थी सुमित अवस्थी की समझ पर और बाहर निकलकर दूसरे कई लोग मजाक
भी उड़ा रहे थे कि जिस मीडिया में अच्छे-अच्छे अनुभवी और पुराने पत्रकारों के
साथ बदसलूकी और निकाल-बाहर किया जाता रहा है, वहां सुमित अवस्थी फच्चे की तरह
लोगों को ज्ञान दे रहे थे. क्या सुमित अवस्थी बताएंगे कि आप कायदे के लोगों को
लेकर क्या करेंगे या फिर आप जैसे ओहदेदार मीडियाकर्मी सक्षम हैं कि इन्डस्ट्री
में उन्हें खपा सकें ?
ऐसे मीडिया सेमिनारों में जब पुराने मीडियाकर्मियों का जमावड़ा होता है, उनके
मुख से पंडित, पंडितजी का उच्चारण इतनी बार होता है कि जैसे वो हमारे सामने
हिन्दी पत्रकारिता का कोई ऐसा मौखिक इतिहास पेश करना चाह रहे हों, जिसे कि बस
चले तो वर्तमान पर भी लाद दें. उनके इस पंडित उच्चारण के अंदाज से ही लग जाएगा
कि पत्रकारिता के भीतर में जाति विशेष को लेकर कितने आग्रही रहे हैं. संचालन
ने इसे हमें बार-बार एहसास कराया.
राहुल देव ने जरुर कुछ आधे-अधूरे सच को हमारे सामने रखने की कोशिश की. सबसे
अच्छी बात लगी कि जो मीडिया और हम जैसे पत्रकार जिस वैश्वीकरण औऱ बाजारवाद का
विरोध कर रहे हैं, कहीं न कहीं हम खुद भी इसके शिकार हो जा रहे हैं और उसमें
शामिल है. शायद यही वजह है कि हम मजबूती से इन सबका विरोध नहीं कर पाते..समय
के साथ-साथ हमारे औजार और भी अस्पष्ट और कमजोर होते चले जाएंगे. लेकिन आगे वो
जिस आशावाद के तहत एक नए भारत की परिकल्पना में अक्सर उलझते नजर आते हैं-
संस्कार भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् जैसे संगठन के पर्चे और एक
अनुभवी पत्रकार की परिकल्पना के बीच की विभाजन रेखा विलीन होती दिखती है.
रवीश कुमार ( एक्जीक्यूटिव एडिटर एनडीटीवी इंडिया) की बात लंबे समय नोट
करनेवाली है कि हमने पतन को ही अपना पैमाना बना लिया है. जब भी मीडिया के खत्म
और कमजोर होने की बात की जाती है हम बाहर के देशों से तुलना करने लग जाते हैं
कि अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में भी ऐसा हो रहा है. हम इस बात पर जरा भी
नहीं सोचते कि जिन लोगों के हाथों जिम्मेदारी है, उन्होंने हालाता को बदलने
में क्या कुछ किया ? दूसरा कि तकनीक के कारण संवेदनशीलता के खत्म होने की बात
की गई तो ये समझना चाहिए कि तकनीक का इतिहास से गहरा रिश्ता रहा है और उसी के
साथ ही चीजों का विकास हुआ है. सबसे बड़ी दिक्कत है कि इन्टरनल स्ट्रक्चर कहीं
न कहीं ध्वस्त हुआ है. हम सब कहते हैं संपादक जैसी संस्था ध्वस्त हुई है लेकिन
सार्वजनिक क्या, व्यक्तिगत स्तर पर भी हम इससे दुखी नहीं होते. अपने ड्राइंग
रुम में भी जाकर अफसोस नहीं करते कि गलत हआ. सब इस बात से खुश हैं कि हम बने
तो हैं ही न किसी न किसी तरह से. आप देखिए न, मीडिया की क्रेडिबिलिटी और उस पर
सबसे ज्यादा संकट इस दौर में आया है, मीडिया बदतर हुआ है जबकि सबसे अच्छी
तनख्वाह मिलने लगी है. सबों की तो नहीं पर जिन्हें मिल रही है, वो भी कुछ ऐसा
नहीं कर रहे कि साख बची रहे...और इन सारी बातों के लिए कोई सरकार जिममेदार
नहीं है, वो नहीं कहती कि हर पीटूसी के पीछे इंडिया गेट दिखाओ, हम खुद दिल्ली
में ही करावल नगर देखना नहीं चाहते, उसकी बात नहीं करते.
पेड न्यूज के इस दौर में तारीफ करना भी अपनी क्रेडिबिलिटी को संकट में डालना
है. रवीश कुमार की इस बात को कांग्रेस के आर.पी.एन.सिंह ने दूसरे तरीके से कहा
जिसे कि उपरी तौर पर असहमति लग सकती है कि हमारे बीच सब ऐसे नहीं होते, हमारी
तारीफ में लिख देने से आपकी क्रेडिबिलिटी नहीं चली जाएगी बल्कि ऐसा करना एक हद
पत्रकारों के लिए जरुरी भी है. यकीन मानिए मंत्री साहब ने कहीं ज्यादा कायदे
से विषय के आसपास अपनी बातें कहीं. उन्होंने मीडिया के दो धड़ों में बंट जाने
की बात जिस सहज तरीके से कहीं उसे समझा जाना चाहिए. अपने अनुभव साझा करते हुए
कहा- खबरों की एक दुनिया ट्विटर, फेसबुक जैसे प्लेटफार्म हैं जहां जिसने जो
कहा उसे ही हमने खबर बना दिया. इस खबर के लिेए कुछ नहीं किया. इसी में
अमेरिका की किसी पत्रिका ने भारत के बारे में क्या कहा, इस पर छह घंटे की
स्टूडियो में पैनल डिस्कशन करा दी और इसके लिए भी फील्ड में कहीं कुछ नहीं
किया..और दूसरा है कि हम पाठक की हैसियत से अभी डिमांड करते रह जाते हैं कि
यूपी के ईलाके में क्या हुआ है, इसे दैनिक जागरण और अमर उजाला या वहां से
निकलनेवाले अखबारों के जरिए जानें. हम अखबारों में अभी भी हार्डकोर फील्ड से
जाकर लायी गई खबरें देखना चाहते हैं जो कि गायब हो रहे हैं. ऐसे में मैं अपने
को बिल्कुल डिस्कनेक्ट महसूस करता हूं.
पिछले साल की तरह इस साल भी डॉ. एस. वाई कुरैशी( पूर्व चुनाव आयुक्त) ने पेड
न्यूज पर बेहतर बोला. ये अलग बात है कि उनमें से नया कुछ नहीं था अगर एक-दो
लाइन पंजाब और उत्तर प्रदेश के संदर्भ को छोड़ दें तो. पेड न्यूज पर चुटकी
लेते हुए उन्होंने कहा कि ये सही व्यवस्था है जहां एक तरह की डेमोक्रेसी
है,जहां सारे नेता एक नजर से देखे जाते हैं, कहीं कोई भेदभाव नहीं है. जो पैसा
देगा, उसका काम होगा. दूसरी बात जो कहीं उस पर मीडिया को गौर करना चाहिए कि जब
चुनाव आयोग ने मीडिया से कहा कि आपलोग मतदान के पक्ष में माहौल बनाए तो उससे
महिला मतदातओं के वोट देने में 35-40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. ऐसे में देखें तो
इस मीडिया से हमारा मजबूत होता है लेकिन यही मीडिया पेड न्यूज के काम में लग
जाता है तो लोकतंत्र की जरुरत से ठीक उलट काम होता है.
वक्ता के तौर पर इंडिया न्यूज के कुर्बान अली भी थे लेकिन देर से पहुंचने की
वजह से उन्हें सुन नहीं पाया. ओवरऑल पिछले साल के मुकाबले सेमिनार फ्लॉप था.
जो लोग सालों से आ रहे थे, वे अपनी-अपनी वजहों से नदारद थे लेकिन पूरे माहौल
को देखते हुए हम अंदाजा लगा पा रहे थे कि ये सेमिनार बदलते दौर पर बात करने के
बजाय स्याप और कांग्रेस का चाकर सम्मेलन बनकर रह गया. दूसरा कि जिस बिरादरी से
वक्ता बुलाए जाते हैं, श्रोता-दीर्घा में बैठे बहुत ही अलग-अलग फर्टनिटी और
मिजाज के होते हैं जिनमें कईयों की वक्ता की बातों से असहमति होती है. ऐसे में
एकतरफा और लगभग प्रवचन जैसा होने के बजाय सवाल-जवाब के भी मौके दिए जाने चाहिए
जो कि नहीं थे. पहले हुआ करता था लेकिन आशुतोष की बात को लेकर हो-हल्ला होने
की वजह से बंद कर दिया गया. मुझे लगता है कि उदयन फाउंडेशन को अपने इस फैसले
पर दोबारा से विचार करना चाहिए. आखिर सुमित अवस्थी जैसे वक्ता और विनोद
अग्निहोत्री जैसे संचालक जो एकतरफा थै-थै करते हैं, उनसे भी तो कुछ सवाल-जवाब
किए जाएं और बताया जाए- हमें भी मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन....जो कहिए,
कायदे की लफ्फाजी तो आज हुई जिसका प्रतिरोध करने के लिए पुण्य प्रसून जैसे
अनुभवी पत्रकार और दिलीप मंडल जैसे सक्रिय वेब एक्टिविस्ट और अब संपादक का
होना जरुरी थी. दिलीप मंडल होते तो इस पंडितजी के संबोधन पर न्यूजरुम
डायवर्सिटी पर ज्यादा बेहतर तर्क दे सकते थे.
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