[दीवान] theatre

amitesh kumar amitesh0 at gmail.com
Tue Oct 16 19:29:47 IST 2012


दिल्ली रंगमंच के लिये मौसम खुशगवार हो गया है. अक्टुबर की शुरुआत हुई उर्दु
अकादमी के ड्रामा फ़ेस्टिवल से जिसमें सप्ताह भर विभिन्न नाट्यदलों ने नाटक का
मंचन किया. अधिकांश नाटक मंटो के जीवन और रचना पर आधारित थे. मंटो की यह
जन्मशताब्दी है इसलिये विभिन्न नाट्यदलों ने इस ओर ध्यान दिया है और दिलचस्प
तथ्य  है कि मंटो के ड्रामों की जगह उनकी कहानियों का मंचन अधिक हो रहा है.
साथ ही उनकी जिंदगी के वाकयों को भी ड्रामा में बदला गया है. खालसा कालेज की
ड्रामेटिक संस्था अंकुर  ने भी ‘मंटोरंग’ शीर्षक से मंटो की आठ कहानियों की
प्रस्तुति की, जिसमें छात्रों का एक बड़ा दल शामिल हुआ था.
उर्दु अकादमी के बाद मैथिली भोजपुरी अकादमी भी अपने सालाना जलसे के अंतर्गत दो
नाटकों की प्रस्तुति की. इसके अंतर्गत रंगश्री संस्था की महेन्द्र प्रताप सिंह
निर्देशित भोजपुरी नाटक  ‘बिरजु के बियाह’ का  और मैथिली नाटक ‘ओरिजनल काम’
(महेन्द्र मलंगिया) का  प्रकाश झा के निर्देशन में मैलोरंग के द्वारा मंचन
किया गया. अकादमी के साथ दिक्कत यह है कि वह इस गतिविधि को भाड़ा टालने के
अंदाज में करता है. पहले तो यह तालकटोरा में होता है जो आम मैथिली भोजपुरी
समाज से दूर स्थित है, यहां तक पहूंचने के लिये ही इस समाज को मशक्कत करनी
पड़ेगी. पिछले साल तो बस का इंतजाम भी देखा था, इस बार नहीं देखा. कायदे से इस
नाटक को उन इलाकों में रखना चाहिये जहां मैथिली और भोजपुरी समुदाय रहता है और
नहीं तो मंडी हाउस में ही रखे जायें. ऐसा लगता है कि भोजपुरी और मैथिली के
दर्शक अभी तक व्यापक रूप से इस रंगमंच से जुड़ नहीं पाये हैं क्योंकि अधिकतर
दर्शक मंगवाये दर्शक रहते हैं. अभी तक इन भाषाओं का बौद्धिक समाज भी इससे नहीं
जुड़ा. हां, मैथिली के मामले में मामला अलग है, उसने एक खास दर्शक वर्ग अपने
लिये निर्मित कर लिया है. दूसरी समस्या है कि अकादमी के सचिव इसे पता नहीं किस
नजर से देखते हैं.   मंचन के दौरान ही चाय पानी और नाश्ता ऐसे चलवाने लगते हैं
जैसे बारात में बैठे हों और कोई नाच गाने का कार्यक्रम चल रह हो. हद तो तब हो
जाती है जब वह नाटक के पहले और बाद में अपना व्याख्यान देने लगते हैं वह नाटक
से लंबा और उबाऊ  होने के साथ नाटक के प्रभाव को भी भरसक डीलिट कर देता है.
पता नहीं यह इस पद की खूबी है या व्यक्ति ही ऐसे चुने जाते हैं जो लिजलिजेपन
के मानक उदाहरण होते हैं.
संगीत नाटक अकादमी के अवार्ड फ़ेस्टिवल भी चल रहें है. इस फ़ेस्टिवल में
जिन्हें सम्मनित किया जाता है उनकी प्रस्तुतियां भी होती है. इन प्रस्तुतियों
के अंतर्गत रंगमंच की प्रस्तुतियां है; हैन्सेम कन्हाईलाल की ‘मेमोरीज फ़्राम
अफ्रीका’ जो एक क्लासिक प्रस्तुति बन गया है. अलखनंदन की प्रस्तुति ‘चंदा
बेड़नी’, सुरभि थियेटर की ‘मायाबाजार’, हरपाल तिवाना की ‘मुक्ति’, देवेंद्र
राज अंकुर की ‘वापसी के बाद अयोध्या बाबु सनक गये हैं’, कीर्ति जैन की
‘सुवर्णलता’ और बी. जयश्री निर्देशित चन्द्रशेख कम्बार के नाटक ‘करिमयी’. इस
उत्सव के दौरान ‘चंदा बेड़नी’ की प्रस्तुति देखी. एक लम्बी चौडी कास्ट के नाटक
को मेघदूत के बंद प्रेक्षागृह में ठूंस देने पे पीछे क्या सोच रही होगी यह समझ
से परे है. कायदे से इस नाटक को मेघदूत के खुले रंगमंच पर रखना चाहिये था.
दर्शक को आधा कार्यव्यापार तो दिख नहीं रहा था और पात्र भी बंधे बंधे लग रहे
थे.
 हैबीटेट सेंटर में ओल्ड वर्ल्ड थियेटर फ़ेस्टिवल की शुरुआत  महेश दत्तानी के
नाटक ‘व्हेअर डीड आई लीव माई पर्दा’ से हुई जिसका निर्देशन लिलेट दुबे ने किया
था. इस फ़ेस्टिवल में राहुल द कुन्हा निर्देशित ‘द ब्युरोक्रेट’, दानिश हुसैन
निर्देशित ‘चाइनीज काफ़ी’, अनुप त्रिवेदी निर्देशित ‘दफ़ा २९२’, नंदिता दास
निर्देशित ‘बिटविन द लाइन्स’ और रामचंद्र सिंह निर्देशित नया थियेटर की
‘कोणार्क’ की प्रस्तुति होगी. गौरतलब है कि हबीब तनवीर  के बाद स्वतंत्र रूप
से नया थियेटर की यह पहली प्रस्तुति है जिसका निर्देशन रामचंद्र सिंह नें किया
है जो लंबे अर्से से नया थियेटर से जुड़े हैं. इस प्रस्तुति पर दर्शकों और
समिक्षकों की भी नजर होगी. इन सब प्रस्तुतियों के बाद ग्रैंड प्रस्तुति का समय
आयेगा जिसकी तैयारी चल रही है. विगत वर्ष की तरह इस साल भी भानु भारती के
निर्देशन में ‘तुगलक’ की तैयारी चल रही है. यह भी करोड़ी बजट में तैयार हो रहा
है. यशपाल शर्मा और हिमानी शिवपुरी इसके मुख्य आकर्षण है. देखना यह है कि इस
बार कोई सार्थक रंगानुभूति यह प्रस्तुति देती है या भव्यता में ही उलझ कर रह
जाती है.
खैर, दर्शकों के लिये यह मौसम गुलज़ार है, इसलिये प्रस्तुतियों में दर्शकों की
अच्छी खासी संख्या उमड़ रही है. अलग बात है कि राजनीति के रंगमंच पर कुछ
विडंबनात्मक, हास्य और त्रासद दृश्य का प्रदर्शन चल रहा है देखना यह हि कि
रंगमंच इससे अछूता रह कर प्रस्तुति करता है या इस ओर कोई इशारा भी करता है. यह
पोस्ट खतम कर मुझे भी सहर की प्रस्तुति ‘लौंडा बदनाम हुआ’ देखने के लिये जाना
है. तो सोच क्या रहें हैं. यदि आप पोस्ट पढ़ चुके हैं तो  अपना नाटक चुनिये,
आडिटोरियम में पहूंचिए और नाटक देखिये.

http://rangwimarsh.blogspot.in/2012/10/blog-post_15.html

-- 
Amitesh
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www.pratipakshi.blogspot.com
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