[दीवान]सलवा जुडूम की असफलता का अफ़सोस
Ashish Kumar 'Anshu'
ashishkumaranshu at gmail.com
Thu Sep 20 16:30:16 IST 2012
*छत्तीसगढ़ में माओवादियों के सफाये के लिए सरकार की मदद से सलवा जुडूम अभियान
शुरू करवाने वाले कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा मानते हैं कि सलवा जुडूम बस्तर
में कुछ लोगों की साजिश का शिकार हुआ है. सलवा जुडूम की असफलता पर उनको गहरा
अफसोस भी है. उनसे बस्तर और माओवादी समस्या पर लंबी बातचीत हुई. प्रस्तुत है,
प्रमुख अंश -
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*
*
बस्तर के पिछड़ेपन के लिए किसे जिम्मेवार माना जाए, माओवादियों को या फिर यहां
की राजनीति को?*
*माओवादी मूल रूप से किसी भी प्रकार के विकास का विरोध करते हैं. इसके पीछे की
दलील यह है कि आम आदमी सुविधा भोगी हो जाने के बाद संघर्ष और तथाकथित क्रांति
से दूर हो जाता है. आम तौर पर सरकारों पर यह आरोप लगता है कि पिछड़ेपन के कारण
नक्सलियों को आधार मिलता है और हम पिछड़ेपन के लिए सीधे सरकार को जिम्मेवार
मान लेते हैं. लेकिन बस्तर को लेकर मैं मानता हूं कि यह पिछले तीन दशकों से
नक्सलियों का आधार केन्द्र, आन्दोलन केन्द्र और देश में उनके प्रभाव को जताने
वाला भी केंद्र रहा है. उनके कामकाज में अपने आन्दोलन के विस्तार के अलावा कभी
मैने आम आदमी की सुविधाओं को लेकर, उनकी बेहतरी को लेकर, आदिवासी समाज के जीवन
स्तर में सुधार लाने को लेकर किसी तरह का प्रयास बस्तर में मुझे ना नजर आया और
ना ही मैंने किसी से इस संबंध में सुना है. माओवादी बस्तर के समसामयिक मुद्दों
को लेकर कभी लड़ते हुए नजर नहीं आये, वह बस्तर में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर
लड़ता है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरोध में लड़ता हुआ दिखा. राजधानी में
बैठी सरकार के खिलाफ लड़ता हुआ दिखा या फिर सरकार के प्रतिनिधियों से
आदिवासियों को आगे करके लड़ता हुआ दिखा. जो नक्सली बंदूक के जोर पर कुछ भी करा
सकते हैं, उनके लिए बस्तर का विकास करा लेना बहुत बड़ी बात नहीं थी. *
*सीआरपीएफ की भूमिका को लेकर बस्तर में अक्सर सवाल उठते रहे हैं ?*
*सीआरपीएफ या ऐसी दूसरी पारा मिलिट्री फोर्सेज जो बाहर से लाकर यहां लगाई गईं
हैं, उनके अब तक के स्टैन्ड से लगा कि वह इस क्षेत्र के विकास को लेकर गंभीर
नहीं हैं. नक्सलियों का सफाया हो, इसके लिए कभी उनकी तरफ से कोई प्रयास होता
नहीं है. उदाहरण के तौर पर पिछले सात-आठ सालों में अबूझमाड़ में एक आपरेशन हुआ
है, जिसमें दो-तीन बटालियन शामिल हुई थीं . एरिया डोमिनेशन के लिए हुए उस
ऑपरेशन को छोड़ दें तो मुझे नहीं लगता कि वह कहीं और सफाये के लिए जा रही हैं.
ये रोड ओपनिंग राशन या वीवीआईपी मेहमान के लिए करते हैं. यानी बस्तर में
सीआरपीएफ नेताओं के लिए है या फिर वह खुद अपनी हिफाजत के लिए है. *
*क्या सरकार के पास कोई योजना है, जिससे नक्सलियों से बस्तर मुक्त हो जाये?*
*मुझे नहीं लगता कि सरकार के पास इसे लेकर कोई दृष्टि है. नक्सलियों के आने के
बाद से यहां की स्थितियां असामान्य हुईं हैं. सरकार और सुरक्षा में लगी
संस्थाओं के बीच लंबी चर्चा होनी चाहिए कि फोर्सेस को किन इलाकों में जाना है
और किन इलाकों में नहीं जाना है. यह भी चर्चा हो कि अधिक से अधिक ग्रामीण कैसे
दोस्त बने और इसे लेकर किस तरह के प्रयास किए जाने की जरूरत है. तब जाकर कुछ
समाधान सामने आएगा, अभी बड़ा संकट विश्वास का है.*
*सलवा जुडूम की असफलता पर अफसोस है आपको?*
*सलवा जुडूम को लेकर अफसोस है, वह सफल नहीं हो पाया. नक्सलवाद के खिलाफ खड़े
हुए इतने बड़े आन्दोलन को जंगल में बैठे नक्सलियों से लेकर राजधानी में बैठे
लोगों ने मिलकर कुचल दिया. एक अच्छे आंदोलन का इस तरह समाप्त हो जाना तकलीफ तो
देता ही है. *
*सरकार और सलवा जुडूम की पूरी ताकत लग जाने के बाद भी नक्सली बचे रह गए?*
*नक्सलियों की ताकत बंदूक में नहीं, उनकी नेटवर्किंग में है. ये जमाना
नेटवर्किंग का है. जिस नेता की नेटवर्किंग जितनी अच्छी, वह उतना बड़ा नेता है.
सफल नेता है. सलवा जुडूम के माध्यम से उनका नेटवर्क कमजोर हो रहा था. उनके
नेटवर्क का आदमी उन्हें छोड़कर मुख्य धारा में आ रहा था. हम उनका नेटवर्क
कमजोर करके ही उन्हें मार सकते हैं. उन्होंने उस दौरान अपवादों को मीडिया में
इस तरह उठाया जैसे पूरे बस्तर में यही हो रहा है. यदि आंदोलन में इनती खामियां
थीं तो हम जो शीर्ष नेतृत्व में थे, एक भी शिकायत, एक भी एफआईआर मेरे खिलाफ
क्यों नहीं आई? हत्या, बलात्कार, लूट का आरोप सलवा जूडूम पर लगता रहा, हम तो
आन्दोलन की अगली पंक्ति मे थे, मुझ पर यह आरोप क्यो नहीं लगे?*
*क्या यह लड़ाई आदिवासी बनाम आदिवासी की नहीं हो गई है ? *
*यह कहना ठीक नहीं है कि सिर्फ आदिवासी ही थे सलवा जुडूम में. गैर आदिवासी लोग
भी शमिल हुए थे, इस लड़ाई में. चूंकि वह आदिवासी बहुल क्षेत्र है, इसलिए
आदिवासियों की संख्या अधिक हो सकती है. नक्सलियों का नेतृत्व महाराष्ट्र और
आन्ध्र का है लेकिन वे कभी आगे नहीं आते. वह आदिवासियों के पिछे छुपकर ही वार
करते हैं. इस तरह महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश के नक्सली सरगनाओं के हाथों
बस्तर के आदिवासी इस्तेमाल हो रहे हैं. हमारे कर्नल, कैप्टन लड़ाई में आगे
होते हैं और नक्सलियों की लड़ाई में वे सबसे पिछे होते हैं. तीन, चार परतों के
पिछे दुबके हुए. *
*इस तरह की स्थितियों के बाद भी उनका विस्तार होता जा रहा है और सरकार कुछ कर
नहीं पा रही है?*
*उनके बुलेट का जवाब है हमारे पास, लेकिन उनकी विचारधारा का जवाब हमारे पास
नहीं है. उस विचारधारा का जवाब कौन देगा?बंदूक की लड़ाई हो तो बंदूक देकर आप
किसी को सामने लड़ने के लिए खड़ा कर सकते हैं. लेकिन अब सोचने का वक्त आया है
कि विचारधारा की लड़ाई में हम कहां खड़े हैं. हमने इस फ्रंट पर मैदान बिल्कुल
खाली छोड़ दिया है, इसलिए वे जीत जाते हैं.*
* नक्सलियों के विस्तार में गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन बड़ा कारण है या फिर भय
और विचारधारा?*
*इसके लिए सभी बातें थोड़ी-थोड़ी जिम्मेवार हैं. वे विचारधारा को लेकर चलने
वाले लोग हैं. यदि हमारी राजनीतिक पार्टी के पास विचारधारा नहीं है तो हम जीरो
हैं. वे अपने विचारधारा को सांगठनिक स्तर पर फैला रहे हैं. इससे उनका विस्तार
हो रहा है. वे अपने विचार को लेकर प्रतिबद्ध हैं. हम उतने कट्टर नहीं हैं. हम
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास रखते हैं. लेकिन यह भी सोचिए, वे हमारी
लोकतांत्रिक व्यवस्था को सीधे चुनौती दे रहे हैं और हम क्या कर पा रहे हैं. *
*यानी उनकी प्रतिबद्धता से सरकार की प्रतिबद्धता कमतर है ?*
*उनको संविधान, राज्य और व्यवस्था से कुछ लेना देना नहीं है. हमें इसके दायरे
में रहकर काम करना है. उन्होंने उन हाथों को हथियार दे दिया, जिन्हें कानून,
राज्य और संविधान नहीं पता. अब उनके लिए किसी अदालत का फैसला तो चलेगा नही.*
*यदि नक्सली इतने गलत हैं फिर जंगल में उनका इतना समर्थन क्यों है? *
*इस देश में साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ भी लोग खड़े हो जाते हैं. दोनों के
अपराध का दर्शन एक जैसा है. दोनों उकसावे पर काम करते हैं इसलिए मैं नक्सलियों
और साम्प्रदायिक शक्तियों को एक करके ही देखता हूं. ये दोनों विचारधारा से एक
दूसरे के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन काम करने की पद्धति दोनों एक सा अपनाते
हैं, हथियार दोनों उठाते हैं. *
*नक्सलियों से निपटने के मामले में सरकार में इच्छा शक्ति का अभाव क्यों है ?*
*सरकारें चुनाव जीतने के लिए समझौते करती है. नक्सलियों से भी जन प्रतिनिधि
समझौते करते हैं. जबतक सरकार में बैठे लोग अपनी गद्दी को दांव पर लगाकर समस्या
सुलझाने के लिए मैदान में नहीं आएंगे, तब तक यह मामला सुलझने वाला नहीं है. हम
चुनाव हार जाएं लेकिन बस्तर से नक्सलियों को बाहर करने की प्रतिबद्धता कम नहीं
होगी, इस इरादे के साथ जब हम मैदान में होगे, उसके बाद ही जीत हासिल हो सकता है
*.
*क्या नक्सली यहां की व्यवस्था की जरूरत बन चुके हैं ?*
*आजादी के बाद से ही जम्मू-कश्मीर का मामला चल रहा है, जिसका आज तक हम हल नहीं
निकाल पाए. वहां हमने सेना जरूर लगा रखी है. अफसरशाही इस देश के राजनीतिक
नेतृत्व को कन्फ्यूज कर रहा है. देश का नेतृत्व भी इस देश की समस्याओं को लेकर
बहुत गंभीर नहीं है. इस तरह के मुद्दों पर वह पूरी तरह से अफसरशाही पर निर्भर
है. हमने आजादी की लड़ाई लड़ी, हमने संविधान बनाया, और आज हम विधानसभा में पेश
होने वाला विधेयक नहीं बना पा रहे हैं.
http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-07-00/3129-salva-judum-neta-mahendra-karma-interview-crpf-congress
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