[दीवान][Wandering Life] और

Mohan Siddharth msiddharth.b at gmail.com
Mon Sep 17 17:38:55 IST 2012


चमकती रही रात भर परछाई, दिन के उजाले की,
गूंजती रही ज़हन में खनक, तेरे खिलखिलाने की,
जब से आया हूँ यहाँ, आया हूँ या नहीं?
आईना उठा कर जब भी देखा, शक्ल दिखाई दी माज़ी की।

आदत बहुत ख़राब चीज़ है, जीना दूभर हो जाता है,
तुम हो - नहीं - भी हो सकता है, सोचकर जी घबराता है,
आलम अब कुछ ऐसा है कि, रात आती है पर जाती नहीं,
रोज़ सुबह दर पर किवाड़, देर तक दिन खटखटाता है।

फ़ितरतन मैं रो न सका, एक-एक कर पल-पल धकेला,
पेशानी पर फैली लकीरों को, कोशिश कर एक सार समेटा,
और तेरी तस्वीर को, तेरे दिए बटुए में लिए,
मैं फिर आगे बढ़ चला, मैं फिर आगे बढ़ चला।


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Posted By Mohan Siddharth to Wandering Life at 9/17/2012 05:38:00 PM
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