[दीवान] blogpost
amitesh kumar
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Wed Apr 17 08:34:19 CDT 2013
रंगमंचीय विमर्श के जनपद में एक बात पर सहमति है कि रंगमंच का विस्तार दिल्ली,
मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े केन्द्रों से बाहर उसका छोटे शहरों और कस्बों में
करना होगा. अब छोटा शहर कौन सा होगा..दिल्ली के लिये लखनऊ, जयपुर, भोपाल जैसे
शहर छोटे ही हैं. इन शहरों में भारंगम के सेटेलाईट फ़ेस्टीवल भी आयोजित हुए
हैं. इन शहरों के अलावा पटना, (जो एक पूराना केंद्र है), बरेली, रायपूर,
रायगढ़, आजमगढ, बेगूसराय, उज्जैन, विलासपूर जैसे शहरों में महत्त्वपूर्ण रंग
गतिविधियां होने लगी हैं और यहां राष्ट्रीय स्तर के महोत्सव आयोजित होने लगे
हैं और रंगमंडल बन गये हैं. इन महोत्सव और यहां होने वाले नाट्य प्रस्तुतियों
ने रंग जगत का ध्यान खींचा है. अभी हाल ही में फ़रवरी-मार्च में बेगुसराय
में हुए नौ दिनों का रंग महोत्सव ‘रंग-ए-माहौल’(फ़ैक्ट रंगमंडल द्वारा) देखने
का मौका मिला और इन जैसे शहरों में हो रहे ऐसी गतिविधियों के मह्त्त्व का पता
लगा. यद्यपि बिहार में बेगूसराय संस्कृति आयोजनों का पुराना केंद्र हैं लेकिन
पिछले कुछ वर्षों में वहां रंगमंच और सांस्कृतिक गतिविधियों में स्तरीयता और
गतिशीलता आई है. बेगूसराय शहर ही नहीं इसके बगल के सिमरिया, बीहट, गोदरगांवा
जैसे गांव हैं जहां वर्ष में कम से कम एक महत्त्वपूर्ण आयोजन हो रहा है और ऐसे
आयोजनों से सांस्कृतिक माहौल में उर्जा आ गई है.
प्रवीण गुंजन के निर्देशन में हो रहे इस ‘रंग- ए- माहौल’ में बिहार की तीन
टीम के अलावा दिल्ली से दो, मुंबई से एक और कोलकाता से एक दल शामिल हुआ
था. अनुराधा
कपूर, नादिरा ज़हीर बब्बर, यशपाल शर्मा, सीमा विश्वास, सुमन वैद्य जैसे
रंगकर्मी और महेश आनंद, हृषिकेश सुलभ जैसे आलोचक इस समारोह में उपस्थित थे और
नाटकों के लिये दर्शकों की उत्सुकता और अनुशासन देख कर अभिभूत थे. ऐसे दर्शकों
पर अभिभूत होना ही चाहिये. जो नाटक समाप्त हो जाने के बाद भी किसी हड़बड़ी में
नही रहते थे, अभिनेताओं को सुनना चाहते थे, प्रेक्षागृह में सही जगह लेने के
लिये समय से काफ़ी पहले आ जाते थे, नाटक में आयोजकों द्वारा लगाये गये सहयोग
राशि उत्साह से दिया और सबसे बड़ी बात यह कि नाटक के बारे में मूल्यपरक निर्णय
के बजाय एक विवेचनात्मक राय बनाते थे. उनकी कसौटी पर ‘यार बना बड्डी’(एकजुट,
मुंबई) जैसे स्टार और व्यावसायिक फ़ार्मुलों से लैस नाटक उतना महत्तवपूर्ण
नहीं था जितना विस्थापन की कहानी कहता ‘जहाजी’(राग, पटना), जो तथ्य को
मनोरंजनात्मक सूचना के रूप में प्रस्तुति करने के लिये तनी रस्सी पर चल रहा था,
संतुलन बिगड़ते ही वह उबाऊ हो जाता, नाटक आधुनिकता और विकास की गहन वैचारिक
भाषा में आलोचना कर रहा था और दर्शक सजग भाव से नाटक को सराह रहे थे. यहां के
दर्शकों में महिलाओं की तादाद भी बहुत अधिक थी जिनके लिये ‘जीवित या मृत’(
विवादी, दिल्ली) की कादंबरी की पीड़ा स्वंय की पीड़ा में बदल गई थी और नाटक के
बीच बीच में होने वाली भुनभूनाहट नाटक के समाप्त होने तक सन्नाटे में बदल गई. इन
दर्शकों को साहसिक प्रयोगशील प्रस्तुति भी पाच्य थी, ‘द व्हाइट हैंड्स’ (
आशीर्वाद, बेगुसराय) के एक ऐसे बिंब का स्वीकार हास्य से हुआ जो उत्तेजक था
लेकिन दृश्य के विकास के साथ दर्शकों ने उस बिंब को ग्रहण कर लिया. यह नाटक की
संप्रेषणियता की शक्ति थी और दर्शक की संवेदनशीलता की भी. दर्शकों को एक तरफ़
नकली मध्यवर्गीय चिंताओं से युक्त नाटक ‘मठ के रास्ते में एक दिन’(अक्स, दिल्ली)
लुभाने में नाकामयाब रही तो ‘घर वापसी का गीत’(नि. प्रोविर गुहा) के नाटकीय
बिंब इन्हें परिचित लग रहे थे. नई प्रस्तुति ‘दस दिन का अनशन’(नि. प्रवीण गुंजन)
देखने के लिये उमड़ी भीड़ ने बताया कि निर्देशकों ने भी अपने लिये दर्शक वर्ग
निर्मित किया है. ऐसे दर्शक पाने के लिये महानगर के निर्देशक तरसते हैं, इसलिये
अनुराधा कपूर और नादिरा ज़हीर बब्बर ने दर्शकों को मंच से धन्यवाद दिया. नाटक
की सफ़लता का आभासी प्रचार करने वालो को चाहिये की ऐसे दर्शकों के बीच नाटक
करें, और दिल्ली के चंद बुद्धीजीवियों, मित्र रंगकर्मियों और जेबी समीक्षकों
के लिये नाटक कर वाहवाही पाने और दर्शकीय स्वीकृति पाने के बीच का अंतर देखें.
वैसे वे कह सकते हैं कि ‘हु आर द डैम आडियेन्स’
ऐसे दर्शक तैयार कैसे होते हैं? एक निरंतर विकसित प्रक्रिया से. ऐसे शहरों के
दर्शकों के लिये मनोरंजन के साधन क्या हैं? सिनेमा और टेलीविजन इनके लिये
अपरिचित माध्यम बनता जा रहा है जिसकी कहानी इनसे नहीं जुड़ती. नाटक का जीवंत
शिल्प और विचारोत्तेजक कथ्य इन्हें खींचता है. ऐसे में शहर में आयोजित होने
वाले निरंतर आयोजन से दर्शकों प्रशिक्षित और अनुशासित होते हैं और उनकी एक भूख
बढती है. बेगुसराय में कई नाट्य समूह हैं. सबसे पुराना रंगमंडल है आशीर्वाद
जिसके निर्देशक अमित रौशन है जो हैदराबाद से रंग प्रशिक्षण प्राप्त कर लौटे
हैं और अपने दल के साथ कुछ बेहतरिन रंगकर्मियों को जोड़ा है जो हैदराबाद में
उनके सहपाठी थे. अपना पहला नाटक भी ‘द व्हाइट हैंडस’ निर्देशित किया है जो
साहसिक प्रयोग है. दूसरा और सबसे सक्रिय समूह है द फ़ैक्ट रंगमंडल जिसके
निर्देशक प्रवीण गुंजन रानावि से प्रशिक्षण प्राप्त कर लौटे हैं, अपने दल के
अलावा उन्होंने आशिर्वाद के लिए भी नाटक का निर्देशन किया है. शहर के
उर्जावान अभिनेता के साथ इनके रंगमंडल में कुछ बाहर के अभिनेता हैं जो इनके
पास अपने आप को मांजने आये हैं. इनको रानावि से प्रशिक्षित अभिनेता मानवेन्द्र
त्रिपाठी का सहयोग मिला और इनके साहचर्य से एक बेहतरिन प्रस्तुति ‘समझौता’ जो
मुक्तिबोध की कहानी पर आधारित है, तैयार हुई. इसका देश भर में मंचन हुआ
है. मानवेन्द्र
ने फ़ैक्ट के लिये ‘रोमियो जुलियट एंड अंधेरा’ का निर्देशन भी किया है. गुंजन
ने निर्देशन को अपने तक सीमित न रख कर अपने दल के अन्य सदस्यों को भी मौका
दिया है. इनके रंगमंडल के अभिनेता रवि रंजन ने ‘कर्णभारम’ का निर्देशन किया है
और उत्साहित है. दीपक सिन्हा अपने समूह रंगनायक के साथ सक्रिय हैं, परवेज
युसुफ़ जो इप्टासे जुडे हुए थे वे आशीर्वाद के साथ काम करते हैं हैं रंग
प्रशिक्षण भी देते हैं और इग्नु से प्रशिक्षण पा रहे संतोष राणा अपने दल के
साथ सक्रिय हैं. इन सभी के प्रेरक चित्रकार सीताराम, शहर में लगातार
सांस्कृतिक आयोजन करते हैं जिसमें वर्ष के दो राष्ट्रीय महत्व के आयोजन
हैं. आशीर्वाद
ने दो रंग महोत्सव किया है जिसमें रतन थियम, संजय उपाध्याय, मुशताक काक, संजय
सहाय, गीता गुहा, प्रवीर गुहा, रणधीर जैसे निर्देशकों के नाटक हुए हैं. फ़ैक्ट
भी दो महोत्सव रंग-ए-माहौल के नाम से कर चुका है. पहला आयोजन स्थानीय रंगमंच
से संबंधित था इसमें दीपक सिन्हा, चंदन, परवेज़ युसुफ़ जैसे स्थानिय
निर्देशकों के नाटक हुए थे. निर्देशन के अलावा अपने सांगठनिक क्षमता से गुंजन
ने नौ दिन का राष्ट्रीय महोत्सव इस वर्ष आयोजित करके शहर में एक माहौल बनाया
है और शहर के प्रशासन, व्यवसायी, रंगकर्मी, स्थानिय निकाय के प्रतिनिधि और आम
दर्शक के परस्पर सहयोग को स्थपित किया है. नाटक देखने के लिये सहयोग राशि को
अनिवार्य करके रंगकर्म की आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी मार्ग निकाला है, जो
जनसहयोग से निकलता है. रंगनायक भी मई के महिने में नुक्क्ड़ नाटकों का उत्सव
करता है. इस तरह लगातार आयोजनों से दर्शक और रंगकर्मी दोनों सक्रिय रहते हैं.
शहर में प्रेक्षागृह के नाम पर एक दिनकर भवन है जो अल्प संसाधनों से लैस है
और जिसमें अत्याधुनिक सुविधायें नहीं है.मंच पर और नेपथ्य में मूलभूत उपकरणों
और सुविधाओं की कमी के बीच रंगकर्मी अपना काम कर रहें हैं. और यह एक तरह से
लाभकारी भी है क्योंकि रंगकर्मी शैली के चमत्कार की बजाय कथ्य और कम संसाधन
वाला रंगमंच करने पर बाध्य होते हैं जिससे वे कथ्य और अभिनेता पर केंद्रित
होते है. वैसे केंद्र में कथ्य और अभिनेता को रखने के एक अन्य कारण यहां के
दर्शक भी है जिसकी प्रगतिशीलता की चर्चा हो चुकी है. यहां जलेसं, प्रलेसं और
जसम जैसे संगठनों की सक्रिय इकाई है, इसके अतिरिक्त पार्टी लाईन के बाहर भी
नितांत समाजवादी मूल्यों में विश्वास रखने वाली जनता है जो यहां के रंगकर्म की
मुखर आलोचक है, शैली के चलेत कथ्य का विचलन इन्हें मंजुर नहीं है. शहर की
प्रस्तुतियों को देखते हुए यह बात भी सामने आता है कि शाश्वत और कालजयी
मूल्यों के साथ शहर का रंगमंच समकालीनता को भी अपने कथ्य में शामिल कर रहा है.
‘दस दिन का अनशन’ अनशन और धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल का और ‘द व्हाइट हैंडस’ औरतो
पर हो रहे स्थानिय एवं वैश्विक हिंसा का चित्रण करता है. साफ़ है कि यहां के
रंगमंच ने एक जिम्मेदारी दर्शकों को जागरूक करने की भी ली है. उल्लेखनीय तथ्य
यह है कि राजनीतिक और सामाजिक मुहावरे का नातक करते हुए भी वह उस प्रस्तुति के
स्तर को भी बनाये रखता है जिसे महानगरों और संस्थानों की मिल्कियत समझा जाता
रहा है.
बेगूसराय की इस गतिशीलता पर बिहार या देश का कोई भी शहर रश्क कर सकता है. इस
सक्रियता को निरंतर बनाये रखने की जरूरत है. वैसे बिहार में पटना के बाहर
बेगूसराय ही है जहां रंग गतिविधियां होती है, अन्य शहर में तो नाम मात्र की है.
इन शहरों में पर्याप्त दर्शक है लेकिन इन तक पहूंचने की संभावना निर्देशकों ने
खंगाली ही नहीं है. वैसे इन शहरों में काम कर रहे रंगकर्मियों को भी आसानी
नहीं है. ग्रांट और फ़ंड इन्हें मिल रहे हैं लेकिन एक तरह के संदेह और सामाजिक
असूरक्षा से भी ये घिरे रहते हैं. बाहर से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद
लौटने के बाद इन्हें अपने को प्रमाणित करना पड़ता है, नई शैली अपनाने के कारण
स्थानीय स्वीकार्यता मिलने में देर लगती है और जड़ लोग जड़ता टुटने के कारण
इन्हें आलोचना का शिकार भी बनाते हैं. सक्रियता ही इन सभी आलोचनाओं का
जवाब है. जरूरत
है इस रंगमंच को विस्तृत किये जाने की और इसके नये पौध तैयार करने की. रंगमंच
को निरंतर दर्शक और अभिनेता मिलते रहें इसलिये यहां के रंगमंच को विधालय और
महाविद्यालय के युवा वर्ग से जोड़ना चाहिये, साथ ही दिनकर भवन से बाहर निकल कर
अगल बगल के गांवों और शहरों में भी संभावना तलाशनी चाहिये एवं उस बड़ी आबादी
को छेड़ना चाहिये जो शहर के इस उत्सव से बेखबर अपने ड्राईंग रूम में बैठा
कहता है कि क्या बकवास हो रहा है और टी.वी. का रिमोट खोल कर कार का विग्यापन
देखने लगता है.
रंग सक्रिय बेगूसराय <http://rangwimarsh.blogspot.in/2013/04/blog-post.html>
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Amitesh
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