[दीवान]कला बाजार

vinit utpal vinitutpal at gmail.com
Thu Sep 13 16:13:40 IST 2012


*'कला बाजार' नामक यह आलेख रविवार यानी नौ सितम्बर, २०१२ को राष्ट्रीय सहारा
के रविवारीय परिशिष्ट 'उमंग' के पहले पन्ने पर प्रकाशित हुई है
*

*कला बाजार
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*कला और कलाकार की उत्कृष्टता की परिभाषाएं अब बदल गई हैं। कलाकार की स्टाइल
और योग्यता अब बाजार तय करने लगे हैं। ये दोनों मामले अब हाशिये पर हैं
क्योंकि किसकी कलाकृति कितने दामों में बिक रही है, ये मानक हो गए हैं। वै िक
कला बाजार की इस अंधी दौड़ में भारतीय कलाकार भी शामिल हो गए हैं। कला बाजार
की थ्योरी कहती है कि इस बाजार में जिसकी कलाकृति या यों कहें जो कलाकार जितने
अधिक दामों में नीलाम होता है, वह उतना ही बड़ा कलाकार माना जाता है। बता रहे
हैं विनीत उत्पल*

भारतीय कलाकारों की कला पिछले कुछ दशकों से दुनिया भर के लोगों के सिर चढ़कर
बोल रही है। पुरानी पीढ़ियों में एमएफ हुसै न, रजा, सूजा, जगदीश स्वामीनाथन,
तैयब मेहता, अनीश कपूर और मंजीत बावा का बोलबाला रहा है। नई पीढ़ियों के
कलाकारों की कला प्रदर्शनियां सिर्फ भारत में ही नहीं लगती बल्कि न्यूयार्क के
क्रिस्टी साउथ एशियन मॉडर्न एंड कंटेंपरी आर्ट ऑक्शन में भी शोभा बढ़ाती हैं।
इनकी पेंटिंग्स और कलाकृतियां सिर्फ वहां दिखतीं ही नहीं बल्कि करोड़ों में
खेलती भी हैं। अनीश कपूर को दुनिया के दस सबसे अमीर कलाकारों में शुमार किया
जाता है। यह वही अनीश कपूर हैं, जिनकी कलाकृति ‘ऑर्बिट’ ने लंदन ओलंपिक में हर
किसी से वाहवाही लूटी थी। भारतीय कलाकारों की दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी है।
भारतीय कला अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान बनाने लगी है। इन कलाकारों का
एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में जबर्दस्त धाक रखता है।
दुनिया भर के नीलामीघर, आलोचक और प्राइवेट कलेक्टर्स काफी संख्या में भारतीय
कलाकृतियों को खरीद रहे हैं। नए कलाकार पुराने कलाकारों के रिकार्ड को खत्म कर
रहे हैं। भारतीय कलाकारों का बाजार भाव यह है कि आपको उनकी एक पेंटिंग या
कलाकृति खरीदने के लिए जेब से 100 करोड़ रुपये निकालने होंगे। कई भारतीय
कलाकृतियों की बिक्री इतने दामों में हो रही है, जो पूरे भारतीय कला बाजार का
आधा है या काफी हद तक बराबर है। आर्ट टैक्टिक की रिपोर्ट बताती है कि अक्टूबर,
2009 के बाद आधुनिक भारतीय कला में 28 फीसद इजाफा हुआ है। 2001 से लेकर 2010
तक का दशक भारतीय कला के लिए काफी संभावनाएं लाने वाला रहा क्योंकि भारतीय
कलाकृतियों का मू ल्य 10 लाख रुपये से बढ़कर 10 करोड़ रुपये पहुंचा। यदि आप इस
बाजार को 1 से 10 अंकों में आंकें तो भारतीय कला को 6.9 अंक मिलेंगे। रिपोर्ट
बताती है कि भारतीय कला बाजार 51 फीसद बढ़ा है। यदि इस बाजार को भारत जैसे
बड़े लोकतंत्र की तुलना में देखा जाए तो यह काफी कम है क्योंकि महज दस फीसद
कलाकारों को वैिक स्तर पर पहचान मिली है।

लंदन से प्रकाशित होने वाली आर्ट रिव्यू पत्रिका ने कला की दुनिया के सौ
प्रभावशाली लोगों में तीन भारतीयों कलाकारों- सुबोध गुप्ता, ओसियान नीलामी घर
के प्रमुख नेविल तुली और आर्ट कलेक्टर अनुपम पोद्दार को शामिल किया था। मालूम
हो कि प्रभावशाली लोगों की सूची निजी आर्ट कलेक्शन, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर
व्यक्ति-विशेष के प्रभाव और बाजार में उनके कार्य के मूल्यांकन जैसे मानदंडों
के आधार पर तैयार की जाती है। पिछले दिनों सु बोध गुप्ता द्वारा दिल्ली के
लुटियंस जोन में करीब सौ करोड़ में बंगला खरीदे जाने की खबरें सुर्खियों में
थीं और भारतीय कला के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब किसी कलाकार ने अपनी
कला के बूते इस तरह की खरीदारी की। पिछले कुछ समय से पश्चिमी ऑक्शन हाउस और
आर्ट गैलरियों का कंटेंपरेरी इंडियन आर्ट की ओर झुकाव अधिक हुआ है। इस कारण
कलाकारों की कला को बाजार में मुंहमांगी कीमत मिल रही है। विकीपीडिया के
मुताबिक, रजा की बनाई पेंटिंग करीब बीस से ढाई लाख अमेरिकी डॉलर में बिकी तो
उन्हें अपने जमाने के कलाकारों में सबसे महंगे बिकने वाले कलाकारों में शुमार
किया गया। 2010 को उनकी कलाकृति ‘सौराष्ट्र’ क्रिस्टी ऑक्शंस में बिकी और यह
34 लाख 86 हजार 965 अमेरिकी डॉलर यानी भारत के हिसाब से 16 करोड़ 51 लाख 34
हजार रुपये में बिकी। मालूम हो कि रजा पचास के दशक में फ्रांस में जाकर बस गए
थे लेकिन भारत से उनका नाता लगातार बना रहा। अब वे फिर से भारत में ही बस गए
हैं। उनका अधिकतर काम ऑयल या एक्रेलिक में है और रंगों का बेहतर सामंजस्य उनकी
पेंटिंग में दिखता है। वे अपनी कलाकृति में भारतीय पात्रों को स्थान देते हैं।
1962 में बनायी गयी फ्रांसिस न्यूटन सूजा की अनटायटल्ड पेंटिंग का दाम 1.2 से
1.8 लाख अमेरिकी डॉलर है। वह प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के संस्थापक रहे हैं
और स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जिन कलाकारों ने पश्चिम के लोगों को अपनी
कलाकृति के जरिए लुभाया है, उनमें से पहले नंबर पर हैं।

आधुनिक कला बाजार में सबसे महंगी बिकी। उस वक्त उसे 2.5 मिलियन डॉलर यानी
11.25 करोड़ रुपये में खरीदा गया था। मकबूल फिदा हुसैन ने अपने करियर की
शुरुआत होर्डिग पेंटर के तौर पर की थी लेकिन आज उनकी पेंटिंग 3.5 से पांच लाख
अमेरिकी डॉलर के बीच बिकती है। हालांकि उनकी कलाकृति ‘बैटल ऑफ गंगा एंड जमुना’
जहां 2008 में 6.5 करोड़ रुपये में बिकी थी, वहीं ‘महाभारत’ भी इसी साल छह
करोड़ रुपये में बिकी। 2011 में उनकी पेंटिंग्स औसत रूप में बीस लाख अमेरिकी
डॉलर (करीब 10 करोड़ रुपये) में बिक रही थीं।

उनकी तीन पेंटिंग लंदन के बोनहाम नीलामी में 2.32 करोड़ रुपये की रकम के साथ
बिकी थी। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भारतीय कला कुछ साल
पहले दुनिया की नजरों में तब चढ़ी जब पेंटर तैयब मेहता की एक पेंटिंग ‘कल्कि’
न्यूयार्क के क्रिस्टी गैलरी में डेढ़ करोड़ रुपये में बिकी। ‘बुल्स’ नामक
उनकी पेंटिंग 12,43,66,000 रुपये में 2011 में बिकी। अर्पिता सिंह की कलाकृति
‘विश ड्रीम’ करीब नौ करोड़ रुपये में बिकी। अमृता शेरगिल को बीसवीं सदी की
महत्वपूर्ण भारतीय पेंटरों में शुमार किया जाता है। ‘विलेज सीन’ उनकी प्रख्यात
कृति है जिसे उन्होंने 1912-14 में बनाया था और जिसकी बिक्री 1938 में हुई।
मंजीत बावा की पेंटिंग ‘दुर्गा’ का दाम 2.0-2.5 लाख अमेरिकी डॉलर (करीब एक
करोड़ रुपये) तक जा पहुंचा है। वासुदेस एस. गायतोंडे ऐसे पहले भारतीय कलाकार
थे जिनकी पेंटिंग ओशियन आर्ट ऑक्शन में 1,97,698 अमेरिकी डॉलर में बिकी थी।

आधुनिक दौर में सुबोध गुप्ता स्कल्पचर बनाने वाले कलाकारों में सबसे महंगे
कलाकार हैं। वे कांसा और स्टेनलेस स्टील के बर्तनों से आकषर्क कलाकृति बनाते
हैं। क्रिस्टी ऑक्शन में उनकी कलाकृति 80 हजार अमेरिकी डॉलर में बिकी। गुप्ता
की दो गायें जिनका अनुमानित दाम 2.8 से 3.5 लाख अमेरिकी डॉलर है, हर किसी को
आकषिर्त करती हैं। इस कलाकृति में उन्होंने शहरी और ग्रामीण दोनों तरह के
भारतीय समाज को उकेरा है। स्टेनलेस स्टील के बर्तन और साइकिल को जोड़कर बनाई
गई कलाकृति कलाकार की मनोदशा को परिलक्षित करती है। गुप्ता की डेन्सली पैक्ड,
जो 2004 में बनाई गई थी, उसका दाम 2.5-3.0 लाख अमेरिकी डॉलर है। पिछले एक दशक
से उन्होंने अपनी कला का अधिकतर प्रदर्शन विदेशों में ही किया है।

अतुल डोडिया भी बेहतरीन काम कर रहे हैं और बाजार पर उनकी भी पकड़ी अच्छी-खासी
है। ‘कल्कि’ नामक कलाकृति जो उन्होंने 2002 में बनाई थी, उसका अनुमानित मूल्य
1.8-2.5 लाख अमेरिकी डॉलर है। इस कलाकृति में कॉमन शॉप शेल्टर को माध्यम बनाया
है। अकबर पद्मसी, और सुरेंद्र नायर जैसे कलाकार भी हैं जो बाजार के महारथी
हैं।

बहरहाल, कला के बाजार में दिलचस्प तथ्य यह है कि जो कलाकृतियां अंतरराष्ट्रीय
बाजार में बिक रही हैं, वे भारत के ऑक्शन से नहीं बल्कि विदेशों के ऑक्शन के
जरिए बिक रही हैं। भारत की लोककला और लोक कलाकारों की कलाकृतियों का दाम कितना
है, यह शोध का विषय हो सकता है। इस मामले में दुखद पहलू यह भी है कि कला की
श्रेष्ठता अब उनके बिकने को लेकर है। जिस कलाकार की कला जितने दामों में बिकती
है, उतनी ही इज्जत उसे कला के गलियारे में दी जाती है। कला पर बाजार हावी हो
गया है। बाजारवाद के दौर में यह बात गर्द में मिल गई कि कला एक तपस्या है।
यहां कला का मोल नहीं है बल्कि उस व्यक्ति का मोल है, जो अपनी कला को कितने
अधिक दाम में बेच पाता है या फिर बेचने में सक्षम है।

कला बाजार की थ्योरी

अधिकतर पुरानी कलाकृतियां संग्रहालय में रखी हुई हैं। खासकर 1800 ई से पूर्व
की कलाकृतियां दुनिया के तमाम संग्रहालयों में दिख जाएंगी। कम ही ऐसेसंग्रहालय
हैं जो इन कलाकृतियों की बिक्री करते हैं क्योंकि माना जाता है कि बाजार में
अब उनकी कोई कीमत ही नहीं है। कला लेखक चार्ली फिंच ने पिछले दिनों ऑर्ट नेट
डॉट कॉम पत्रिका में लिखा था कि कला के बाजार को देखते हुए इस बात से इनकार
नहीं किया जा सकता कि जिस कला का दाम 1960 के दशक में 1000 अमेरिकी डॉलर था,
उसका मू ल्य 1980 के दशक में 10,000 अमेरिकी डॉलर और आज उसका मूल्य 100,000
अमेरिकी डॉलर हो गया। हालांकि उन्होंने कलाकृतियों के संचय किए जाने पर सवाल
भी उठाया है। उनका कहना था कि कलाकार की स्टाइल और योग्यता उनकी क्षमता को अलग
करते हैं लेकिन यहां किसी कलाकार की कलाकृति करोड़ों में बिकती है तो किसी की
कलाकृतियों का दाम लगाने वाला कोई नहीं होता। उनकी थ्योरी कहती है कि यह कार्य
बाजार करता है क्योंकि मुट्ठी भर लोगों के पास ही पैसा है। इसलिए सरप्लस
कैपिटल और नॉर्मल मार्केट में अंतर होता है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि पिकासो की
कलाकृति 100 मिलियन डॉलर में बिक रही है बल्कि मुख्य बात यह है कि 100 मिलियन
डॉलर के पिकासो हो गए। इस तरह की विकृतियां आर्ट मार्केट के पारंपरिक रास्तों
को प्रभावित करती हैं। किसी कलाकार की कलाकृति की भारी छूट, भारी-भरकम प्रशंसा
किसी के सामूहिक कामों की अपेक्षा व्यक्तिगत मामले अधिक हावी हैं। तात्कालिक
प्रशंसा भी मायने रखती है। जैसा कि स्टॉक एक्सचेंज में होता है। फायदा तब होता
है कि व्यापार हो, न कि उसे रोके रखने में। किसी भी पेंटिंग के व्यक्तिगत
गुणों के बनिस्पत किसी कलाकार की पेंटिंग अधिक महत्व रखती है। आर्ट फेयर में
कलेक्टर्स के व्यवहार इन्हीं नए यथाथरे से प्रेरित है। सोने को लेकर कोई
गलतफहमी नहीं होती क्योंकि वह वास्तव में सोना होता है लेकिन यहां कलेक्टर्स
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे परिस्थितियां भी बनाते हैं और एक प्रतिष्ठा
भी। लालच अच्छी चीज है लेकिन कला इस मामले में प्रभावित होती है क्योंकि यह
आर्थिक व सामाजिक बाजार पर निर्भर करता है। वास्तविकताएं आर्थिक परिवर्तन के
अधीन है। यह सच है कि सभी लोग पैसे बना रहे हैं लेकिन सच यह है कि पैसा सभी को
बना रहा है।

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रजा सौराष्ट्र पेंटिंग बनाने का वर्ष : 1983 बिक्री का वर्ष : 2010 मूल्य :
16,51,34,000 तैयब मेहता बु ल्स पेंटिंग बनाने का वर्ष : 2007 बिक्री का वर्ष
: 2011 मूल्य : 12,43,66,000 सूजा बर्थ पेंटिंग निर्माण का वर्ष : 1955 बिक्री
का वर्ष : 2008 मूल्य : 11,25,00,000 अर्पिता सिंह विश ड्रीम पेंटिंग निर्माण
का वर्ष : 2000 बिक्री का वर्ष : 2010 मूल्य : 9,56,21,000 मकबूल फिदा हुसैन
बैटल ऑफ गंगा एंड यमुना पेंटिंग निर्माण का वर्ष : 1971- 1972 बिक्री का वर्ष
: 2008 मूल्य : 6,50,00,000

*रजा की बनाई पेंटिंग्स करीब बीस से ढाई लाख अमेरिकी डॉलर में बिकीं तो उन्हें
अपने जमाने के कलाकारों में सबसे महंगे बिकने वाले कलाकारों में शुमार किया
गया। 2010 को उनकी कलाकृति ‘सौराष्ट्र’ क्रिस्टी ऑक्शंस में 16 करोड़ 51 लाख
34 हजार रुपये में बिकी*

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