[दीवान]मैके का हर अमदी भाई होता है ? ( कहानी डीटीसी 212)
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Mon Apr 15 07:02:06 CDT 2013
हैलो अंजू, सुनो न आज दो मुठ्ठी ज्यादा चावल चढ़ा देना, रास्ते में हूं, आधे
घंटे बाद घर पहुंच रहा हूं. पेट्रोल पंप पर गाड़ी की टंकी भरते-भरते तुम्हारा
पेट ज्यादा खाली हो गया क्या, आज ज्यादा भूख लग गई क्या ? चूल्हे-चाकी में
फंसी अंजू को जब भी मौका मिलता सविताभाभी टाइप के मजाक करने से न चूकती और तब
तपन भी मूड में आ जाता. भूख ही नहीं, प्यास भी लगी है ज्यादा,हें
हें,हें,हें..डीटीसी 212 का एक हाथ से हत्था पकड़े तपन ने इस्सस कहा और जोर से
हाथ अपनी थाई पर मारी..
अरे नहीं पगली, तू हमेशा मूड में रहती है, गांव से तेरा भाई आया है, उसी के
लिए कह रहा हूं.
गांव से मेरा भाई, कौन बिट्टू लेकिन अचानक दिल्ली कैसे आ गया, भागकर आया है
क्या, माई और बाबू को बताया भी नहीं..ओजी, पहिले तुम फोन करके माई को बताओ कि
बिट्टू भागकर दिल्ली पहुंचा है, जाने चिंता में जान-परान दे रही होगी..
नहीं,नहीं बिट्ट नहीं आया है. काहे सिर्फ बिट्टू ही तुमरा भाई हो सकता
है..हमको छोड़के पूरा देस का मरद तुमरा भाई है..बोलो है कि नहीं ?
उधर अंजू इस बुझौवल में मजे लेने के बजाय परेशान होने लगी थी. बताओ तो सही कौन
आया है, कहां का भाई आ गया है ?
अब पूरा रमैन कहानी फोने पर बता दें, पैसा खर्चा नहीं होता है..तुम बस दू
मुठ्ठी चावल बढ़ो दो और हां घर में तिल-तिलौरी तो होगा न, थोड़ा उ भी छान देना
लेकिन अभी नहीं, आने पर. कुछ लाना भी है.
बता कुछ तो रहे नहीं है औ भाई के आने की बात भी कर रहे हैं, गर्मी तो बढ़ ही
गया है. सिरिफ दाल-भात और सब्जी ठीक नहीं लगेगा. पावभर दही भी ले लीजिएगा. औ
देखिएगा, एकाध गो खीरा मिल जाए रस्ता में तो उ भी..आम तो बहुत मंहगा होगा अभी,
रेट पूछते आइएगा..
मायका और भाई का नाम सुनते ही अंजू का मन जाने कहां-कहां उड़ने लगा था. उसकी
चिंता ये भी थी कि हमलोग तो जब से दिल्ली आए हैं, साबुत चावल का भात नहीं
खाते, चार टुकड़ा और बहुत हुआ त दू टुकड़ा का. पता नहीं कौन ममेरा-फुफेरा भाई
आ रहा है. धनबाद वाला भाई होगा त हमलोग का रहन-सहन देखके ही बिदक जाएगा. खाना
त दूर, पानी भी नहीं पिएगा..उनलोग का अपना मेन बाजार में दुतल्ला मकान है,
ठीकेदारी, गाड़ी-घोड़ा सब. आधा घंटा समय है, क्या-क्या समेटे, ठीक करे औ सब कर
भी ले त इ बजबजाते नल्ली को कौन सुखा देगा आधा घंटा में..एक बार फिर फोन करके
पूछे कौन भाई आ रहा है ?
हैलो, अजी बताइ न कौन भाय आ रहा है, उसी हिसाब से तैयारी करेंगे न ? अरे अंजू,
भाई तो भाई होता है, तुमरे मयके से आया है त सोचो केतना बड़ा बात है, करो
तैयारी हो कर सकती हो और तपन ने फोन काट दिया.
लीजिए, स्साला साहब, आपकी बहिन अभिए से दमभर टेंसनिया गई. अब देखेगी त जमाने
भर का भाई-बहिन का बिछुड़ल प्रेम उफान मारेगा, ही ही ही ही..इ चैते में न कहीं
राखी बांध दे.
इ आदमी को हमेसा मौज सूझता है, हर वखत धरमसंकट में फसावेगा. इसको क्या है, पैप
में लगल किलिप दबाओ औ फुच्च से टंकी फुल करके आगे बढ़ जाओ. गृहस्थी चलाना एतना
ही आसान होता तो एक दिन में फुचकारी बन जाता इसका. एतना ही में शेर बनता फिरता
है.
ये लो अंजू, मिलो अपने भाई से. अंदर बैठने का बंदोबस्त करती अंजू लक्स कोजी की
बैनर से बने पर्दे सरकाते हुए आगे बढ़ी..उसके मुंह से हमेशा की तरह गोड़ लगी
भइया निकलता कि इसके पहले ठिठक गई..और तपन इस ठिठक के बीच शुरु हो गया.
स्साले साहब का पेट्रोल पंप में पहिला दिन हुआ है ज्वायन किए हुए. बातचीत में
गांव-घर के बारे में बात करने लगे और करते-करते तुमरे मैका खिद्दरसराय तक
पहुंच गए. हमसे रहा नहीं गया त जमा दिए पीठ पर एक धौल- आप तो ससुराली माल हुए
तब तो जी..इ इधर सकपका गए.बोले- मतलब, समझा नहीं. समझा नहीं क्या हमरी जोरु
ओही खिद्दरसराय की है. माने अंजू, हां अंजू त औ नहीं क्या कैटरीना कैफ. अब
पहिला दिन था भाई साहब का त टान लाए इधरे. अंजू रानी की सेवा में, अब दुनही
भाई-बहिन रावण-सूर्पनखा मिलाप करो, हम तनी हाथ-गोड़ धो लेते हैं.
माफ कर दो,अंजू. हमको एक जरा भी अंदाजा नहीं था कि इ तपन बाबू हमको खींच के
हियां ले आएंगे, हम जानते कि इ तुमरा ससुराल है त कोई न कोई बहाना कर देते.
अंजू पैरों से जमीन खुरचने लगी थी. मन किया, कुछ बोले नहीं एक तमाचा जोर से
जड़ दे औ बत्तीसी बाहर आ जाए. कुत्ता तुमको सब पता था..पिटरॉल पंप में ऐसे ही
पहुंचा होगा तू. इहै दिल्ली मैं सैंकड़ों पिटरॉल पंप है, तुमको नंदनगरिए वाला
सूझा. लेकिन अभी कुछ बोलने-कहने का मतलब था तमाशा खड़ा करना, चुप रही. बस इतना
पूछा- कब आए ? घर में सब कैसा है, कनिया के साथ आए हैं कि एकेले ?
एक साथ इतने सारे सवालों को सुनकर बिट्टू हड़बड़ा गया था..फिर भी, नहीं एकेले
आए हैं, सोचे कि पहिले थोड़ा पता कर लेते हैं, गांव में कुछ रहा नहीं, रोड़
बनावे में जो जमीन था चला गया तो सोचे कि दिल्लीए में कुछ करें..संयोग ऐसा रहा
कि पिटरॉल पंपवाला रख लिया. बिआह तो किए नहीं तो कनिया कहां से लेके आते.
अंजू धीरे से बुदबुदायी- हां अपने बिआह नहीं किए हो तभी न दूसरा के गिरहस्थी
में कोयला घोरने आ गए..
क्या जी, भाई-बहिन का मिलापा खत्म हुआ त कुछ पेट का भी सोचें. बिट्टू के आने
से तपन खासा उत्साहित था कि कुछ नहीं तो चलो कोई तो अपनी तरफ का मिला,
बोलने-बतियाने के लिए..नहीं तो पिटरॉल पर वही दिनभर बैनचो-मादरचो..लेकिन अंजू
की नई बसती गृहस्थी पर फिर से पुराने रंग फैलने लग गए थे और वो बुझने लग गई थी.
( मैके का हर अमदी भाई होता है ? कहानी डीटीसी 212)
-------------- next part --------------
An HTML attachment was scrubbed...
URL: <http://mail.sarai.net/pipermail/deewan_mail.sarai.net/attachments/20130415/be085a4b/attachment-0001.html>
More information about the Deewan
mailing list