[दीवान]हुजूर ! एक नजर मेरी सहेली,वनिता,गृहशोभा जैसी पत्रिकाओं पर भी तो डालिए

vineet kumar vineetdu at gmail.com
Wed Jan 16 19:50:25 IST 2013


दिल्ली गैंगरेप के बाद अब हम कॉन्फेशन और ब्लेम-गेम के दौर से गुजर रहे हैं.
बुद्धिजीवियों की एक जमात अपनी ही पीठ पर कोड़े मार रहा है, आप चाहें तो उनकी
इस कवायद को उत्तर आधुनिक परिदृश्य करार दे सकते हैं तो दूसरी जमात ब्लेम-गेम
में खासा सक्रिय है. इस क्रम में दिल्ली पुलिस से लेकर सरकार तक निशाने पर है.
कायदे से तो इस खेल में मीडिया को भी शामिल किया जाना चाहिए लेकिन जब खेल का
अखाड़ा   मीडिया की ही जमीन पर खुली हो तो भला ऐसे कैसे संभव है कि भू-स्वामी
पर कोई उंगली उठाए. लिहाजा, एकबारगी गौर करें तो देश में जितने बड़े मीडिया
हाउस हैं, उनकी किसी न किसी रुप में स्त्री पाठक को समर्पित एक पत्रिका है
जिसे उन्हें ध्यान में रखकर प्रकाशित किए जाते हैं. सवाल ये भी है कि वो ध्यान
क्या है और जब उनके संपादक ध्यान करते हैं तो कैसी स्त्री ध्यान में आती है और
उनके खांचे से अगर अलग नजर आती है तो वो उसे कैसी बनाना चाहते हैं ? फेसबुक
स्टेटस के जरिए हमने इन सवालों से गुजरने की कोशिश की है, आपसे साझा कर रहा
हूं ताकि बात का सिरा आगे तक जा सके-

1.
<http://3.bp.blogspot.com/-4AjTbARKDFU/UPa2z-VTHJI/AAAAAAAADd8/plHCQ48P2fg/s1600/vanita.jpg>
मेरी सहेली,वनिता,गृहशोभा वूमेन्स एरा जैसी महिला पाठकों को समर्पित पत्रिकाओं
की एक लंबी फेहरिस्त और करोड़ों का कारोबार है. जाहिर है इससे एक तरफ लाखों
पाठक जुड़ीं/जुड़े हैं तो दूसरी तरफ स्त्री मीडियाकर्मी इनका संपादन करती हैं.
अब जबकि चारों तरफ स्त्रियों के पक्ष में माहौल बनाने की बात हो रही है तो
जरुरी है कि ऐसी पत्रिकाओं पर भी बात हो और ये समझने की कोशिश हो कि क्या ये
पत्रिकाएं स्त्री को चूड़ी,बिंदी,मेंहदी,लंहगे,पार्लर, नेल पॉलिश,बूटिक में
फंसाए रखने के अलावे भी कुछ टिप्स देती हैं. डाइनिंग टेबल पर स्त्री द्वारा
तैयार की गई डिशेज देखकर उनके बच्चे,पति और सास-ससुर कैसे खुश हो जाए, बेडरुम
को कैसे संवारें और साथ-साथ खुद भी संवरें कि पति को सपने में भी पत्नी छोड़
किसी दूसरी स्त्री का ध्यान न आए के फंड़े हों..इन सबके अलावे स्त्री की कोई
दुनिया हो सकती है जिस पर बात करने की जरुरत है और ये पत्रिकाएं सतर्क ढंग से
अपने को अलग रखती है ? आदर्श पत्नी के नाम पर उंची नस्ल की गाय-गोरु बनाने के
अलावे ये पत्रिकाएं स्त्री के पक्ष में क्या काम करती है, इस पर बात की जाए तो
कई दिलचस्प पहलू निकलकर सामने आएंगे. जनाना डब्बे की शक्ल में निकलनेवाली इन
पत्रिकाओं का असल मकसद मर्द समाज से प्रशंसा प्राप्त करने के अलावे कुछ नहीं
है, बॉस को रिझाने के आगे आधुनिकता की खिड़की बंद हो जाती है, स्त्री को
समर्पित ये पत्रिकाएं पितृसत्तात्मक समाज की जड़े कितनी मजबूत करती हैं, ये सब
ऐसे सवाल हैं जो स्त्री( संपादक)-स्त्री( पाठक) की दुश्मन है जैसे वनलाइनर में
न पड़ते हुए भी काफी मुद्दे छेड़ जाता है. बुनाई विशेषांक के आगे क्या धुनाई
विशेषांक भी संभव है..जिसमे जाहिर है जो स्त्री के विरोध में है उस पर बात हो,
आप ही बताइए.

2. स्त्री पाठकों पर आधारित गृहशोभा,वनिता,सहेली, वूमेन्स एरा जैसी पत्रिकाएं
सिर्फ पत्रिकाएं भर नहीं है. वो एक कम्प्लीट शोरुम है जिसमें स्त्रियों को एक
खाउ-पकाउ-सजाउ जीव के रुप में पेश किया जाता है. इन दिनों इन पत्रिकाओं में
फॉल्स जैकेट या कई बार तो सीधे कवर पर ही सीरियलों और साज-सिंगार की वस्तुओं
पर विज्ञापन करने का प्रचलन खूब बढ़ा है. ये पत्रिकाएं मर्द समाज से उन्हें
कितना मुक्त कराएंगी,ये ्लग मसला है लेकिन इतना जरुर है लेकिन स्त्रियों के
कंधे पर दैत्याकार बाजार जरुर सवार है और उसकी हर इच्छाओं को पूरा करने के लिए
उसे लगातार इसमें घसीटा जाता है.

3. आप कहते हैं टीवी सीरियल स्त्रियों को बददिमाग और मर्दों की चाटुकार बनाकर
छोड़ देते हैं. वो पुरुषों के लिए विटामिन की गोली से ज्यादा नहीं हैं लेकिन
आप मुझे बताइए वनिता,गृहशोभा, मेरी सहेली और वीमेंस एरा जैसी पत्रिकाएं इससे
अलग क्या करती हैं ? सरोकार की तो गोली मारिए, क्या कभी वो धंधे के लिए भी
स्त्री अधिकारों के लिए सामने आएंगे जिसे कि हम मीडिया इन्डस्ट्री में
कार्पोरेट गवर्नेंस कहते हैं. नहीं तो फिर आप इस पर गंभीरता से बात कीजिए न कि
ये पत्रिकाएं कितनी मजबूती से देश की लाखों स्त्रियों की ऐसी माइंड सेट तैयार
करते हैं जिसके अनुसार पति के लिए बिस्तर में जाने से पहले सजना, लंपट औलाद के
हरेक अपमान को सहते जाना, बदमिजाज ससुर के आगे मत्था टेक देना कभी गलत नहीं
लगता. आफ कहते हैं स्त्रियां विरोध क्यों नहीं करती, इन पत्रिकाओं से बनी
माइंडसेट के तहत जब कुछ गलत ही नहीं लगता तो फिर विरोध किस बात का करेगी ? आप
इधर स्त्री अधिकार की बात करते हैं, आंदोलन करते हैं, उधर स्त्री के नाम पर
उसी के खिलाफ कड़ाह चढ़ा रहता है. और तो और ये कम दिलचस्प नहीं है जो वूमेन
मार्केट को समझतीं हैं, उन्हें स्त्रियों की समझ का मान लिया जाता है.
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