[दीवान]ज्ञान का लोकतंत्र :अपूर्वानंद (Saturday, 24 November 2012 )

Ashish Kumar 'Anshu' ashishkumaranshu at gmail.com
Mon Nov 26 15:54:53 IST 2012


  दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और अध्यापक वर्ग के लिए यह समान रूप से चिंता
का विषय होना चाहिए कि मानव संसाधन विकास मंत्री को प्रशासन को यह सलाह देने
की जरूरत पड़ी कि परिसर में किसी भी प्रकार का अकादमिक परिवर्तन पर्याप्त और
वास्तविक विचार-विमर्श और संवाद के जरिए ही लाया जाना चाहिए और यह कि दिल्ली
विश्वविद्यालय शिक्षक संघ अध्यापकों द्वारा चुनी हुई वैधानिक संस्था है। इसका
अर्थ यह है कि विश्वविद्यालय परिसर में संवाद टूट गया है। शिक्षक संघ से कई
मामलों में असहमत अध्यापकों का भी ऐसा महसूस करना क्या उनकी अतिरंजित
प्रतिक्रिया है?
संवाद की आरंभिक शर्त यह है कि शामिल पक्ष एक-दूसरे के स्वतंत्र मत के अधिकार
को स्वीकार करें और उसका सम्मान करें। लेकिन अगर विश्वविद्यालय प्रशासन के
किसी प्रस्ताव पर विचार के लिए विभागीय बैठक के पहले अध्यक्ष को यह निर्देश
प्राप्त हो कि वह प्रस्ताव के पक्ष, विपक्ष में मत देने वाले अध्यापकों के ही
नहीं, उनके नाम भी भेजें जो मत नहीं देना चाहते तो संदेश स्पष्ट है। प्रशासन
के प्रस्ताव से अलग मत रखने वाले संदिग्धों की सूची में डाल दिए जाएंगे। इसका
तात्पर्य यही हो सकता है कि विश्वविद्यालय अपने अध्यापक की व्यक्तिमत्ता को
स्वीकार करने को तैयार नहीं। लेकिन विश्वविद्यालय की तो खूबी यही है कि वह
मुझे अकेले एक व्यक्ति के रूप में खड़े रहने का साहस देता है। इसका अर्थ यह है
कि मैं अपनी इस व्यक्तिमत्ता के साहस के साथ अपनी सामूहिकता का चुनाव करने की
स्वतंत्रता अर्जित करता हूं। इसके साथ यह जोड़ना भी जरूरी है कि विश्वविद्यालय
एक ऐसा परिसर है जहां ‘अलोकप्रिय’ और ‘अनुपयोगी’ विचारों को पनपने और पल्लवित
होने की अनुकूल जलवायु प्राप्त होती है। इसके लिए अनिवार्य हो उठता है
प्रभुत्वशाली और स्वीकृत विचारों का विरोध। विरोध या असहमति इस प्रकार
विश्वविद्यालय का अस्तित्व-तर्क है। इसीलिए विश्वविद्यालय अनुशासन और दंड के
विधान से बंधे नहीं होते।
विश्वविद्यालय के इस विचार में पिछले कुछ वर्षों से तेजी से क्षरण हो रहा है।
इसके पीछे ज्ञान की विशेष अवधारणा सक्रिय है जो उसे सामाजिक-भौगोलिक और
सांस्कृतिक संदर्भों से स्वतंत्र करके देखती है। आश्चर्य यह है कि राधाकृष्णन
आयोग, मुदलियार आयोग, कोठारी आयोग और यशपाल समिति द्वारा ज्ञान-सृजन की
प्रक्रिया में बारंबार इन संदर्भों की भूमिका पर जोर दिए जाने के बावजूद भारत
के विश्वविद्यालय तंत्र को संचालित करने वाली संस्थाएं केंद्रीकरण की वकालत
करती प्रतीत होती हैं। सबसे ताजा उदाहरण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा
अनुदान को इस शर्त के साथ जोड़ देने का है कि विश्वविद्यालय अपने सभी
पाठ्यक्रमों को सेमेस्टर के ढांचे में ढालें।
प्रश्न वार्षिक बनाम सेमेस्टर का नहीं, सैद्धांतिक तौर पर यह है कि जयप्रकाश
नारायण विश्वविद्यालय, छपरा के लिए क्या ठीक है, यह कोई केंद्रीय संस्था कैसे
तय कर सकती है। उसी तरह अध्यापकों के चयन के लिए एक अनमनीय ढांचा बनाते ही
आयोग ने तय कर दिया कि जो व्यक्ति इसमें फिट नहीं बैठते, उनसे विश्वविद्यालय
हमेशा के लिए वंचित रह जाएं। अलग-अलग विश्वविद्यालय अपने अध्यापक चुनने के लिए
अब अलग-अलग तरीके अपनाने को आजाद नहीं रह गए। सारे विश्वविद्यालय और विभाग
अपने लिए अध्यापक का चयन एक ही प्रक्रिया से करने को बाध्य हैं। इसमें ऊपर से
समानता का सिद्धांत अपनाया जाता दिखता है लेकिन वास्तव में यह विश्वविद्यालय
की स्वायत्तता का हनन करता है।
केंद्रीकरण के इस आग्रह के पीछे संभवत: राजनीति-निरपेक्ष विकास के एक अनिवार्य
घटक के रूप में ज्ञान की अवधारणा काम कर रही है। स्पष्टत: यह ज्ञान को एक
अराजनीतिक गतिविधि के रूप में ग्रहण करने वाली समझ है। फूको जैसे विचारकों ने
सत्ता और ज्ञान के बीच के नाभिनाल संबंध को कुछ इस तरह उजागर कर दिया है कि अब
इस पर किसी दूसरे तरीके से बात करना मुमकिन नहीं रह गया है।
समाज के शक्ति-समीकरण के बीच ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया अनेक द्वंद्वों से
होकर गुजरती है। इसीलिए पुराने ज्ञानानुशासनों की हदें टूटती हैं।
अंतरानुशासनिकता ज्ञान के उपभोक्ता छात्र को अलग-अलग व्यंजन के स्वाद का आनंद
उठाने के लिए आजादी देने का मामला नहीं है। यह ज्ञान को संगठित करने की एक
अधिक संश्लिष्ट प्रक्रिया की ओर उसे सजग करने की युक्ति है। यह ज्ञानानुशासनों
के बीच ऊंच-नीच की दर्जाबंदियों को तोड़ने का एक तरीका भी है। आप इसे ज्ञान को
अधिक लोकतांत्रिक बनाने की एक पद्धति मान सकते हैं।
सजग अध्यापक इसीलिए अपने पाठ्यक्रम को कक्षा तक सीमित नहीं रखता। मसलन, मुझे
मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ को ठीक से समझने के लिए अपनी कक्षा में एके
रामानुजन के रामायण संबंधी निबंध को दिल्ली विश्वविद्यालय की पाठ-सूची से हटाए
जाने के प्रसंग को न सिर्फ लाना होगा, बल्कि शायद पूरी कक्षा को इस कदम के
विरोध के लिए प्रेरित भी करना होगा।
जब मैं ऐसा कर रहा हूं, तो साहित्येतर विश्वविद्यालय विरोधी राजनीति कर रहा
हूं या ज्ञानात्मक गतिविधि? कक्षा में प्रश्न उठता है कि अज्ञेय के
यात्रा-वृत्त ‘एक बूंद सहसा उछली’ में दूसरा अध्याय ही इटली में फासिज्म के
अत्यंत आरंभिक काल में एक कलाकार लाउरो ड बोसिस के दुस्साहसी विरोध का  वर्णन
क्यों है? और क्यों अज्ञेय ने उसकी चेतावनी के इस हिस्से को उद्धृत करना
आवश्यक समझा: ‘‘क्या नेता और क्या साधारण युवक, सभी समझते हैं कि फासिज्म अधिक
दिन नहीं चल नहीं सकता और अपने-आप मिट जाने वाला है, उसके लिए प्राण
  देना व्यर्थ है। लेकिन यह भूल है।’’ इस अध्याय को उन्होंने इस वाक्य से
क्यों समाप्त किया: ‘‘कौन कह सकता है कि आज भी कवि का स्वप्न उतना ही यथार्थ
और उतना ही शस्त्र संपन्न नहीं होता-नहीं है?’’ इन प्रश्नों का उत्तर क्या मैं
मात्र अपनी कक्षा की सीमा में दे सकता हूं, या क्या सिर्फ ‘साहित्य’ के
‘दायरे’ में रह कर खोज सकता हूं?
 यूरोप ने बोसिस के 1931 के इन शब्दों को न समझने के चलते जो कीमत चुकाई, उसे
भारत के आज के नवयुवक को कैसे समझाया जाए जो लोकतांत्रिक निश्चिंतता में जी
रहा है? क्या मुझे उसे लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य के शरीर के भीतर पल रहे
फासिज्म के कीटाणुओं को देख पाने की निगाह नहीं देनी होगी और राष्ट्रवाद के
प्रति उत्साह को लेकर भी सावधान नहीं करना होगा? क्या इसके लिए मुझे छात्रों
को संजय काक की कश्मीर पर बनी उस फिल्म को देखने को नहीं कहना होगा जिसे
प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय ने प्रदर्शित नहीं होने दिया था? और अगर मेरा
विश्वविद्यालय प्रशासन भी उसे रोके तो मैं क्या करूं? अगर इस रोक की मुखालफत न
करूं तो अज्ञेय या मुक्तिबोध को पढ़ाने की अर्हता कैसे बचाए रखूं? कुछ दिन पहले
मेरे विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा ही मजदूर-किसान शक्ति संगठन के
कार्यक्रम की अनुमति रद््द किए जाने पर चर्चा करूं या वह पाठ्यक्रम के बाहर का
प्रसंग है?
अंतरानुशासनिकता की चर्चा जितनी ही बढ़ती जाती है, विश्वविद्यालयों को
कक्षाबाह्य असुविधाजनक गतिविधियों से उतना ही पाक रखने की कोशिश की जाती है।
अध्ययन को कक्षा-व्याख्यान, आंतरिक मूल्यांकन, सेमेस्टर के अंत के इम्तहान के
बीच लगी रहने वाली एक दमतोड़ दौड़ की तरह पेश किया जाता है। इस दौड़ में जो छूट
गया, लहूलुहान हुआ, उसे लेकर इस निर्वैयक्तिक व्यवस्था को, जिसका नाम
विश्वविद्यालय है, परवाह करने की कोई आवश्यकता नहीं।
स्कूली स्तर पर तो इस सिद्धांत को हम मान लेते हैं कि ज्ञान कहीं बाहर से बन
कर नहीं आता, जीवंत सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में स्कूल-परिसर में छात्र और
अध्यापक की स्वायत्त अंत:क्रिया में सृजित होता है, लेकिन 2012 में दिल्ली
विश्वविद्यालय में दीक्षित स्नातकों को उपाधि देते समय इसके ठीक उलट संदेश सैम
पित्रोदा देते हैं जब वे कहते हैं कि ज्ञान की श्रेष्ठ अंतर्वस्तु के निर्माण
को लेकर समय बर्बाद न करें, वह पहले से काफी उम्दा दिमागों ने तैयार कर रखी है
और उसे आधुनिक तकनीक से हासिल किया जा सकता है। अध्यापक का काम अब बस परिचारक
का है। फिर वे स्नातकों का आह्वान करते हैं कि विचार और बहस करने में वक्त
जाया न करें, बस काम में जुट जाएं।
अब श्रेष्ठ ज्ञान-निर्माण में क्या दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक की कोई
भूमिका नहीं बची? और क्या मैं गलत समझ बैठा हूं कि लोकतंत्र का अनिवार्य घटक
है विलंब, स्थगन और प्रतिरोध! चिंतन और विचार इनके बिना संभव नहीं, स्वीकार का
अधैर्य ज्ञान का विरोधी है। शंका, संदेह और प्रश्न के बिना ज्ञान-निर्माण संभव
नहीं। किसी भी आधिकारिक ज्ञान-स्रोत को वरीयता देना मेरे लिए संभव नहीं; मेरे
लिए, विश्वविद्यालय के ब्रह्मांड के एक सदस्य के रूप में हर अध्यापक और छात्र
की ज्ञान-प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी ही उसकी प्रामाणिकता सिद्ध कर सकती
है।
विकासातुर राष्ट्र-राज्य को तेजी से काम करने वालों की दरकार होती है। वह
विशेषज्ञों को ज्ञान और तकनीक के स्रोत के रूप में देखता है और साधारण जन को
इनके वाहक उत्पादकों के तौर पर। विश्वविद्यालय इस विभाजन के सिद्धांत को
अस्वीकार करता है। वह ज्ञान को एक ऐंद्रिक, भौतिक, स्पर्शात्मक गतिविधि के रूप
में कल्पित और गठित करता है।
विश्वविद्यालय को राष्ट्र-राज्य के उपयोगितावादी मॉडल का प्रतिरोध करना होता
है। इसलिए वह खुद को राष्ट्र-राज्य की सेवा में प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि
उसके सामाजिक आलोचक के रूप में अपनी गतिविधियां गठित करता है। इसीलिए वह अपने
प्रतीक भी राज्य से उधार नहीं लेता। विश्वविद्यालय अपने किसी अतिथि का स्वागत
हथियार की सलामी देकर करना पसंद नहीं करेगा। उसे समाज को शस्त्र के सौंदर्य का
बदल सुझाना होगा।
विश्वविद्यालय के लिए ज्ञान की प्रक्रिया एक गहरे दायित्व-बोध से संवलित होती
है। इसलिए वह खुद को सीमाबद्ध नहीं करता। न अनुशासन की सीमा, न किसी एक
सामुदायिक पहचान की सीमा, न राष्ट्र की। विश्वविद्यालय का हर सदस्य अनिवार्यत:
सार्वदेशिक होता है।
विज्ञान के ‘केयोस’ के सिद्धांत और ‘तितली-प्रभाव’ ने विश्वविद्यालय और दुनिया
के बीच के रिश्ते की मेरी समझ को समृद्ध किया है। अब मैं समझ पाता हूं कि अगर
अपने बगल के विभाग के सहकर्मी के असहमति के अधिकार की रक्षा के लिए आगे नहीं
बढ़ता हूं, तो मैं गाजा में इजराइली बमबारी के मामले में सरकारों की चुप्पी को
वैधता प्रदान करता हूं। इन दोनों के बीच बड़ी दूरी लगती है, लेकिन
अंतरानुशासनिक अंत:दृष्टि मुझे उसे पार करने का तरीका सुझाती है।
इसका प्रलोभन बना रहता है कि विश्वविद्यालय को विवादी स्वरों के शोरशराबे से
शुद्ध एक करीने से लगाए हुए सुंदर उपवन का रूप दे दिया जाए। सारे
विश्वविद्यालय एक-से लगें, इसका भी लोभ होता है। लेकिन ऐसा करते ही
विश्वविद्यालय का प्राण-हरण कर लिया जाता है। अराजकता ही विश्वविद्यालय में
जान भरती है। और वह बिना व्यक्ति को उसकी व्यक्तिमत्ता का अधिकार दिए संभव
नहीं है। इन सबमें जोखिम है, लेकिन जोखिम लिए बिना तो इंसान बनना भी नहीं
होता, ज्ञान-निर्माण की बात ही क्या!

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/33229-2012-11-24-05-28-58

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आशीष कुमार 'अंशु'
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