[दीवान]दबंग इंडिया की दबंगई, दैनिक भास्कर का उड़ाया लोगो

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Tue Jun 5 12:09:07 IST 2012


दीवान के साथियों
जहां-जहां इंडिया लिखा है, वहां प्लीज दुनिया पढ़ें.
विनीत

2012/6/4 vineet kumar <vineetdu at gmail.com>

> कल मुझे "दबंग इंडिया" अखबार की प्रति हाथ लगी. कंटेंट से गुजरने से पहले
> लेआउट देखकर ही लगा- ये अखबार दैनिक भास्कर और नई दुनिया का कॉकटेल है. अखबार
> ने भास्कर का लोगो ( पीले रंग का सूर्य) जिस दबंगई के साथ हूबूहू इस्तेमाल
> किया है, उससे साफ झलक गया है कि वो अखबार की लोकप्रियता और पहचान को भुनाने
> के साथ-साथ चाहता है जो कि बहुत ही घटिया हरकत है . दूसरी तरफ उसने फांट भी
> वही रखा है जो कि भास्कर की फांट है. बाकी का हिस्सा देखकर लगता है कि नई
> दुनिया की लोकप्रियता और लोगों की पकड़ के बीच अपनी सेंधमारी करना चाहता है.
> ऐसा करते हुए दबंग इंडिया ने एक बार भी नहीं सोचा कि जो वो कर रहा है उससे
> पाठकों के बीच किस तरह की छवि बनेगी ?
>
>
> <http://4.bp.blogspot.com/-BMLDAQg13ww/T82dN2S-xMI/AAAAAAAADG8/mnA-05ZhWoQ/s1600/dabang.PNG>
> इस देश में वैसे तो डुप्लीकेट मार्केट का बहुत बड़ा बाजार है. इतना बड़ा
> बाजार कि कई मामलों में तो ऑरिजिनल ब्रांड से बिकनेवाली चीजों से कई गुना
> ज्यादा डुप्लीकेट माल की खरीद-बिक्री होती है. और दिलचस्प है कि ये सब खुलेआम
> होता है. आप सलून में चले जाइए, ओल्ड स्पाइस, डेनिम,जिलेट के बिल्कुल हूबहू
> रंग-रुप की चीजें मौजूद मिलेंगी. बस एकाध स्पेलिंग इधर-उधर की हुई. दिल्ली के
> गफ्फार मार्केट चले जाइए. नोकिया लिखा मोबाइल हजार-पन्द्रह सौ में. आप अगर इस
> देश में पसरे मार्केट में बौखना शुरु करें तो आपको लगेगा कि कहीं न
> कहींडुप्लीकेट होंडा सिटी, फरारी, सेकंड हैन्ड एयर इंडिया के हवाई जहाज भी
> मिलते होंगे. स्टेशन,बसों में जाइए. पेप्सी,कोक की ही शक्ल में कोलड्रिंक भरी
> मिलेगी जो कि लोकल रंग-रोगन कोलड्रिंक से भरी बोतलें होती है. बनियान खरीदने
> जाइए, रुपा औऱ लक्स के नाम पर उसके कई-कई डुप्लीकेट हैं. हर चार में से दो-तीन
> रिक्शेवाला आदिदास, नाइकी,रिबॉक के छापा टीशर्ट पहनता घूमता नजर आएगा जबकि उन
> बेचारों को शायद ही पता हो कि एक नाइकी की टीशर्ट की कीमत उसके महीने की कमाई
> से भी ज्यादा हो सकती है. ये डुप्लीकेट भी दो तरह के होते हैं- एक तो कि जिसे
> हम खुलेआम जानते हैं. मसलन 50 रुपये में रिबॉक की टीशर्ट नहीं मिल सकती.
> बावजूद इसके ऐसी टीशर्टों पर उसके नाम का इस्तेमाल उसकी लोकप्रियता की वजह से
> किया जाता है. लेकिन दूसरा कि ऑरिजिनल रेट से दो-तीन सौ रुपये कम में मिल जाते
> हैं. इस दावे के साथ कि माल तो ऑरिजिनल है लेकिन बाहर का है, सेल का है या फिर
> लॉट का है. देशभर में पसरे इस तरह की डुप्लीकेट चीजों के पीछे जो अंधी नकल
> होती है, उसे बनाने-बेचने से लेकर खरीदनेवाला भी जानता है. लेकिन मीडिया में
> इस तरह की नकलचेपी हो रही है, वो क्या दर्शाता है ?
>
> सबसे पहले तो ये की तमाम तरह की धंधेबाजी,मुनाफा,कारोबार के बावजूद मीडिया
> में क्रिएटिविटी की गुंजाईश बची रहती है औऱ रहनी भी चाहिए. आखिर पर कारोबार भी
> तो इसी क्रिएटिविटी और अभिव्यिक्ति की कर रहे हो. एक ढंग से नाम नहीं चुन
> सकते, एक लोगो नहीं सोच सकते, डिजायन नहीं कर सकते तो फिर हम ये कैसे मान लें
> कि आप बिना कहीं से कॉपी-पेस्ट के पक्की खबर दोगे ? जैसे आपने भास्कर का लोगो
> मार लिया, उसकी खबर भी मारोगे. उसकी नहीं तो किसी अंग्रेजी अखबार की हिन्दी
> तर्जुमा करके ही चेप दोगे जो कि धडल्ले से हो ही रहा है. फेसबुक पर इस अखबार
> की तस्वीर लगाने पर जो टिप्पणियां आनी शुरु हुई, उसमें इस बात की प्रमुखता से
> चर्चा है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इस अखबार की टीम भी वहीं से टूटकर गई
> है. टीम टूटकर गई है, इससे उत्पाद का क्या मतलब है ? कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर
> एक कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी में जाता है तो क्या वहां भी वह पुरानी ही कंपनी
> जैसी सॉफ्टवेयर बनाता है या फिर वो बनाता है जो नई कंपनी को जरुरत है? आपको एक
> नया अखबार निकालना है, अपने तरीके से पहचान बनानी है या फिर पहले से स्थापित
> अखबार का दुमछल्लो बनना है ? और फिर ये हालत सिर्फ किसी एक अखबार की नहीं है.
> एक न्यूज चैनल ने स्पीड न्यूज शुरु किया,बाकी के भी चैनल उसी काम में हाथ धोकर
> पीछे लग गए. कोई आधे घंटे में पचास तो कोई उतने ही समय में सौ. जैसे वो खबरें
> नहीं केले बेच रहे हों कि कौन ज्यादा से ज्यादा उसी रेट पर देता है ? मीडिया
> के इस तरीके से पहली ही बार में हमारी सख्त नाराजगी बनती है. लेकिन
>
> ऐसा नहीं है कि अखबार को इस तरह की समझ नहीं है और जब वो भास्कर की लोगो और
> उसकी फांट को हूबहू चिपका रहा था तो उस वक्त ख्याल नहीं आया होगा कि पाठकों पर
> उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी ? उसने सबकुछ समझते हुए ऐसा किया क्योंकि अखबार भी
> बनियान,कोलड्रिंक, मोबाईल,कॉस्मेटिक से अलग कोई धंधा नहीं कर रहा. अखबार की
> दबंगई सिर्फ लोगो और फांट मारने तक नहीं है. उसकी असली दबंगई ( माफ
> कीजिएगा,दिल्ली में दबंग बनिए, वोट दीजिए अभियान के बावजूद मैं इसे नकारात्मक
> अर्थ में ही इस्तेमाल करुंगा. साथ ही मैं बिल्कुल नहीं चाहता कि हमारा पुलिस
> इंसपेक्टर चुबबुल पांडे जैसा छैला-मवाली हो ) अखबार के वितरण और लोगों तक
> पहुंचने में होती होगी. मुझे पक्का यकीन है कि हॉकर, अखबार बेचनेवाला ग्राहक
> के भास्कर मांगे जाने पर दबंग इंडिया पकड़ा देता होगा. शुरुआत में पाठकों के
> बीच ये भी भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई होगी कि ये भास्कर ग्रुप का ही अखबार
> है. आम टाइम्स की जगह इमली इंडिया अखबार डालने का संस्कार अखबारवालों को सालों
> से है. वो दो अलग-अलग रंग-रुप और नाम के अखबार होने पर भी ऐसा करते आए हैं. इस
> अखबार का तो हुलिया ही हूबहू मिलता है. इस दबंगई का दूसरा स्तर एक तरह की
> चीटिंग में विकसित होती है.
>
> जिस पैटर्न और सिस्टम से दैनिक भास्कर लोगों तक पहुंचता है, वही काम दबंग
> इंडिया कर रहा होगा.मसलन दिल्ली में जब नई दुनिया रातोंरात नेशनल दुनिया हो
> गया तो किसी से बिना पूछे कि हॉकर ने नेशनल दुनिया डालने शुरु कर दिए. बताया
> तक नहीं कि ये रात का करिश्मा आलोक मेहता जैसे तिनतसिए मीडियाकर्मी का नतीजा
> है. अखबार खरीदनेवालों का एक बड़ा वर्ग हड़बड़ी में रहनेवालों का है.
> बसों,ट्रेनों औऱ चलते-फिरते जो लोग अखबार खरीदते हैं, उस वक्त आप नई दुनिया
> मांगिए तो आपको बिना कुछ कहे हॉकर नेशनल दुनिया पकड़ा देता है. यही काम दबंग
> इंडिया के साथ भी हो रहा होगा. टिप्पणी में बताया गया कि दैनिक भास्कर से
> टूटकर जो लोग गए वहीं दबंग दुनिया निकाल रहे हैं. वैसे दबंग अधिकारी ब्रदर्स
> का क्षेत्रीय चैनल है जिसकी उत्तराखंड/ उत्तरप्रदेश में जबरदस्त लोकप्रियता
> है. शुक्रवार पत्रिका की जब टीम टूटकर इतवार में गई तो वो पत्रिका भी उसी तरह
> लोगों के पीछे पहुंचने लगे. लेकिन उन्हीं टूटे हुए लोगों ने इस तरह की भौंडी
> नकल नहीं की. सवाल लोगों के टूटकर जाने का नहीं है, सवाल नई जगह पर जाकर
> पुरानी स्थापित चीजों की बदौलत चीटिंग करने की है. इन टूटे हुए लोगों ने एक
> मिनट भी इस बात पर दिमाग नहीं लगाया होगा कि कैसे एक नया अखबार स्टैब्लिश किया
> जाए जिससे कि भास्कर के लोगों को रस्क हो कि वो यहां से जाकर कितना बेहतर और
> अलग कर रहे हैं. इससे ठीक उलट, उनलोगों ने पूरा दिमाग इस बात पर लगाया कि कैसे
> एक ऐसा अखबार निकाला जाए जो लोगों को कन्फ्यूज करे कि वो दैनिक भास्कर से अलग
> कोई चीज नहीं खरीद रहे हैं. मेरे ख्याल से इस अहं के साथ भास्कर के लोग दबंग
> इंडिया को बरी नहीं कर सकते कि तू इस खेल में बच्चा है, पहले अपनी औकात बढ़ा
> ले,तब बात करना.या फिर ये भी संभव है कि अगर अखबार ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
> तो दबंग इंडिया को तत्काल ये लोगो हटाने पड़ जाएंगे. लेकिन इस लोगों,लेआउट और
> फाउंट की नकल की बदौलत आप और हम समझ सकते हैं कि इसे लोगों के बीच पहुंचाने तक
> क्या-क्या धत्तकर्म किए जा रहे होंगे. निश्चित रुप से दैनिक भास्कर इस बात के
> लिए समर्थ है कि वो इसे हड़काए,हम जैसों को लिखने की जरुरत नहीं है लेकिन ये
> बताना जरुरी है कि आपने जो अपने अखबार का नाम रखा है वो साहस नहीं लंपटई,जड़
> और चोर मिजाज की तरफ इशारा करता है.
>
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