[दीवान]आइपीएल फाइनल हैश फिक्सिंग,छत्तीसगढ़ और बिंदास पर जन्नतः चंद एफबी अपडेट्स
vineet kumar
vineetdu at gmail.com
Sun May 26 15:35:35 CDT 2013
1. चैनल चाहे जो भी हो, वो मोहल्ले की औरतों के बनाए स्वेटर पैटर्न की तरह काम
करते हैं. चुन्नू,चुन्नू के पापा और उसके छोटे भाई यानी देवर सबों के स्वेटर
के पैटर्न थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ एक ही होते हैं..शायद इसलिए जिस समय
न्यूज चैनल पर मैच फिक्सिंग की खबर चल रही थी, सोनी मैक्स पर फिक्सिंग की
भट्टी में लाइव मैच तले जा रहे थे, उस वक्त यूटीवी बिंदास पर मैच फिक्सिंग को
लेकर बनी फिल्म जन्नत.
आप केपीएमजी-फिक्की की सलाना रिपोर्ट उठाकर देख लीजिए, थोड़ा विश्लेषण
कीजिए..आप इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि एक न्यूज चैनल को जितनी प्रतिस्पर्धा और
डर दूसरे न्यूज चैनल से नहीं है, उससे कहीं ज्यादा मनोरंजन चैनल या फिल्म चैनल
से है. यही बात दूसरे चैनलों के साथ भी है. यूटीवी बिंदास का आज के जन्नत
फिल्म का चुनना इसी डर का नतीजा है..आज भला कैसे लोग बलम पिचकारी और ब्रेकिंग
न्यूज मोरा घाघरा की ट्रैक सुनने उसके आगे बैठे जाएंगे. कुछ ऐसा करो जो मौजूदा
माहौल से मेल खाता हो.लगे नहीं कि हम अलग करते हुए भी कुछ अलग कर रहे हैं.
मतलब मामला फिक्सिंग और मैच के आसपास ही रहे.
यही नजारा आपको एफएम चैनलों में भी दिनभर देखने को मिलेंगे. रेडियो सिटी का
चलता-फिरता धरना, गाने का लोकपाल, घंटा यानी एक घंटे का अत्याचार..ये वो
सेग्मेंट हैं जो अन्ना आंदोलन,दिल्ली गैंग रेप और उसके खिलाफ होनेवाले
प्रतिरोध से निकलकर आए हैं. मीडिया का ये 360 डिग्री पैटर्न काफी कुछ बता समझा
जाता है. फिर भी है कि आप अभी भी इन फुकरे चैनलों को लोकतंत्र का चौथा खंभा
मानकर अगरबत्ती घुमाते फिरते हैं.
2. वैसे तो विज्ञापन दिखाते-दिखाते न्यूज चैनलों को ब्रांड,ऑफर और डील की गहरी
और बारीक समझ हो गई है. बालों के प्रकार जितना डॉक्टरों को पता नहीं होगा और
समस्याओं का समाधान जितना उनके पास नहीं है, उससे कई गुना चैनलों के पास है.
स्ट्राबेरी जितना फलों की मंडियों में नहीं होते हैं, उससे कहीं ज्यादा उसके
दिखाए बॉडी लोशन में. मोबाईल,मूंगा-धागा-गंडे-ताबीज कैसे आपकी रिलेशनशिप से
लेकर चर्बिआए पेट को संतुलित कर सकता है,सबों की गहरी समझ है इन न्यूज चैनलों
को..एक से एक बाबा-हाकिम,तीनतसिए जुटा रखे हैं इसने लेकिन इन सबमे समाज कहीं
नहीं है. वो रेशे नहीं हैं जिन्हें पकड़कर आप देश-दुनिया और समाज की स्थिति को
बेहतर ढंग से समझ सकते हैं. नहीं तो मार्क्सवाद,प्रगतिशीलता,विकल्प की
दुनिया,प्रतिरोध और उधर नक्सलवाद सबके सब काली टंकी नहीं हो जाती इनके लिए.
जस्टिस काटजू को आप दमभर कोसिए लेकिन यहीं पर आकर लगता है कि सचमुच मीडिया को
समाजविज्ञान की बिल्कुल समझ नहीं हैं.
टीवी स्क्रीन पर नजर टिकाइए- आपको अधिकांश एंकर मोहल्ले के छटे लौंडे की तरह
बात करते नजर आएंगे, महिला एंकर नक्सलवाद की फिल्म "मटरु की बिजली का मंडोला"
टाइप की व्याख्या कर रही हैं. नेता के मेदांता में ऑपरेशन होने और इधर बाकियों
को पांच लाख मुआवजे सहित शहीद की उपाधि देने की खबर ऐसे चल रही है जैसे पूरे
एक अरब से उपर की आबादी इस देश में चैनलों और नेताओं के नत्था बनकर जीने के
लिए अभिशप्त है. आपको ढूंढने नहीं पड़ेगें कि चैनलों के भीतर भी लोग पार्टी
कार्यकर्ता बनकर काम कर रहे हैं, सबके सब छलककर अपने आप बाहर आ जा रहा है. इस
बार लोकतंत्र पर हमला है और रोज जाती जानें सिर्फ लोक की हत्या है. लोक की
हत्या होती रहे, लोकतंत्र का कुछ न होने पाए. कुछ भी इधर-उधर होती रहे, तंत्र
का बचा रहना जरुरी है. जैसे खबरों की हत्या होती जाने,फील्ड की रिपोर्टिंग
कुचली जाने के बावजूद भी मीडिया तंत्र के नाम से छतरियों का गोबरछत्ते की तरह
बढ़ते जाना. सच में तंत्र को जिंदा रखने की कोशिशें कितनी खतरनाक है.
3.
एक दिन के भीतर लोगों ने आतंकवाद का पर्यायवाची शब्द ढूंढ लिया. जमाने बाद आज
फेसबुक आना हुआ(20-22 दिन जमाना ही है मुझ जैसे के लिए) देख रहा हूं कि यहां
भी चैनलों की जुबान लोगों की कीबोर्ड पर चढ़ गई है. इस देश में रहना होगा तो
जय श्री राम कहना होगा, अब बोलेंगे कि तब बोलेंगे. एकाध सोशल नेटवर्क से
जुड़कर, हाथ में दो-चार पासवर्ड रख लेने के बाद ऐसे लोग जितनी शान से चैनलों
से अलग दिखने की कोशिश करते है, अकड़ दिखाते हैं..वो उतने ही इनके फोटोकॉपी
हुए जा रहे हैं.मिलान करें तो इंडिया टीवी, आजतक,जी न्यूज से इनके एफबी स्टेटस
की भाषा अलग नहीं होगी..भायजी, उनको इस तरह की सपाट समझ बनाने के लिए हजारों
रुपये मिलते हैं,कनपटी के दोनों साइड खाप लगाकर खबरें दिखानी होती है ताकि एक
आंख से कांग्रेस और दूसरी आंख से बीजेपी के अलावे कुछ न दिखे, लोग न
दिखें..आपके आगे तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं है. फिर भी आप इतने चिकने घडे की तरह
क्यों बात करने लग रहे हैं ? यकीन मानिए जब आप मीडिया की,राजनीतिक पार्टियों
की जुबान बोलते हैं तो उनके खिलाफ भी खड़े होते हैं, जिनके पक्षधर होने का दंभ
आप आए दिन यहां करते नजर आते हैं. इन दोनों को लोकतंत्र बचाना है और हमें लोक.
आप ही बताइए विपक्षी पार्टियों के बीच सांसदों के भत्ते बढ़ाए जाने जैसी
एकजुटता कल से पहले आपने कब देखी थी?.आशुतोष,राजदीप और यहां तक कि जी न्यूज के
दागदार संपादक सुधीर चौधरी को इससे पहले कब उबलते देखा था ? उनका फायदा तंत्र
को बचाए रखने में है और हमारी सारी कोशिशें लोक को बचाने की है.
4.
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