[दीवान]Kavi ke sath | कवि के साथ | काव्य-पाठ का 8वां आयोजन आज शाम इंडिया हैबिटैट सेंटर में

Satyanand Nirupam s.s.nirupam at gmail.com
Sat Jun 1 20:13:50 CDT 2013


*Kavi ke sath | कवि के साथ | काव्य-पाठ का 8वां आयोजन** ** *

*आज शाम 7 बजे, गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटैट सेंटर, लोधी रोड, नई दिल्ली में *

*(नजदीकी मेट्रो स्टेशन: जोरबाग)*

* ** *

'कवि के साथ' के आठवें आयोजन में

वरिष्ठ कवि *विमल कुमार *के साथ *प्रियदर्शन* और *अच्युतानंद मिश्र *

की कविताएं सुनने के लिए आप सभी सादर आमंत्रित हैं.



*फ़र्क / विमल कुमार *

* *

इस शहर का एक किला था जिसमें शाम होते ही

बुर्ज के रंग बदल जाते थे

इस शहर में एक बाज़ार था जहाँ कुछ लोग अपने

डैने फ़ड़फ़ड़ाते थे

इस शहर में एक फव्वारा था जिसके आसपास

गुमसुम बेसहारा बच्चे बैठे रहते थे

इस शहर में एक बड़ा-सा तहखाना था जिसमें

जादूगर छिपे रहते थे

इस शहर में एक ऐसी बस्ती थी जहाँ जाने पर

दुनिया में सच और झूठ का फ़र्क समझ में आ जाता था





*तोड़ना और बनाना/प्रियदर्शन  *

* *

बनाने में कुछ जाता है

नष्ट करने में नहीं

बनाने में मेहनत लगती है. बुद्धि लगती है, वक्त लगता है

तो़ड़ने में बस थोड़ी सी ताकत

और थोड़े से मंसूबे लगते हैं।

इसके बावजूद बनाने वाले तोड़ने वालों पर भारी पड़ते हैं

वे बनाते हुए जितना हांफते नहीं,

उससे कहीं ज्यादा तोड़ने वाले हांफते हैं।

कभी किसी बनाने वाले के चेहरे पर थकान नहीं दिखती

पसीना दिखता है, लेकिन मुस्कुराता हुआ,

खरोंच दिखती है, लेकिन बदन को सुंदर बनाती है।



लेकिन कभी किसी तोड़ने वाले का चेहरा

आपने ध्यान से देखा है?

वह एक हांफता, पसीने से तर-बतर बदहवास चेहरा होता है

जिसमें सारी दुनिया से जितनी नफरत भरी होती है,

उससे कहीं ज्यादा अपने आप से।



असल में तोड़ने वालों को पता नहीं चलता

कि वे सबसे पहले अपने-आप को तोड़ते हैं

जबकि बनाने वाले कुछ बनाने से पहले अपने-आप को बनाते हैं।

दरअसल यही वजह है कि बनाने का मुश्किल काम चलता रहता है

तोड़ने का आसान काम दम तोड़ देता है।



तोड़ने वालों ने बहुत सारी मूर्तियां तोड़ीं, जलाने वालों ने बहुत सारी
किताबें जलाईं

लेकिन बुद्ध फिर भी बचे रहे, ईसा का सलीब बचा रहा, कालिदार और होमर बचे रहे।

अगर तोड़ दी गई चीजों की सूची बनाएं तो बहुत लंबी निकलती है

दिल से आह निकलती है कि कितनी सारी चीजें खत्म होती चली गईं-

कितने सारे पुस्तकालय जल गए, कितनी सारी इमारतें ध्वस्त हो गईं,

कितनी सारी सभ्यताएं नष्ट कर दी गईं, कितने सारे मूल्य विस्मृत हो गए



लेकिन इस हताशा से बड़ी है यह सच्चाई

कि फिर भी चीजें बची रहीं

बनाने वालों के हाथ लगातार रचते रहे कुछ न कुछ

नई इमारतें, नई सभ्यताएं, नए बुत, नए सलीब, नई कविताएं

और दुनिया में टूटी हुई चीजों को फिर से बनाने का सिलसिला।



ये दुनिया जैसी भी हो, इसमें जितने भी तोड़ने वाले हों,

इसे बनाने वाले बार-बार बनाते रहेंगे

और बार-बार बताते रहेंगे

कि तोड़ना चाहे जितना भी आसान हो, फिर भी बनाने की कोशिश के आगे हार जाता है।





*सेंडी याने संदीप राम/अच्युतानंद मिश्र ** *



उदासी वहाँ दबे पांव

रोज आती

देर रात शराब की मद्धिम रौशनी में

वे उसे खाली ग्लास की तरह लुढ़का देते

और फफक पड़ते



उनकी सुबहें दोपहर के मुहाने पर होती

और तब दोपहर की तेज रौशनी में

अक्सर दूध ब्रेड या अंडा लाते हुए

वे अपने समाज को देखते

जहाँ बाल सुखाती औरतें

बच्चों के भविष्य के बारें में बात करती

भविष्य तार पर लटके कपडे की तरह

सूख रहा था जिसमे

कहीं अथाह रौशनी तो

कहीं बम विस्फोट के खंदकों सा

अंधकार था

कही तेज धुनों में डूबती शामे थी

तो कहीं इत्र के मादक गंध में

बेसुध पड़ी रात



वे अपने गांव से आये हुए लोग थे

गांव में उनके घर थे

घरों में दीवारें थी

जिनमे कैद थें मा बाप

भाई बहन

एक चूल्हा था जिसकी आग

महज़ खाना नहीं पकाती थी

पूरी की पूरी आत्मा को सुखा देती थी

उनमे से कईयों के पास मोटर बाइक थी

कईयों के पास घर

कईयों के पास पिता

वे एक एक की किस्त अदा करतें

वे तेज तेज साँस लेते

चैटिंग करते हुए ग्लास भर

पानी पी जाते

और वहाँ अनुपस्थित किसी अनाम को

अंग्रेजी में थैंक्यू कहते



वे हिंदी की शर्म में डूबे अंग्रेजीदां बच्चे थे

वे अपने पिताओं की भी शर्म ढो रहे थे

जो उनसे कभी हिंदी में तो कभी

मगही मैथिली और भोजपुरी में बात करते

वे घंटो अंग्रेजी में हँसने का अभ्यास करते

और असफल होने पर

कॉल सेन्टर के नौवें मालें से छलांग लगा देते



छलांग लगाने से ठीक तीन मिनट पहले

जब वे अपनी प्रेमिका के साथ

हमबिस्तर हो रहे होते

वे कहते

*आई विल मैरी यु सून*

उनके ये शब्द

हवा में तब भी एकदम ताज़े होते

जब वे हवा और पृथ्वी को अलविदा कह चुके होते



पिज्जा हट में पिज्जा खाते हुए

वे अक्सर अपने पिता के बारे में सोचते

जो अक्सर कहते अगली फसल के बाद

मैं आऊंगा मिलने

वे हर बार मन्त्र की तरह इसे फोन पर दुहराते

पर वे कभी आ नहीं पाते



अब इस बिडम्बना का भी क्या करें

की इधर देश में खूब काम हुआ है

लगातार बनती रही हैं सडकें

बिछती ही रही हैं रेल की पटरियां

और अभागे पिता छटपटाते ही रह गए

मिलने को अपने बेटों से



इन्टरनेट पर बैठे बैठे

कहीं किसी कोने अंतरे में दबी छुपी

किसानों की आत्महत्या की खबरों पर

अगर उनकी नज़र पर जाती

वे बेचैन हो उठते

वे अपने हाथों को रगड़ने लगते

पेट में एकदम से हुल सा उठता

उबकाई सी आती

पर मोबाइल पर जाते जाते

उनके हाथ रुक जाते

और फिर इन्टरनेट पर

वे अपने बैंक अकाउंट को देखते

उन्हें थोड़ी राहत होती



शाम को कैफे में बैठे

जब उनकी नज़र इस खबर पर पडती

की गांव में पिज्जा हट खुलने को है

तो और बढ़ जाती उनकी उदासी

और इससे पहले की उनके हाथ

उनके चमकते मोबाइल पर जाते

मोबाइल एक अंग्रजी धुन बजाने लगता

उधर से अवाज आती

*हलो** *

*यु नो सेंडी जम्पड फ्रॉम नाइन्थ फ्लोर** *

*व्हाट!** *

सेंडी याने संदीप राम ...



कवि और कविता से कविताप्रेमी हिंदी समाज का सीधा संपर्क-संवाद बढ़े, यही 'कवि
के साथ' आयोजन का उद्देश्य है. यह काव्य-पाठ -श्रृंखला 15 जुलाई 2011 से शुरू
हुई थी. इसमें हिंदी कविता की तीन पीढ़ियां एक साथ काव्यपाठ करती हैं.
काव्य-पाठ के बाद कवि-श्रोता-संवाद होता है.



निवेदक: सत्यानन्द निरुपम | आशुतोष कुमार | प्रभात रंजन

आयोजक: इंडिया हैबिटैट सेंटर
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