[दीवान]संसद को मंदिर कहना जरुरी है क्या ?
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sat Feb 9 20:50:00 IST 2013
अफजल गुरु को फांसी की खबर के बाद के कुछ एफबी अपडेट्स-
1. आज लुटियन जोन पत्रकारिता दिवस है, रवीश कुमार(Ravish
Kumar<http://www.facebook.com/ravish.kumar.359?group_id=0>)
की भाषा में लाल पत्थर पत्रकारिता. हर दस में से आठ फुटेज उसी इलाके की
है..टीवी स्क्रीन से गायब हो चुके कई मीडियाकर्मी कॉलेज की अल्युमिनी मीट की
तरह नजर आ रहे हैं. संसद हमले के समय जो आजतक में था, अब आइबीएन7 पर, सहारा का
बंदा आजतक पर, जी न्यूज का बंद न्यूज24 पर..इस पर कभी अलग से स्टोरी करे
मीडिया वेबसाइट कि जो अभी जिस स्क्रीन पर दिख रहे हैं वो अब कहां हैं ?
2. 'राष्ट्रवाद' हमारे लिए एक ऐसी अफीम है जिसके आगे हम सरकार की क्रूरता,
मीडिया का भ्रष्टाचार और देश की जर्जर हालत को चुपचाप न सिर्फ पचा जाते हैं
बल्कि एक समय बाद वही जुबान बोलने लग जाते हैं जो सत्ता की भाषा रही है,
मीडिया की चमकीली जुबान रही है. मीडिया विचारों और सोचने की प्रक्रिया का
सफारी सूट इसी तरह बनाता है.
3. चलिए, आज सिर्फ टाइम्स नाउ ही नहीं है. आज चैनल जातिवाचक संज्ञा में
राष्ट्रभक्त हो गए हैं. देखिए तो सही कि एक आतंकवादी और उसकी फांसी कैसे हमारे
मीडिया को राष्ट्रभक्त बना देता है, शुक्रिया कांग्रेस की सरकार.आप ऐसे ही
फांसी देती रहो, जहां आपकी सत्ता का विरोध हो डगमगाए, एक फांसी. आपको तो
अंतहीन खजाना मिल गया.
4. डियर चैनल, इस तरह उदक-उदककर फांसी की सजा पर सरकार की पीठ इतनी भी मत
ठोकिए कि उसकी इतनी मजबूत छवि बने कि 2014 के चुनावी विज्ञापन की आक्रमक ढंग
से जरुरत ही न पड़े और आपकी रिवन्यू का बड़ा हिस्सा गोल हो जाए.
5. अफजल गुरु की फांसी की खबर का ये दूसरा चरण है. चैनलों पर ग्राफिक्स आने
शुरु हो गए हैं ताकि बच्चे डोरेमॉन,पोकेमॉन छोड़कर इस गंभीर खबर का मजा ले
सकें.,ये टीवी है भाई,सबकी बराबर से चिंता करता है..कुछ ऐसे रिपोर्टर अतीत को
ऐसे दोहरा रहे हैं जैसे अखिल भारतीय रिपोर्ताज लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा
लेने जा रहे हों.एक अतिगंभीर खबर कैसे वीकएंड चिल्लाउट मिजाज की बनायी जाती
है,देखते रहिए.
6. जी न्यूज के कैमरामैन विक्रम बिष्ट की मौत के बहाने सुधीर चौधरी और उसका जी
न्यूज एक बार फिर घिनौने तमाशे करने पर उतर आया है. संसद पर आतंकवादी हमले में
एक गोली छिटककर विक्रम को लगी थी और कुछ साल बाद उनकी मौत हो गई. आज अफजल गुरु
की फांसी के बाद चैनल ने उनके बच्चे नवीन बिष्ट और प्रिया बिष्ट को स्क्रीन पर
लाकर उनकी मदद के लिए दर्शकों से गुहार लगा रहा है. अफसोस होता है कि अभिसार
शर्मा जैसे एंकर ने बहुत ही गलत ढंग से एंकरिंग की और कहा लोग इन बच्चों का
पिता न होने पर मजाक उड़ाते हैं. सुधीर चौधरी बार-बार दोहरा रहा है- प्लीज
आपलोग इनदोनों बच्चों की मदद कीजिए..सवाल है कि क्या चैनल और सुधीर चौधरी इन
बच्चों की सुध लेने के लिए अफजल गुरु की फांसी तक का इंतजार कर रहे थे, इसके
पहले चैनल ने कितनी बार इनकी स्थिति जानने की कोशिश की और दूसरा कि जिस विक्रम
बिष्ट ने चैनल के लिए काम करते हुए जान दे दी, चैनल को नहीं चाहिए था कि
दर्शकों से मदद की अपील के बजाय अपने स्तर पर उसकी मदद करता..इस कैमरामैन के
बहाने सुधीर चौधरी अपनी इमेज चमकाने में जिस तरह से लगे हैं, उससे चैनल का तंग
नजरिया अपने आफ बेपर्द हो जा रहा है.
7. संसद को तो सुबह से चैनलों ने ऐसे बना दिया है जैसे सड़क पर पड़ी किसी की
लावारिस जूती हो. मार, हर एंगिल से धक्का दिए जा रहे हैं. माना कि इस पर
आतंकवादी हमले हुए लेकिन इसे इतना भी मत घसीटो यार कि लगे ये देश की संसद नहीं
आपके गांव के मोहल्ले में दो कमरे का पुश्तैनी मकान था जिसे कि आपके चचरे
भाईयों ने कब्जा लिया.
8. चैनलों ने दिनभर संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा, जी हां मंदिर. मस्जिद
नहीं, न ही गिरिजाघर और प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए गुरुद्वारा. क्या
संसद के लिए मंदिर का प्रयोग सही है. मेरे ख्याल से लोकतंत्र की जमीन इसी तरह
के रुपक से कमजोर होती है. आखिर हमारे मीडियाकर्मी धार्मिक शब्दों के प्रयोग
से अलग क्यों नहीं सोच पाते, उनकी परवरिश क्या इस तरह से हुई है कि जो कुछ भी
दिखाई दे रहा है, सब हिन्दुओं का है ?
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