[दीवान]मर्सिया नहीं फातेहा !!

kamal mishra kissakhwar at gmail.com
Wed Jan 2 00:35:03 IST 2013


 दोस्तों,
कल देर रात बुद्धू बक्से पर उस जवान  लड़की की आप बीती सुनने के बाद-  विरोध
प्रदर्शन में शामिल होने के चलते जिसे थाने में ले जा कर पीटा गया, और जिससे
जबरिया पुलिस ने थाने में झाड़ू -पोछा भी करवाया- जब कमरे पहुंचा, तो कब आँख लग
गयी मालूम ही नहीं चला l एक गहरी नींद के झोके के बाद देखता क्या हूँ कि मंटो
साहब कहीं से नशे की हालत में लड़खड़ाते हुए चले आ रहे हैं l मैंने लपक कर उनको
आदाब कहा और उनसे  खैरियत जानना चाहा l इस पर पहले तो उन्होंने अपना चश्मा
सँभालते हुए  सर से पावँ तक एक बार निगाह भर के मुझे देखा, जैसे पहचानने की
कोशिश कर रहें हों , फिर बिना कुछ कहे ही आगे बढ़ चले l  जाहिरा तौर पर मुझे
उनका वो रुख बिलकुल अच्छा नहीं लगा, और मैंने भी तय कर लिया की उनसे इस बेरुखी
की वजह पूछ कर ही रहूँगाl एक बार फिर से, 'मंटो साहब, अरे जरा मेरी बात तो सुन
लीजिये' कहते हुए, उन्हें पीछे से आवाज लगायी l इस बार तो वो पूरी तरह बिफर
पड़े और लगभग फट पड़ने के अंदाज में जरा रुकते हुए मुझसे पुछा 'क्या परेशानी है
मियां, क्यों इस तरह हाँथ-पावं धो कर मेरे पीछे पड़ गए हो ?'  मैंने भी अपने को
सम्भालने की कोशिश की, और छुटते ही एक सवाल दाग दिया, ' क्या आप मर्सिया
नहीं पढ़ रहें हैं?' इस पर थोडा सोचते हुए मंटो ने जवाबी सवाल किया, ' मर्सिया,
कौन सा मर्सिया, किसका मर्सिया?' अब पहली बार मुझे अपनी समझ पर तरस आया, और ये
एहसास भी की नशे में शायद याद नहीं कर पा रहे हों, इस लिए याद दिलाने की
ही गरज से कहा ' अरे, उसी गुमनाम मासूम का, उफ़ उसकी दिल दहला देने वाली मौत,
खबर तो होगी आपको।' अबकी बार थोडा लापरवाही के अंदाज में मंटो ने कहा, ' हाँ!
सुन तो रहा हूँ इधर कई दिनों से, बुतों को बोलते : " आखिर सब्र की भी
एक हद होती है!"' मुझे मंटो से सीधे या इस से बेहतर जवाब की उम्मीद तो शायद
नहीं ही थी, फिर भी यह पूछे बिना दिल नहीं माना 'आप का इस सब के बारे में क्या
कहना है ?' मंटो ने कुछ उकताहट से मेरी तरफ देखा, और एक अजीब सी मुस्कराहट के
साथ बोले, 'पूछना चाहता हूँ, क्या बेशर्मी की भी कोई हद होती है?' अब तक तो
मैं खासा परेशां हो चुका था, और अब मुझे मंटो के इस मिजाज़ पर थोडा गुस्सा भी आ
रहा था, ऊपर से कड़ाके की ठण्ड, मिजाजपुर्सी की हालत में मैं बिलकुल भी नहीं
था, मैंने अपने को दोबारा सँभालते हुए कहा, 'मैं आप का मतलब नहीं समझा ?' मंटो
को भला क्या फर्क पड़ता, टका सा जवाब मिला, ' नहीं समझा तो क्यों मेरा सर खा
रहा है, किसी और से जा के समझ l' और इतना कहने के साथ ही  मंटो नशे में
लड़खड़ाते हुए दोबारा आगे बढ़ने लगे l

एक बार फिर से बिगड़ी बात को पटरी पर लाने  के लिए मैंने मंटो से जरा विनीत
स्वर में कहा,  'बुत भला क्या जवाब देंगे? और, अफ़सोस ... मुर्दे भी तो कुछ
नहीं कहते l ' इससे पहले की मंटो मेरे उकसावे पर कुछ बोलते, दो पियक्कड़ जो न
जाने कहाँ से इस बीच हमारे बिल्कुल  पास से ही पूरे सुर में  "हैप्पी न्यू
इयर" का राग अलापते, और एक दुसरे को सहारे से सँभालते गुजर रहे थे, हमारी
बातें सुन अचानक चौंक कर रुक गए l उनमें से एक बोला, 'मुर्दा!! अबे,
बहड्चो यहाँ मुर्दा
कहाँ है बे?' मंटो को शायद उस शराबी का अचानक रुक कर इस तरह से सवाल
पूछना दिलचस्प लगा हो, तुरंत बोल उठे, ' लाश पड़ी भी हो तो क्या, कौन आएगा झाँकने,
या शोर मचाने?' अब बारी थी दूसरे शराबी की,  'शोर मचाने!  तो क्या फिर कोई रेप
हुआ है ? कहाँ ?' मंटो अब शायद पूरी तरह से शरारत के मूड में थे, तेज आवाज में
उन पियक्कड़ों से बोले, 'हाँ, रेप हुआ है, और रोज होता है, जी बी रोड में !'
दोनों शराबी पहले तो इस बात से खासे सकपका गए, जब कुछ नहीं सुझा तो उनमें से
एक  'मीडिया को खबरदार कर दो, और हाँ रपट भी दर्ज करा देना, फिर देख कानून
कैसे सालों को हिजड़ा बना देगा l'  जैसा कुछ कहते हुए अपने नशे में धुत दोस्त
को  सहारे से लेकर आगे चल पड़ाl

 मंटो के इस तीखे कटाक्ष का मर्म एक हद तक अब मुझे समझ में आ रहा थाl  लेकिन
अपनी मध्यवर्गीय नैतिकता को एक बारगी न छोड़ पाने के दबाव से पेशतर मैंने मंटो
से एक बार फिर अपनी मुश्किल जाहिर की, 'देखिये मंटो साहेब, मामला इतना सीधा भी
तो नहीं है, ये देश भर की महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का सवाल है l इस
भारी-भरकम सवाल को आप वेश्यावृत्ति से जोड़ कर कैसे  इतना हल्का कर दिए देते
हैं ? ' मंटो ने अब मेरी तरफ एक उडती निगाह डाली और गुस्से से 'भडुए है साले
सब' कहते हुए उलजलूल बकने लगेl जिनमे खास तौर पर माननीय मुख्यमंत्री  के शराब
पी कर सोने की आदत और नशे में धोती गीली कर देने जैसी बातें  मेरे लिए भी
सर्वथा नयी और एकदम चौकाने वाली थीं l नशे में ठोकर लगने से लडखडा कर मंटो
गिरना ही चाह रहे थे की मैंने बढ़ कर उन्हें हाथों का सहारा दियाl  शायद मंटो
को मेरा इस तरह सहारा देना नागवार लगा,  और अपनी हालत का एहसास भी, संयत स्वर
में मेरे हाथों को झटकते हुए बोले, ' देखो दोस्त, सीधी सी बात है लोग जब तक उन
मासूमों को,  उनके दर्द और लेबर को रिकग्नीशन नहीं देते,  जो गन्दगी के दलदल
में रोज धकेल दी जाती हैं , उन्हें बाकायदा "सेक्स वर्कर"
जैसा  कोई सम्मानजनक  दर्जा दे कर जब तक  इस दमघोटू समाज में भडुआगिरी के
खात्मे, और रिप्रेसन के बजाय  स्वस्थ तरीकों से  सेक्सुअल जरूरियात को जाहिर
करने के लिए कोई रास्ता नहीं मुहैया होगा, तब तक हाय - तौबा से  कुछ होने जाने
का नहीं है l ' मुझे मंटो की बात में कुछ वजन मालूम हुआ, और अपने कुछेक सवालों
का जवाब भी l मैंने नए साल की मुबारकबाद और शुक्रिया कहा, जिसके बाद मंटो एक
बार फिर अपने रस्ते बढ़ गए, और चौंक कर मेरी नींद भी खुल गयी l
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