[दीवान]जश्न के इस शोर में सुनता हूँ चंद आहें भी!!
kamal mishra
kissakhwar at gmail.com
Sat Dec 7 19:54:42 CST 2013
विश्व व्यापार संगठन के १ ५ ९ सदस्य देशो के व्यापार मंत्रियों की मौजूदगी में
आखिरकार वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देने वाले अपनी तरह के पहले फैसले पर सहमति
बन ही गयी। बाली में हुए इस समझौते को अनेक आर्थिक इतिहासकार शायद दोहा दौर की
वार्ता में एक उल्लेखनीय पड़ाव और महत्वपूर्ण उपलब्धि के बतौर दर्ज करना
चाहेंगे। वैसे दुनिया भर के अख़बार बुलंद आवाज़ में विश्व व्यापार को प्रभावित
करने वाले इस ऐतिहासिक फैसले पर 'भारत की छाप' होने की भी बात कह रहे हैं। एक
ओर जहाँ यह बताया जा रहा है कि इस समझौते के परिणाम स्वरुप विश्व अर्थव्यवस्था
में करीब दस खरब डॉलर का इजाफा होगा। तो वहीं ये उम्मीद भी की जा रही है कि इस
समझौते से गरीब देशों से होने वाले निर्यात को भी जमकर बढ़ावा मिलेगा। विभिन्न
विश्लेषकों ने शनिवार को बाली के नूसा दुआ में हुए समझौते का सबसे विशिष्ट
पहलू यह बताया कि इस व्यापारिक समझौते से यह साबित हो गया है कि वैश्विक
व्यापार के कायदों की आड़ में विकसित राष्ट्रों द्वारा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं
के खाद्य सुरक्षा संबंधी सरोकारों और चिंताओं की निरंतर की जाने वाली अनदेखी
फ़िलहाल मुमकिन नहीं।
ख़बर है कि बाली में चार दिनों तक चले लंबे बहस मुबाहिसे और मोल तोल के कई एक
मौकों पर भी भारतीय व्यापार मंत्री आनंद शर्मा ने बिना हीला हवाली किये भारत
सहित समस्त विकासशील देशों के हितों का प्रतिनिधित्व बखूबी किया। साथ ही यह
खबर भी गर्म है कि इस दौरान शर्मा लगातार दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
जी से संपर्क में बने रहे और उन्हें इस बीच जारी तमाम उठा पटक की जानकारी यथा
समय उपलब्ध कराते रहे। मनमोहन सिंह जी से मिल रहे दिशा निर्देशों और समर्थन से
उत्साहित आनंद शर्मा ने अपने प्रशंसनीय प्रयासों के बल पर आखिरकार विकसित
देशों के प्रतिनिधिओं को खाद्य सब्सिडी और समर्थन मूल्य जैसे दूरगामी महत्व के
मुद्दों पर भारत का पक्ष स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया। कहना नहीं होगा
कि मौजूदा समझौते के बाद भारत सहित तमाम विकासशील देश सब्सिडी के लिए पहले से
तय सीमा रेखा (मतलब राष्ट्रीय आमदनी का सिर्फ दसवां हिस्सा) का उल्लंघन करके
भी अपने नागरिकों को सुरक्षित खाद्य आपूर्ति के अवसर आने वाले वर्षों में
उपलब्ध करा सकने में समर्थ होंगे। जाहिर है कि इस निर्णय से यू पी ए के खाद्य
सुरक्षा कार्यक्रम के लागू होने की राह में खड़ी अंतर्राष्ट्रीय बाधा अब दूर हो
चुकी है।
ये बात तो किसी से छिपी नहीं है कि कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को
चुनावी समर में तलवार की तरह इस्तेमाल करने का इरादा किया है। और चाहे जो कहें
कम से कम ये तो नहीं लगता कि उनकी इस योजना से किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को
कोई शिकायत होगी । हाँ, कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन को ले कर कुछ सवाल
जरुर हो सकते हैं। मसलन एक स्वाभाविक खतरा ये जरुर दिखता है कि खाद्य सुरक्षा
कानून का सौ फीसदी लाभ जरूरतमंद को मिलने से पहले ही कहीं यह भ्रस्टाचारियों
के कुत्सित मंसूबों का शिकार न बन जाय। वैसे यह सवाल भी गौरतलब है कि गरीबों
को भूखमरी से निजात दिलाने वाले इस कार्यक्रम पर होने वाले भारी भरकम सरकारी
खर्च से उत्पादकों को कितना फायदा होने जा रहा है? इस सवाल की अहमियत को समझते
हुए अगर आप भी घोषित सरकारी खरीद मूल्य जैसे विवरणों पर एक नजर रखें तो मैं
दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसे में आप विस्मय से भर उठेंगे। और आप भी जश्न से
उठते शोर के बावजूद उन आहों को सुन पायेंगे जिन्हें मैं अभी से स्पष्ट सुन पा
रहा हूँ।
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