[दीवान]वे व्यवस्थित और कलात्मक ढंग से हिन्दी का नाश करते हैं
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Wed Oct 3 08:07:35 IST 2012
जोहन्सबर्ग विश्व हिन्दी सम्मेलन के बहाने सोशल मीडिया विशेषज्ञों को लेकर नए
सिरे से बहस छिड़ी है. सप्ताह भर तक फेसबुक पर सैंकड़ों तस्वीरें तैरती रहने
के बाद( जिनमे शेर-शेरनी के संभोग से लेकर शयनकक्ष,पार्क,होटल,लॉन की न जाने
कितनी तस्वीरें थी) जब इसमें शामिल लोगों ने सम्मेलन को लेकर एक लाइन कुछ भी
नहीं लिखा तो वर्चुअल स्पेस पर असंतोष के स्वर पसरने लगे. प्रभात रंजन की
फेसबुक वॉल से शुरु हुई बहस आगे तक गई. लिहाजा एक पोस्ट हमने भी ठेल दी जो कि
मूलतः जानकीपुल <http://www.jankipul.com/2012/10/blog-post_3.html> पर है.
आखिर क्यों ऐसे सम्मेलनों में सोशल मीडिया के वही लोग बुलाए जाते हैं जो
वर्चुअल स्पेस को वेनिटी बॉक्स से ज्यादा कुछ नहीं समझते-
प्रभात रंजन ने अपनी फेसबुक दीवार पर ये सवाल उठाया है कि हिन्दी साहित्य और
उसके भविष्य की जब भी चर्चा होती है, उस पर बात करने के लिए “हिन्दी के भूत” को
ही क्यों बुलाया जाता है ? वैसे तो हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं युवा हिन्दी
लेखक-लेखिकाओं से अटे पड़े होते हैं लेकिन परिचर्चा में उनकी गैरमौजूदगी क्या
उन्हें प्रसाधन भर तक के लिए इस्तेमाल किए जाने की ओर संकेत करता है ?
प्रभात रंजन का “भूत” से आशय उन साहित्यसेवियों से है जो एक समय तक हिन्दी
सेवा करने के बाद अब उसकी मलाई काट रहे हैं. वो तब तक काटते रहेंगे जब तक कि
उनके हाथ-पैर चलने बंद न हो जाएं और फिर वे बिस्तर पर गिरेंगे तो अशोक वाजपेयी
जैसे सरोकारी कवि/ आलोचक हिन्दी समाज से आह्वान करेंगे कि राहत कोष बनाने की
दिशा में सक्रिय होने चाहिए. तब हम युवा भी सेंटी होकर अशोक वाजपेयी के
पीछे-पीछे हो लेंगे..ऐसे मठाधीशों के धत्तकर्म तक झुर्रियों,लाचार अंतड़ियों
और किडनियों में दफन हो जाएंगे. लेकिन प्रभात रंजन जिस भूत का आशय ऐसे
अतीतजीवी हिन्दीसेवियों से ले रहे हैं जिनके लिए मैं अक्सर फुंके हुए पटाखे पद
का इस्तेमाल करते हैं, दरअसल हिन्दी के भूत(अतीत) नहीं,भूत( मॉन्सटर,डेविल)
हैं. ऐसे भूत जो बहुत ही व्यवस्थित और कलात्मक ढंग से हिन्दी का नाश करते हैं.
ये कितना विचित्र है कि सरकार और संस्थाएं ऐसे भूतों को हिन्दी का नाश करने के
लिए पालती है और शारीरिक रुप से नाकाम होने की स्थिति में हम उन्हें लेकर चंदे
की हांक लगाने में जुट जाते हैं. सम्मेलनों में युवाओं को न शामिल करने की
प्रभात रंजन की चिंता इनके भूत बनने से ही है.
ताजा मामला जोहन्सबर्ग में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन को ही लें. वहां सैंकड़ों
लोगों के बीच एक भी युवा लेखक,साहित्यकार को नहीं बुलाया गया. जिन लोगों को
युवा मानकर ले जाया गया, वो कब तक युवा बने रहेंगे या फिर युवा की कोई चिरजीवी
कैटेगरी भी होती है, नहीं पता. इन युवा लेखकों के बच्चे भी अगर इसी लेखन के
धंधे में आ जाएं तो किसी और का तो नहीं युवा बने रहकर अपने ही बाल-बच्चों का
हक मारेंगे और क्या पता मार ही रहे हों. खैर...
पत्र-पत्रिकाओं के युवा विशेषांक निकालकर इसे एक गंभीर पाठन सामग्री बनाने के
बजाय कुकरी शो या जाड़े की बुनाई विशेषांक बनाते रहने की जो कवायदें चलती आ
रही है, उनमें से अधिकांश युवा लेखकों की स्थिति किसी स्पेशल डिश या स्वेटर के
खास पैटर्न से अधिक नहीं है. ये डिश और पैटर्न एकबारगी तो आपको बहुत ही चटख और
नया लगेंगे, अपनी स्वतंत्र पहचान के साथ आकर्षित भी करेंगे लेकिन भीतर से इनकी
प्रकृति अपने मठाधीशों से अलग नहीं होती. वो युवा होते हुए भी उन्हीं
मठों,वादों,विचारों और टीटीएम पद्धति(ताबड़तोड़ तेल-मालिश) का विस्तार करते
हैं जो कि उनके मठाधीश अपने पूर्वज मठाधीशों से थाती की शक्ल में लेकर आगे
बढ़े हैं. याद कीजिए नया ज्ञानोदय और हंटर साहब का छिनाल प्रकरण या फिर कुछ
महीने पहले हुए भारतीय ज्ञानपीठ और गौरव सोलंकी विवाद. इन दोनों ही स्थितियों
में आपने बेहतर समझा होगा कि युवा लेखकों का एक धड़ा उन्हीं सड़ी-गली,थोथी और
उबकाई आ जानेवाले तर्कों को आगे ले जा रहा था, जिससे पूरा हिन्दी समाज त्रस्त
है. हंटर साहब छिनाल प्रकरण में उन्ही स्त्री-लेखिकाओं ने चुप्पी साध
ली(दुर्भाग्य से उनमें से कुछ अभी भी युवा लेखिका कार्डधारी हैं) जो
स्त्री-लेखन और युवा स्वर की मुखालफ़त करती हुई निर्बाध ढंग से सेवा कर रही
हैं. इधर गौरव सोलंकी प्रकरण में( हालांकि बाद में ये स्वाभाविक चिंता से कहीं
ज्यादा अतिरेक का हिस्सा हो गया तो भी) युवा लेखकों का एक समूह थोड़े वक्त की
चुप्पी के बाद तकनीकी रुप से अपंग मठाधीश के फैसले को सही ठहराने के लिए
वर्चुअल स्पेस पर सक्रिय हो गया जो कि इस स्पेस के लेखन को कूड़ा मानता आया था
और कालजयी लेखन की रोजमर्रा कसरतों में यकीन रखता है. गौरव सोलंकी ने अपनी
रचना के बहाने जो हिन्दी समाज के चाल-चलन पर जो जरुरी सवाल खड़े किए थे, उसे
खेमे में तब्दील करने और पूरी बहस को अखाड़े की शक्ल देने में ऐसे युवा लेखकों
ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी. वो जिस अंदाज में ताल ठोककर हमारे सामने हाजिर
हो रहे थे और लेखक को बार-बार ललकार रहे थे, अगर अवस्था के फर्क को नजरअंदाज
कर दें तो तासीर मठाधीश की जुबान से अलग नहीं थी.
ऐसे में क्या फर्क पड़ता है कि ऐसे युवा लेखकों को किसी साहित्यिक विचार
संगोष्ठी में बुलाया जाता है या फिर क्यों नहीं बुलाया जाता है. उनके जाने से
सभा में बस इतना फर्क पड़ेगा कि आयोजक को बीच-बीच में उठकर खांसी आने पर पानी
उठकर नहीं देने होंगे. दूसरा कि जिन मठाधीशों की जर्जर आवाज से श्रोताओं को
खासी दिक्कतें उठानी पड़ती है, सुनने में सहूलियतें होंगी. सीढ़ियों पर
चढ़ाने-उतारने से लेकर गू-मूत करने के लिए अलग से अर्दली नियुक्त नहीं करने
पड़ेंगे. नहीं तो जब डीएनए के स्तर पर कोई फर्क नहीं है तो संगोष्ठियों में
क्या फर्क पड़ता है कि गार्नियर की हेयरडाइ वाला मठाधीश वक्ता पहुंचा है या
फिर गार्नियर शैम्पू करके बाल लहराते युवा लेखक.
कार्पोरेट में जिसे हम मदर कंपनी-सिस्टर कंपनी के जरिए समझते हैं, दिलचस्प है
कि दिन-रात कार्पोरेट,बाजार और मीडिया को पानी पी-पीकर कोसनेवाला हिन्दी समाज
उसी पैटर्न पर काम करता है. मठाधीशों की सॉफ्टवेयर से ही ऐसे अधिकांश युवा
लेखक संचालित हैं जो उत्पाद के स्तर पर तो अलग दिखाई देते हैं लेकिन मदर कंपनी
जिनकी अलग नहीं है. आप तसल्ली के लिए कह सकते हैं कि हम कोक नहीं, मैंगो जूस
पी रहे हैं लेकिन एक बाजार विश्लेषक के लिए दोनों की मदर कंपनी एक ही है. ऐसे
में प्रभात रंजन की युवाओं के ऐसे सेमिनारों में शामिल किए जाने की मांग
चिंतित होने से कहीं ज्यादा रणनीति के स्तर के इंतजार को लेकर बात करने का
मसला ज्यादा है. प्रभात रंजन और हम जैसे लोगों के लिए एकबारगी ये चिंता और
अफसोस की बात हो सकती है कि ऐसी संगोष्ठियों में जहां पांच सितारा शयनकक्ष से
लेकर शेर-शेरनी के संभोग करते हुए नजारे देखने को मिल सकते हैं, वहां एक भी
युवा क्यों नहीं ? जहां दुनियाभर की सजावट,मौके और माहौल युवा लेखकों के
अनुकूल हों वहां आखिर खटारा साहित्यकार ही क्यों ?लेकिन जिन युवा लेखकों को ये
सुअवसर प्रदान नहीं किया गया, मुझे पूरी उम्मीद और भरोसा है कि वो इसे वंचना
के तौर पर नहीं, इंतजार और धैर्य के रुप में ले रहे होंगे. चूंकि हिन्दी समाज
की पूरी अवधारणा कालजयिता पर टिकी है और इसमें शामिल होने का मतलब ही है कि
रचना से लेकर रचनाकार, संगोष्ठी,मौके सब अपने आप कालजयी हो जाते हैं. इसका
मतलब है कि मौके आगे भी आएंगे और मठाधीश भी कालजयी ही हैं सो मौके देंगे भी.
इसलिए बहुत परेशान होने की जरुरत नहीं है. और फिर जब बीए में पढ़नेवाले बच्चे
के मां-पिता हो जाने तक भी हिन्दी में रचनाकार युवा ही रहता है तो इतनी
हड़बड़ी मचाने की जरुरत क्या है ? अर्थात् जब डीएनए और मौके के स्तर पर कोई
फर्क और चिंता नहीं है तो युवा लेखकों को संगोष्ठियों में आमंत्रित क्यों किए
जाए?
आगे की टिप्पणी में प्रभात रंजन ने इपंब्ला(इन पंक्तियों का ब्लॉगर) और मिहिर
पंड्या का जिक्र किया और मेरी प्रतिटिप्पणी से आगे जाकर सवाल खड़े किए कि आखिर
इन लोगों को भी तो नहीं बुलाया गया ? प्रभात रंजन हम जैसे ब्लॉगरों और मिहिर
पंड्या जैसे ठहरकर सिनेमा पर लिखनेवाले समीक्षकों को वर्चुअल स्पेस के जरिए
लंबे समय से पढ़ते आए हैं. ऐसे में उन्होंने ये सवाल सोशल मीडिया को लेकर
होनेवाली बहसों में बुलाए-न बुलाए जाने के संदर्भ में है. चूंकि ये पोस्ट इस
सवाल के कारण से ही लिखने की जरुरत महसूस हुई, ऐसे में दो-तीन बातों को स्पष्ट
करना जरुरी हो जाता है.
पहली बात तो ये कि हम जैसे ब्लॉगरों के लिए ये कोई पहला मामला या सवाल नहीं है
कि सोशल मीडिया और वर्चुअल स्पेस पर होनेवाली संगोष्ठियों और बहसों में हमें
क्यों नहीं बुलाया जाता है? एक तो ये कि हम इसके अभ्यस्त हो चले हैं और दूसरा
कि इन संगोष्ठियों में अधिकांशतः जिनलोगों को बुलाया जाता है, हम हर बार
आयोजकों का शुक्रिया अदा करते हैं कि हमें बचा लिया. ज्यादातर वो लोग होते हैं
जिन्होंने शुरुआती दौर में हम ब्लॉगरों का जमकर उपहास उड़ाया, फिर पढ़ना शुरु
किया, अकाउंट बनाए,लिखना शुरु करते इसके पहले सोशल मीडिया के विशेषज्ञ हो गए.
कुछ ऐसे भी हैं जो ब्लॉग और फेसबुक अकाउंट खोला ही इसलिए है कि अपने मठाधीशों
पर वक्त-वेवक्त होनेवाले हमलों का जवाब दे सकें. और वो मठाधीश भी मिट्टी के
ठेपे निकले कि अदना दो-चार कमेंट से गल जाते. ऐसे-ऐसे विशेषज्ञ हैं जो हमारी
ब्लॉगिंग और चैटिंग में अद्वैत दर्शन को स्थापित करते रहे, प्रोजेक्टर से आवाज
बढ़ाने की अपील करते रहे(आदेश भी दिया) और अकाउंट दुरुस्त करने पर मेरे हाथ
में पांच सौ रुपये पकड़ा गए. तब हमें सिरचन जैसी ही ठेस लगी थी और मन रोया था.
ऐसे लोगों की पांत में हमें बुलाकर नहीं बिठाया जाता है तो हम संगोष्ठी पर
अफसोस करते हुए भी व्यक्तिगत रुप से खुश ही होते हैं.
दूसरा कि हमने मेनस्ट्रीम मीडिया को छोड़कर( हालांकि अब कॉलम और लगातार लेखन
के जरिए इससे बाहर नहीं हैं लेकिन अपनी शर्तें बरकरार रहती है) जैसे ही
वर्चुअल स्पेस में कदम रखा तो हमारे सामने बस एक ही ध्येय था. हम जो भी
लिखेंगे, उस पर किसी की कैंची नहीं चलेगी और कोई हमें कहेगा नहीं कि इसे हटा
दो. कई ऐसे मौके आए जब लगा कि ऐसा लिखना मुश्किल होगा, कुछ लोगों ने शक तक
किया लेकिन वर्चुअल स्पेस की सक्रियता बनी रही. इधर जिनलोगों ने अकाउंट खोल
लेने भर और ब्लॉगस्पॉट पर एक लिंक कब्जा लेने भर से अपने को सोशल मीडिया के
विशेषज्ञ की कुर्सी हथिया ली या दूसरे अनुषांगिक फायदे के लिए स्वतः कुर्सी दे
दी गई, वो इन संगोष्ठियों के फेरे-दर-फेर लगाते रहे. बुके, गर्मियों में भी
शाल,उपहार और नकदी से लादे जाते रहे. इन सारी चीजों ने कभी बहुत प्रभावित नहीं
किया. ऐसा लिखना अपने को संत और त्यागी के रुप में प्रोजेक्ट करना नहीं है
बल्कि ये इस माध्यम की प्रकृति है..आप इस शॉल-बदनवार में बंधकर वर्चुअल स्पेस
के साथ न्याय कर ही नहीं सकते.
अब देखिए न...
जोहन्सबर्ग में मीडिया और साहित्य से पुछल्ले की शक्ल में जुड़े ऐसे लोगों का
समूह गया जिन्होंने वहां की तस्वीरों से फेसबुक की अपनी दीवारें रंग दी है.
बेडरुम,लॉन,पार्क,झील आदि के के बीच अपनी तस्वीरें ऐसी खिंचवाई है जैसे यश
चोपड़ा की शूट कि स्टिल बतौर प्रेस रिलीज जारी कर रहे हों. उन सैकड़ों
तस्वीरों के बीच एक पंक्ति भी नहीं लिखी है जिससे आप समझ सकें कि सोशल मीडिया
को लेकर क्या बहसें हुई ? क्या वहां कोई बात भी हुई या फिर “साहित्यिक-सामूहिक
हनीमून” के नजारे ही बनते-बदलते रहे. वर्चुअल स्पेस के अभ्यस्त पाठकों के बीच
गहरा असंतोष है. वो जानना चाहते हैं कि वहां किसने क्या कहा, क्या पर्चे पढ़े
लेकिन कहीं मौजूद नहीं है. याद कीजिए आप इस देश में होनेवाली उन
गतिविधियों,सेमिनारों और यहां तक कि इलाहाबाद में ब्लॉगिंग को लेकर होनेवाली
परिचर्चा को, सोशल मीडिया से जुड़े दर्जनों लोगों ने कैसे एक दिन में
दो-दो-तीन-तीन पोस्टें और पोडकॉस्ट जारी किए थे. न कोई एक रिपोर्ट, न सेमिनार
की वीडियो, क्या ये अलग से बताने की जरुरत है कि वहां ऐसे लोगों का जमावड़ा था
जिनके भीतर सोशल मीडिया विशेषज्ञ कहलाने की तड़प तो है लेकिन वो आत्मा नहीं जो
ये समझ सके कि इसकी विशेषज्ञता इसकी सक्रियता में शामिल है..आप शरीरी स्तर पर
मौजूद लोगों के बीच भले ही हवा-पानी देकर माहौल बना लें कि आप बड़े तीसमारखां
हैं लेकिन लाखों की संख्या में जो वर्चुअल स्पेस पर लोग नजर गड़ाए हैं वो
बखूबी समझते हैं कि आप वहां कैसे पहुंच सके हैं. सोशल मीडिया या कोई भी माध्यम
हो, हिन्दी की टीटीएम पद्धति से आगे नहीं बढ़ती, उसका बने रहना मुश्किल हैं..
और आखिरी बात...
मैं देखता हूं कि जो लोग आए दिन ऐसी संगोष्ठियों में, कभी वातानुकूलित
रेलगाड़ियों से,कभी जहाज से उड़कर शामिल होते हैं. पैसे,बुके और शॉल से लदे
रहते हैं, हम जैसे ब्लॉगरों से कहीं ज्यादा बेचैन और पहचान की संकट के मारे
होते हैं. वो कुछ न लिखकर भी मार मैसेज पर मैसेज झोंके रहते हैं कि वहां गया
ता,यहां बोल रहा हूं. उन्हें यकीन ही नहीं होता कि लोग उन्हें सुन रहे हैं,
देख रहे हैं. इससे कहीं ज्यादा इस बात का यकीन हो गया है कि लोगों ने उन्हें
सीरियसली लेना बंद कर दिया है. ऐसे में इन संगोष्ठियों में जाने और चंद डॉलर
ऑब्लिक रुपये के बताशे लेने का क्या लाभ जो हमारे भीतर वर्चुअल स्पेस पर रहते
हुए पहचान की बेचैनी पैदा करे, हतोत्साहित करे कि लोग हमें नहीं जान रहे. ये
तो संभावनाओं से भरा स्पेस है, हजारों आंखें एक साथ हमें निहारती है जिनमे से
कई अक्सर पोक करती है- आपने आज बहुत अच्छा लिखा है, आपका हाथ चूमने का मन करता
है.
प्रभातजी, चिठ्ठीनुमा शक्ल में लिखी गई ये पोस्ट शायद पाठकों को आत्मश्लाघा या
भावनाओं की पुड़िया लगे. गांधी जयंती की सांझ पर लिखी है तो शायद कोरा स्वप्न
ही..लेकिन यकीन मानिए, सिर्फ हम ही नहीं, रविरतलामी,प्रमोद सिंह,ममता टीवी,
लवली गोस्वामी,प्रशांत प्रियदर्शी, रियाज उल हक जैसे सैकड़ों वर्चुअल स्पेस पर
सक्रिय लोग / ब्लॉगर, सोशल मीडिया के लेखक हैं जो आज भी उसी समझ और ध्येय से
लिख रहे हैं जो कि पांच-छह सात साल पहले लिखा करते हैं. वर्चुअल स्पेस की सबसे
बड़ी शर्त है- क्रेडिबिलिटी..जिस दिन ये क्रेडिबिलिटी खत्म हो गई, लोग इसी तरह
इसके विशेषज्ञ होकर सेमिनारों, हिन्दी विभागों और मीडिया कक्षाओं में ढनमनाते
रहेंगे और पीछे से कोई नउसिखुआ टंगड़ी मार देगा- घड़ीघंट( युवा आलोचक संजीव
कुमार से उधार) आपको कुछ आता-जाता है. तो भी हम जैनेन्द्र की नायिका नहीं
है..हम एक वक्त तक ही मृणाल बने रह सकते हैं, कृष्णा सोबती तक आते-आते बहुत
वक्त नहीं लगेगा.
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