[दीवान]आंदोलन की शाख रह गई
avinash das
avinashonly at gmail.com
Sun Dec 8 08:13:09 CST 2013
शाख नहीं, साख :)
2013/12/8 brajesh kumar jha <jha.brajeshkumar at gmail.com>
> ‘जो हुआ, वही अच्छा है’
>
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> भारतीय जनता पार्टी परेशान थी कि कहीं आम आदमी पार्टी (आप) उनका वोट न झटक
> ले। कांग्रेस भी चिंतित थी। पर, पेटियां खुलीं तो साफ हुआ कि आप ने किसी का
> वोट नहीं काटा है, बल्कि नई राजनीतिक जमीन तैयार की है।
>
>
>
> अब यह साफ हो गया है कि आंदोलन की धारा अभी सूखी नहीं है। उसका असर समाज में
> गहरे जाकर बैठा है। अन्ना हजारे के समर्थन के बगैर आप को जो सफलता मिली है, वह
> नई राजनीतिक व्याख्या की मांग करती है।
>
> बहरहाल, आंदोलन का रास्ता छोड़कर जब अरविंद केजरीवाल ने पार्टी बनाई थी तो
> कई सवाल उठे थे। सवाल उठाने वालों में जमीन पर काम करने वाले ईमानदार लोग भी
> थे। इसी बात पर अन्ना हजारे से उनकी दूरी बढ़ी। उनका मानना था कि व्यवस्था
> बदले के लिए वर्तमान व्यवस्था से दूर रहना जरूरी है। लेकिन, अरविंद ने अलग
> राह पकड़ी।
>
> तब कई खबरें आई। पर, अरविंद अलग रास्ते पर आगे बढ़ते गए। वे कहते रहे कि अब
> आंदोलन के साथ-साथ राजनीतिक जमीन भी तैयार करनी होगी। हमें राजनीति में भी आना
> होगा। वे उसी रास्ते पर हैं।
>
> उन्होंने दिल्ली को कर्म-भूमि बनाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव को परीक्षा की
> घड़ी माना। अब साफ हो चला है कि दिल्ली की जनता विकल्प के इंतजार में थी। उनकी
> ‘आम आदमी पार्टी’ को अपना समर्थन दिया है। अब अरविंद केजरीवाल अपने वादे को
> कितना पूरा करते हैं? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है। पर इतना साफ
> है कि उन्होंने लोगों की नब्ज को अच्छी तरह पहचाना।
>
> दिल्ली की राजनीति में पहली बार हुआ है कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के
> अलग कोई मजबूत राजनीतिक शक्ति उभरी है। सौ प्रतिशत यकीन के साथ कोई यह बात
> नहीं कह सकता था। पर, वही हुआ है।
>
> भाजपा समर्थकों ने भाजपा को वोट किया। कांग्रेस के समर्थकों ने अपनों से
> नाराजगी जाहिर कर दी। नए वोटरों ने ‘आप’ को चुना। इस बदलाव ने अरविंद
> केजरीवाल की जिम्मेदारी बढ़ा दी है। उनसे लोगों की उम्मीदें दोगुनी हो गई हैं।
> इसे संभाले और बनाए रखना उनके लिए एक चुनौती होगी।
>
> यहां चुनाव एक आंदोलन की जमीन पर हो रहा था। दुनिया की नजर दिल्ली चुनाव पर
> थी। दिल्ली की जनता को बड़ी जिम्मेदारी निभानी थी। जनता ने अपना कर्तव्य पूरा
> किया। उस आंदोलन से गहरे जुड़ी रहीं सामाजिक कार्यकर्ता किरण बेदी ने सुबह
> करीब आठ बजे ही ट्वीट किया, "इससे पहले की विजाताओं की घोषणा हो, भारतीय
> मतदाता, चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन पहले ही विजयी हो चुके हैं. चुनाव अब
> तक जिस तरह से कराए गए और जितने शांतिपूर्ण रहे हैं वो सराहनीय है।"
>
> चर्चित लेखक चेतन भगत ने लिखा, "कांग्रेस को कम से कम अब सुनना होगा।
> कांग्रेस हारी क्योंकि वो भ्रष्ट है, अक्खड़ है उसने जनता को बेवकूफ बनाया, बंटवारे
> की नीति अपनाई और हमें खराब नेतृत्व दिया।"
>
> अबतक ऐसा लग रहा है कि भाजपा सरकार बनाएगी और आम आदमी पार्टी विपक्ष की
> भूमिका में होगी। यदि ऐसा हुआ तो वह आदर्श स्थिति होगी।
> ‘आप’ के पास चार महीने का समय है। वह अपनी राजनीतिक दृष्टि और समझ लोगों के
> सामने रखे। उसके बाद उसे आम चुनाव-2014 में हस्तक्षेप रखना है।
>
> इस पंक्ति के लेखक का एक दिन पहले तक मानना था कि ‘आप’ निर्णायक भूमिका में
> है, किन्तु उसका सत्ता में आना या फिर विपक्ष में बैठना नामुमकिन सा है।
> लेकिन, ‘आप’ के नेता प्रशांत भूषण का आंकलन अधिक सही निकला। उन्होंने कुछ
> महिने पहले कहा था कि उनकी पार्टी दिल्ली में सरकार बनाएगी और 2014 के चुनाव
> में वो निर्णायक भूमिका में होंगे।
>
> खैर, ‘आप’ का राजनीति की दलदली जमीन पर स्वागत है। दिल्ली की जनता का
> बहुत-बहुत धन्यवाद कि उन्होंने आंदोलन की धारा, उसकी हवा को बनाए रखा। जिंदा
> रखा। क्योंकि आप के हारने से सबसे बड़ा नुकसान आंदोलन को होता। वर्तामान
> राजनीतिक पार्टियां की हिम्मत बढ़ जाती। वह भविष्य में किसी जन आंदोलन को
> दबाने से नहीं हिचकती, पर ऐसा नहीं हुआ। यकीनन, यह शुभ है
>
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